वागरवाळ

-ढोलामारू रा दूहा में ढाढ़ी के लिये ‘वागरवाळ’ का पाठान्तर विद्वानों ने ‘मांगणवाळ’ माना है । वागरवाळ अर्थत् वांणी या सरस्वती के वर को पालने वाले, यो वे जिन्हें वाणी या सरस्वती का वर प्राप्त है, जिसके अनुसार ‘वागरवाळ’ का तात्पर्य कलावंत, विज्ञ या वाग्विदग्ध व्यक्ति से है । ढाढ़ी लोग बड़े विद्या व्यसनी और कुशल गायक हुआ करते थे । आगे चल कर जब ढाढि़यांे ने गायन कला को अपना पेशा बना लिया तथा उनकी कलाभिरूचि के पीछे पुरस्कार पाने की लालसा ही प्रमुख हो गई तो उनकी पद प्रतिश्ठा क्षीण हो गयाी और वे मुख्यतः याचक के रूप में ही देखे जाने लगे, जैसे कि दूहे में इनके लिये ‘मांगणहार’ शब्द का प्रयोग हुआ है ।...ऐसी स्थिति में वागरवाळ का अर्थ ‘वागळ’ अर्थात् झोली धारण करने वाला सर्वथा संगत और उचित प्रतीत होता है । जब ढाढ़ी अपने जजमानों के यहां मांगणी करने के लिये जाते हैं तो कंधे पर झोली लटका कर ले जाते हैं । राजस्थानी में ‘वागळ’ शब्द झोली के लिये प्रचलित है । -विश्वम्भरा पृ. 58-60, वर्ष 8, अंक 1, 1973.

झीमा चारणी री वात

-झीमा चारणी री वात’ के अनुसार झूमा बहुत दिनों तक उच्च कुल के राजपूत पति की खोज में इधर उधर अवश्य घुमती रही । उसके हाथ पर कोई शंख का चिन्ह था जिससे विश्वास किया जाता था कि जो कोई भी पुरुष इस लड़की से विवाह करेगा वह उसके हाथ में अंकित शंख के निशान को देखते ही मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा ।.... बुध भाटी के साथ झूमा का विवाह धोखे से होना वर्णित है ।...झूमा को दाम्पत्य सुख नहीं मिला और वह सदा काव्य रचना करती हुई अनेक राज्यों में घुमती रही -
-रानी ऊमादे अचलदास खीची री वात - ऊमा कागद मोखळै, झूमा वैगी आव,
दुख सुख भेळा काटसां, रूठौ खीची राव ।1।
धिन ऊंमादं सांखली, तैं पिव लियो मुलाय,
सात वरस रौ बिछड़्यो, तो किम रैन बिहाय ।2।
किरती माथै ढळ रही, हिरनी लूंवा खाय,
हार सटे पिव आणियौ, हंसै न सामौ थाय ।3।
काले अचल मोलावियों, गज घोड़ा रै मोल,
देखत ही पीतल हुऔ, सोकत ल्यारे बोल ।4।
धिन्न दिहाड़ो धिन्न घड़ी, मैं जाण्यौ थो आज,
हार गयो पिव सो रह्यो, कोई न सरियौ काज ।5।
..................................................
ले सखी थारौ बालमोैै, उर दै म्ळारौ हार ।6!
लालां मेवाड़ी करे, बीजे करे न कोय,
गायो झीमा चारणी, ऊंमा लियो मोलाय ।7।
पगै बजावूं घूघरूं, हाथ बजावूं तूंब,
ऊंमा आंचल मोलावियो, ज्यूं सांवण री लूंब ।8!
आसावरी अलापियौ, धिन झीमा धन जांण,
धिन जूंणे दीहनै, मनावणे महिरांण ।9। -विश्वम्भरा-पृ. 51-7, वर्ष-1, अंक-2, वि.सं. 2019.

