फारसी ग्रंथ

 -मुस्लिम राज्य स्थापित होने के साथ ही इतिहास-लेखन में भी नयापन आया और मुस्लिम शासकों के दरबार में रह रहे इतिहास लेखकों ने फारसी में ‘तवारीखें लिखीं । मुगलकाल में यह प्रक्रिया और अधिक बढ़ी । कुछ बादशाहों द्वारा लिखी आत्म कथाओं में तथा कुछ की जीवनियों में भी राजस्थान इतिहास से संबंधित सामग्री मिलती है । हसन निजामी कृत ‘‘ताज-उल-मआसिर’’ में मुस्लिम विजय, पृथ्वीराज चैहान के अंतिम दिनों का वर्णन है ।अजमेर, जालोर व नागौर आदि स्थानों पर मुस्लिम प्रभाव के वर्णन के लिये मिनहाज-उस सिराज कृत ‘‘तबकात-ए-नासिरी’’ विशेष उल्लेखनीय है । हजरत अमीर खुसरो की ‘‘तारीख्-ए-अलाई’’, ‘‘देवलरानी’’, ‘‘खजायनुल फुतूह’’ में अलाउद्दीन खलजी की चित्तौड़ व रणथंभोर विजय की जानकारी उपलब्ध होती है । जियाउद्दीन बरनी की ‘‘तारीख-ए-फीजोशाही’’ एवं अफीफ की ‘‘तारीख-ए-मुबारकशाही’’ में खलजी एवं तुगलक वंश के शासकों के साथ-साथ राजस्थान इतिहास से संबंधित महत्वपूर्ण सामग्री भी इनमें मिलती है । इसी भांति बाबर की आत्मकथा ‘‘बाबरनामा’’ एवं जहांगीर की ‘‘तुजुक-ए-जहांगीरी’’, जीवनियों में गुलबदन बेगम कृत ‘‘हुमायूंनामा’’, जौहर आफताबची रचित ‘‘तज-किरात-उल-वाकेयात’’, अब्बास खां सरवानी की ‘‘तारीख-ए-शेरशाही’’, अबुल फजल की ‘‘आईन-ए-अकबरी’’ व ‘‘अकबर नामा’’, लाहौरी कृत ‘‘बादशाहनामा’’, मुहम्मद काजिम का लिखा ‘‘आलमगीर नामा’’, सुजानराय खत्री के ‘‘खुलासुत-उल-तवारीख’’ ईसरदास नागर कृत ‘‘फुतूहाते आलमगीरी’’, भीमसेन बुरहानपुरी का ‘‘नुस्का-ए-दिलखुश’’ आदि फारसी ग्रंथों में राजस्थान संबंधी कई प्रसंग आये हैं । इनमें क्रूबद्ध वर्णन के साथ-साथ तिथियों का सही उल्लेख भी मिलता है । डाॅ. वी. एस. भार्गव ने ठीक ही कहा है कि ‘‘मुगलों के दरबार में राजपूत राजाओं की स्थिति उनकी नियुक्ति, पदोन्नति इत्यादि का उल्लेख इन साधनों में मिलता है ।’’ -27/220.

राजस्व

- राजकोष की आय का मुख्य साधन व्यवस्था एवं वाणिज्य-व्यापार के कर थे । ऐसे राजस्व को ‘‘जकात’’ कहते थे । यद्यपि मुस्लिम-शासन में मुसलमानों से लिया जाने वाला धर्मार्थ कर ‘‘जकात’’ था, किन्तु राजस्थान में यह व्यवसाइयों से प्राप्त् किया जाने वाले करों की समग्रता का सूचक बन गया । व्यापारिक वस्तुओं के आयात-निर्यात और आवागमन पर लिये जाने वाले कर को मेवाड़ में ‘‘दाण’’ तथा वसूली करने वाले अधिकारी को ‘‘दाणी’’ कहा जाता था । अन्य राज्यों में इसे ‘‘सायर’’ अथवा ‘‘जकात’’ कहा जाता था । चुंगी की चैकियां राज्य के प्रत्येक रास्तों के मुहाने पर बनी हुई होती थी । परगना की चुंगी का अधिकारी ‘‘दरोगा’’ होता था जिसके अधीन मारवाड़ में मुशरिफ, फोतेदार, बटवाल, तुलारा तथा कई चैकीदार होते थे । जयपुर राज्य में चैैकीदार को ‘‘चैकीयात’’ कहते थे । कोटा में कारकुन, बदरनवीस, खजांची, बेलदार तथा चैकीदार की जगह ‘‘टहलवा’’ होतेे थे । चैकीदार बाजारों में घूम-घूम कर व्यापार पर नजर रखता था । ‘‘तुलाटी’’ द्वारा आने-जाने वाले माल को तोला जाता था । मुशरिफ, दरोगा अथवा कारकून के प्रतिनिधि के समक्ष यह कार्यवाही की जा सकती थी । इस प्रकार व्यापारिक-कूंत की रिपोर्ट कारकूनों अथवा मुशरिफ के माध्यम से इत्तला-नवीस या वाकया-नवीस और हकीकत-नवीस को पहुंचाई जाती थी । यह संपूर्ण जानकारी दीवान को भेजते थे । माल के वनज और कूंत की रसीद अर्थात् चिट्टी व्यापारी को दी जाती थी जिसके कारण आवश्यकता पड़ने पर उसे दिखा सके । कर की चोरी करने वाले व्यापारी चैकीदारों द्वारा पकड़े जाने पर दण्डित किये जाते थे । यह दण्ड आमील और मुशरिफ के परस्पर निर्णय द्वारा निश्चित किया जाता था । व्यापारियों से संग्रहित कर सीधा राज्यकोष में जमा कराया जाता था । दरोगा द्वारा भेजे गये राजस्व की सांख्यिकी रखी जाती थी । जमा रकम की सूचना इत्तलानवीस या हकीकत नवीस द्वारा दीवान के कार्यालय में पहुंचती थी । व्यापारी करों में छूट की सूचनार्थ प्रति परवाना और सनद द्वारा राजस्व के अधिकारियों को निर्देशन के लिये भेजी जाती थी । नगर में कोटवाल व्यवस्थापन, प्रशासनिक तथा न्याय संबंधी कार्यों के अतिरिक्त चुंगी अधिकारी भी होता था । वह शहर में चुंगी वसूली का उत्तरदायी ही नहीं, अपितु अन्य शुल्क जैसे मापा, हटवाल, हांसील, तथा तुलाने का शुल्क भी वसूल करता था । ऐसी वसूली का स्थान ‘‘कोतवाली चबूतरा’’ कहलाता था । वहां से प्राप्त राशि अथवा जिन्स राजकोष या भण्डार में भेज दिये जाते थे । इस