ख्यात

-1. इतिहास संबंधी विवरण । 2. प्रशस्ति सूचक रचना । 3. वृत्तांत, वर्णन । 4. कथा । 5. वन । 6. यश, ख्याति ।-32/304.
-ख्यात इतिहास को कहते हैं । ख्यात बड़ी होती है और वात छोटी ।..राजकीय ख्यातों के लेखक राजकीय कर्मचारी, पंचोली आदि लोग थे । पर कई व्यक्तियों ने स्वतंत्र रूप से भी ख्यातें लिखी हैं । इनमें नैणसी, दयालदास और बांकीदास के नाम विशेष महत्व अलग अलग व पूर्ण हैं । इनकी ख्यातों का महत्व ऐतिहासिक ही नहीं, किन्तु साहित्यिक भी है । ख्यात के दो प्रकार किये जा सकते हैं - 1. जिनमें सळंग या लगातार इतिहास हो, जैसे दयालदास की ख्यात । 2. जिसमें अलग अलग ‘बातों’ का संग्रह हो, जैसे नैणसी की ख्यात । 15/प्रस्ता.-1-2.
-राजस्थानी भाषा में लिखित गद्य-साहित्य के अन्तर्गत अनेक ख्यातें प्राप्त होती हैं, जिनमें बांकीदासरी ख्यात, मुंहता नैणसीरी ख्यात, राठोड़ांरी ख्यात, सीसोदियांरी ख्यात, कछवाहांरी ख्यात, जोधपुररी ख्यात, महाराजा मानसिंघजीरी ख्यात और चहुवांण सोनगरांरी ख्यात विशेष प्रसिद्ध है । 10/ सं.व.-1.                                                    -इतिहास जानने में ‘‘ख्यातों’’ का महत्वपूर्ण स्थान है । ख्यातों में प्रायः प्रसिद्ध राजपूत राजवंशों की स्थापना, राजाओं का वंशक्रम, राज्य क्रम आदि का वर्णन मिलता है । ख्यात को ‘पीढि़यावली’ व ‘वंशावली’ का विकसित रूप कह सकते हैं । ख्यातें मुख्यतः अकबर के समय की लिखी मिलती हैं । भूतपूर्व राज्यों में कम से कम एक ख्यात तो अवश्य ही मिल जाती है । अधिकांश ख्यातें 16वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में लिखी गईं थीं, किन्तु इनमें 15वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध से ही ऐतिहासिक वर्णन है । कुछ ख्यातें तो मूल रूप में नहीं मिलती हैं उन्हें पुनः सुधारा गया तथा उनमें कई प्रसंग जोड़ कर बाद के काल का इतिहास भी लिख दिया गया है । ये ख्यातें अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन से परिपूर्ण हैं । इनमें अपने-अपने राज्य का महत्व बतलाने का पूरा प्रयास किया गया है । ऐसी ख्यातें डाॅ. गौ.ही. ओझा के अनुसार जोधपुर राज्य में काफी मिलती हैं । -27/216.
-प्रमुख ख्यातें इस प्रकार हैं - अथ ठिकाणां मुखिड़ री पुस्तक री नकल; राठौड़ री ख्यात जोधपुर री; परगना फलौदी रै गांव खारिया रै पतावतों री ख्यात रौ खुलासौ; ठाकुर रणजीतसिंहजी री ख्यात; परगने जालौ रे गांप भवरा कारै राठौड़ बभूतसिंहजी खांप बढ़लावतों री पीढि़यां री ख्यात; परगने सोजत रै गांव बगड़ी खांप जेतावतां री ख्यात; खांप कुमावतों री ख्यात; खांप करणोतां री ख्यात; खांप जोधाजी री ख्यात; महाराजा अजीतसिंघ जी री ख्यात, खांप कांधलोत राठौड़ां री ख्यात; खांप भिंबोत राठौड़ां री ख्यात; खांप करम-सोतां री ख्यात; उदावतां री ख्यात; खांप मांडणोतां री ख्यात; ख्यात री बही बणसुर जादुदान री बही री नकल; महाराजा श्री जसवन्तसिंह री ख्यात; ख्यात राव सीहाजी री; दिल्ली राजा पातसाह हुया जिणारी ख्यात; मूतां नैणसी री ख्यात; अथ ख्यात श्री कुचामन री; महाराजा सवाई सूरसिंघजी री ख्यात; राव श्री मालदेवजी री ख्यात; राव श्री सातलजी री ख्यात; महाराजा श्री रामसिंघजी री ख्यात; महाराजा श्री अभयसिंहजी री ख्यात; परगना नागौर रे गांवां री ख्यात; परगना बिलाड़े रे गांवां री ख्यात; खांप भादावत, चांपावत अर कुंदावतां री ख्यात; मुदियाड़ ठिकाणे री ख्यात; ख्यात बीकानेर रै राठौड़ां री; दयालदास री ख्यात; ख्यात नैणसी री; जोधपुर री ख्यात; जोधपुर रा महाराजा मानसिंहजी री नै तख्तसिंहजी री ख्यात; बांकीदास री ख्यात-30/140.

 

 

जसनाथी संप्रदाय के कवि

1. सोभोजी सोनी: ये जाति के सुनार थे और लिखमादेसर, चुरू ग्राम की ‘जसनाथजी की बाड़ी’ के सेवक थे । यद्यपि सोभेजी सोनी कर फुटकर रचना में उनका केवल एक ही सबद मिला है किन्तू गं्रथाकार रचना में इनका ‘गोपीचंदौ’ नामक एक काव्य मिलता है जो लोकगाथा काव्य परम्परा के समकक्ष की रचना है जिसमें गौड़ बंगाला के राजा गोपीचंद की वैराग्य मूलक कथा का वर्णन है ।
-2. हरजी:-इनका ‘सबद’ जसनाथी सिद्ध गायको द्वारा बड़े आदर के साथ गाया जाता है । ‘सबद’ यज्ञ विशयक होने के कारण जसनाथी संप्रदाय के लिये अपेक्षकृत अधिक महत्व का है । यज्ञ याग जसनाथ्ज्ञी संप्रदाय का धर्माधार है । पांडवों द्वारा आयोजि राजसूय यज्ञ का प्रस्तुत सबद (पांडवों रौ जिग) में बड़ा ही रोचक वर्णन हुआ है ।
-3. गांगोजी:- ये जसनाथी संप्रदाय के प्रमुख चतुर्धामों मंे से प्रमुख धाम लिखमादेसर, चुरू में किसी के यहां खाती कुल में उत्पन्न हुए थे । जसनाथी सिद्धों में यह प्रवाद प्रचलित है कि इन्होंने केवल एक ही ‘सबद’ सृजित किया था । गांगोजी ने अपने इस सबद में आचरण शुद्धि एवं दान पुण्य करने पर बहुत जोर दिया है ।
-4. मोहन: - इनके ‘भादवो’ अभिधान वाले सबद में जो मोहन नाम की छाप लगती है इसी से कवि के साथ पाठक का परिचय होता है तथा कवि का यह सबद ही उनका कीर्ति शरीर है ।
-5. दयाल या दयालनाथ: -इनका ‘चंपलौ’ पाम वाला सबद जसनाथी गायको का प्रिय सबद है जो सोरठ राग में या प्रभाती राग में गाया जाता है । -विश्वम्भरा पृ. 49-55, वर्ष -9, अंक-1, सं.

उत्तरपद

-किसी यौगिक शब्द का अंतिम शब्द ।   -18/383.


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