कार्य में सहायता करने वाले अधिकारी व कर्मचारी मुरूारिफ, फोतेदार, कारकून, बंटवाल, तुलाटी और चैकीदार होते थे । जबकि गांवों में चुंगी वसूली की देखरेख चैधरी या पटेल करते थे । चुंगी वसूली का भी ‘मुकाता’’ दिया जाता था तब उस क्षेत्र की वसूली का कार्य मुकातेदार अपने व्यक्तिगत कर्मचारियों से कराता था । जागीर क्षेत्र में जागीरदार इस कार्य को करते थे । ‘‘दाण’’ के अतिरिक्त वन्य-उत्पादन और उसके प्रयोग करने वालों से भी कर लिया जाता था । जयपुर राज्य में वन का अधिकारी दरोगा होता था जिसके मातहत ‘‘हरकारा’’ होते थे । हरकारा नामक कर्मचारी गांव-गांव घूमकर निरीक्षण करते थे कि कोई वन्य उत्पादन का अवैध दोहन तो नहीं कर रहा है । वन्य-उत्पादन और उसके प्रयोग पर ‘बराड़’ के रूप में कर लिया जाता था । अलग-अलग राज्यों में ऐसी ‘‘बराड़ें’’ अलग-अलग नाम से जानी जाती थी, यथा घास चराई पर झार, चत्र या पान चराई, ऊंटी चराई, बकरावाब, भैंस बराड़, घासमारी, काठाधान, एवड़ बाब, और थूम्बी कहा जाता था, पत्तल दोने बनाने के लिये ढाक और पीपल के वृक्ष के पत्तों को काम में लेने के कारण नाईयों पर छोला-बराड़, कुम्हारों द्वारा बर्तन पकाने के ईंधन पर आग री बराड़, जलाऊ लकड़ी के लिये प्रति बैलगाड़ी पर कबाड़ा बाब, तेलियों से घाणी-बराड़, गांेद लाने वालों से गोंद का हांसिल तथा ईंधन के लिये गांव पर सामूहिक-कर के रूप में ‘‘लाकड़’’ लिया जाता था । बीकानेर में ऐसा कर ‘‘काठा’’ कहलाता था । जयपुर राज्य में दरख्त की बिछोटी, मारवाड़ में कबाड़ा बाब तथा मेवाड़ में इसे ‘‘खड़-लाकड़’’ कहा जाता था । जागीरदारों से भू-राजस्व के अतिरिक्त ‘‘खड़लाकड़’’ की राशि भी प्राप्त की जाती थी । पर ऐसी राशि उसकी जागीर में वन होने पर ही ली जाती थी । खान और नशीले पदार्थ के राजस्व हेतु इन्हें मुकाता पर उठाने की परंपरा थी । नशीले पदार्थों में राजस्थान भांग, गांजा, चरस, अफीम और शराब का उत्पादन करता था । इसके अतिरिक्त कई प्रकार के लाग-बाग तथा नेग-नूंत भी परंपरागत शुल्कों के रूप में प्रचलित थे जो राज्य की आय का साधन थे । कई राज्यों में ऐसे शुल्क पट्टे द्वारा अर्थात् समुदाय से एकत्रित किये जाते थे, जैसे व्यापारियों से मण्डी भाड़ा, शराब बनाने वालों से कलाली पट्टा आदि जातिगत शुल्क भी लिये जाते थे जैसे लकड़ी का काम करने वाले खेरादियों से एरन-पट्टा । गृह-कर के रूप में घर बराड़ कोटा में, मारवाड़ व मेवाड़ में घर गिनती बराड़, बीकानेर में ‘‘धूंवण’’ ली जाती थी । -27/210.-12.

भूमि राजस्व

-परगने के अन्तर्गत राजस्व की दृष्टि से गांव तीन भागों में विभक्त थे- 1. जागीर के गांव, 2. खालसा के गांव और 3. शासनिक गांव या धर्मार्थ गांव । भू-राजस्व की प्राप्ति के लिये शासनिक गांव निरर्थक था क्योंकि ऐसे क्षेत्र धमार्थ दान किया जाता था, अतः उसका राजस्व माफ कर देता था । ऐसेे गांव ‘माफी के गांव’ कहलाते थे और जिन्हें यह प्रदान किया जाता उसे ‘माफीदार’ कहते थे । जागीर के गांवों का राजस्व ‘जागीरदार’ प्राप्त करता था और उसके बदले वह राज्य की सैनिक सेवा और आय का कुछ अंश ‘छटूंद’ के रूप में राज्य को देता था । अतः केन्द्रीय राजस्व का मुख्य आधार ‘खालसा’ क्षेत्र के गांव और उसके निवासियों द्वारा प्रदत्त शुल्क थे । भू-राजस्व की दृष्टि से गांव ‘असली’ और ‘दाखली’ में वर्गीकृत थे । इसमें प्रथम प्रकार के गांव से विकासशील गांव होने के कारण ‘दाखली’ का राजस्व कम होता था । कोटा राज्य में ‘दाखली’ को ‘मझरा’ कहा जाता था । दाखली गांव के कृषक अपनी भूमि को विक्रय और ऋण पर नहीं रख सकते थे । ऐसे गांव के किसान आसामी या ‘रीयाया ’ कहे जाते थे । खालसा के गांव में एक वर्ग और भी था जिसे ‘मुकाता’ अथवा ‘इजारा’ के गांव कहा जाता था । जिन गांवों का राजस्व एकत्रिकरण के लिये ठेके पर दे दिया जाता था उनके राजस्व संग्रहकर्ता स्वामी ‘मुकातेदार’ अथवा ‘इजारेदार’ कहलाता था । यह लोग समझौतों के आधार पर अपनी मेहनत की राशि प्राप्त कर शेष राजस्व केन्द्र में जमा कराते थे । राज्य के आर्थिक संकट के समय में रूपयों को ऋण पर देने के बदले भी गांव ‘मुकाते’ पर दिये जाते थे । ऋण की अदायगी तक उस गांव के राजस्व का उपयोग ‘मुकातेदार’ करता था । राजस्व के निर्धारण करने के उपाय अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग थे । यहां तक कि राज्य के विभिन्न हिस्सों में भी एक समान नहीं थे । पर यह बटांई अर्थात् उत्पादन के भाग, लाटा-कूंता, कनकूत अथवा जब्ती के किसी न किसी एक उपाय द्वारा निर्धारित किये जाते थे । -27/208-9.

अमील

 -जयपुर राज्य में ‘अमील’ कहे जाने वाला परगने का राजस्व अधिकारी जोधपुर राज्य में ‘कारकून’ के नाम से जाना जाता था । कोटा में उसे ‘ताल्लुकदार’ और मेवाड़ में ‘चैधरी’ कहा जाता था । अमील द्वारा निर्धारित किये गये कर का वह संग्रहकर्ता होता था । इसके अतिरिक्त वह कृषि की व्यवस्था को अच्छी बनाये रखने के लिये नियमों का नियामक, नये गांव का गठन करने, गांवों में जनसंख्या को स्थिर रखने अर्थात् आबाद करने, सही समय पर करों का निर्धारण हो उसकी व्यवस्था करने, किसानों को अधिक उत्पादन की ओर प्रेरित करने, किसानों की शिकायतों को दूर करने, प्राकृतिक विपदा के समय राजस्व कर की छूट के लिये एवं किसानों की राहत के लिये ‘‘तकावी’’/सहायता शासक को अनुशंसा भेजने, राजस्व निर्धारण के समय गांव में स्वयं जाने अथवा अपने प्रतिनिधि को भेजने आदि का कार्य करता था । अमील सदैव कार्य के प्रति जागरूक रहने पर ही शासक से सम्मान पाता था । पटेल द्वारा फसल पकने पर अमीन को राजस्व निर्धारण करने के लिये सूचना देता था और अमीन के निर्धारण राजस्व को अपनी देखरेख में अमील वसूल करता था । -27/209.

फौजदार

 -यह परगने की पुलिस तथा सेना का अध्यक्ष होता था । परगने की सीमा की सुरक्षाभी इसके नियंत्रण में रहती थी । यह अमलगुजार, ‘अमीन’ तथा ‘आमिल’ को परगने का राजस्व वसूल करने में सहायता पहुंचाता था । इसके अधीन थाने होते
थे । इन थानों पर ‘थानेदार’ नामक अधिकारी होता था जो कि चोर-डाकुओं का पता लगाने और उन पर निगरानी रखने का कार्य करता था । परगने के ये अधिकारी समय-समय पर अपने अधिकार क्षेत्र का भ्रमण भी करते थे । ग्रामवासियों की प्रार्थना प्रत्यक्ष सुनी और समझी जा सकती थी । इन अधिकारियों का समय-समय पर स्थानान्तरण भी किया जाता था।    -27/208


Copyright © Rajfolkpedia.com 2016 All rights reserved.                                                                                                                                                                          Website Developed By: Representindia.com