राजस्थानी

-राजस्थानी साहित्य ऐतिहासिक सामग्री जुटाने में पूरा योग देता है । यह साहित्य काफी प्राचीन एवं समृद्ध है । अगरचंद नाहटा का विचार है कि -राजस्थान के साहित्य की परम्परा नियमित रूप से 8वीं शताब्दी से आगे बढ़ती है ।’ राजस्थानी भाषा के साहित्य में ‘‘रासो’’ अधिक लोकप्रिय रहे हैं । 16वीं शताब्दी के पूर्व लिखे गये ‘‘रासो साहित्य’’ के अन्तर्गत ‘‘वीसलदेव रासोख् पृथ्वीराज रासो’ और ‘क्यामखां रासो’’ ऐतिहासिक दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण माने जाते हैं । रासो साहित्य से हमें तत्कालीन राजपूत राज्यों की राजनीतिकष् सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों की जानकारी मिलती है । वि.सं. 1490 की ‘‘अचलदास खीची री वार्ता’’, गाडण शिवदान लिखित गागरोन के खीची शासकों का समझने के लिये, वि. सं. 1512 का पद्मनाभ द्वारा लिखा ‘‘कान्हड़दे प्रबंध’’ से अलाउद्दीन खलजी के जालोर आक्रमण, तुर्कों की युद्ध पद्धति, राजपूतों की सैनिक व्यवस्था, सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक दशा का बोध होता है । बीकानेर के महाराजकुमार दलपतसिंह ने ‘‘दलपत विलास’’ की रचना की । यद्यपि यह ग्रंथ पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं हुआ है तथापि इसमें हमें कई ऐतिहासिक गुत्थियों को सुलझाने में सहयोग मिलता है, यथा- अकबर ने हेमू का वध नहीं किया था, इसकी जानकारी के लिये यही एक मात्र साधन है । कुंवर पृथ्वीराज राठौड़ रचित ‘‘वेलिकृष्ण रूकमणी री’’ से तत्कालीन रीति रिवाज, वेश भूषा, रहन-सहन आदि का विस्तृत विवरण मिलता है । जोधपुर के महाराजा अभयसिंह के समय में चारण कवि वीरभांण ने ‘‘राजरूपक’’ ग्रंथ की रचना की जिसमें अभयसिंह तथा सरबुलन्दखां के बीच हुए अहमदाबाद के युद्ध का आंखों देखा वर्णन है । कविया करणदान लिखित ‘‘सूरजप्रकाश’’ में महाराजा जसवन्तसिंह, अजीतसिंह तथा अभयसिंह के समय की घटनाओं का बड़ा सुंदर वर्णन है । इसके अलावा उस समय के रीति रिवाज, खानपान, वेशभूषा, विवाह, उत्सव, शिकार, दान, पुण्य, यज्ञ आदि की जरनकारी भी मिलती है । ऐतिहासिक स्रोत के रूप में महाराणा राजसिंह कालीन मानकवि द्वारा लिखित ‘‘राजविलास’’ एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है । राजस्थान के ऐतिहासिक गद्य के अनेक रूप हैं, जैसे- ख्यात, वात, वंशावली,पीढि़यावली, पट्टावली, विगत, हकीकत, हाल, याद आदि । ‘ख्यात’ इतिहास का ही रूप होता है । ‘बात’ में किसी जाति या व्यक्ति अथवा घटना या प्रसंग विशेष का संक्षिप्त इतिहास होता है । ‘ख्यात’ की तुलना में ‘‘वात’’ छोटी होती है । ‘‘वंशावली’’ व पीढि़यावली’ में पीढि़यां दी जाती हैं, उनके साथ व्यक्तियों का संक्षिप्त अथवा विस्तृत परिचय भी प्रायः दिया जाता है । प्राचीन काल के चारण, भाट, मोतीसर, राणीमंगे आदि अपने यजमानों की वंशावलियां एवं उनकी उपलब्धियांे का गुणगान करते थे तथा उन्हें अपनी पोथियों में संक्षेप में दर्ज कर देते थे । ‘पट्टावली’ में सामन्तों, जागीरदारों की जागीरों का विवरण है । इसी प्रकार ‘‘हकीकत’’ व ‘‘हाल’’ में किसी घटना या प्रसंग विशेष का विस्तृत वर्णन मिलता है । ‘‘वचनिका’’ ऐतिहासिक काव्य तथा ‘‘याद’’ याददाश्त को कहते हैं ।  -27/215-6.

संस्कृत साहित्य

-राजस्थान के पुरातन इतिहास के लिये वेद, पुराण, रामायण व महाभारत से बड़ी सहायता मिलती है । मध्यकालीन राजस्थान के इतिहास के लिये भी कई ग्रंथ हैं जो अनूप संस्कृत लायब्रेरी, बीकानेर, पुस्तक प्रकाश, जोधपुर, प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर उदयपुर आदि स्थानों में सुरक्षित है । 12वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जयानक लिखित ‘पृथ्वीराज विजय महाकाव्य’ से हमें चौहानों की राजनैतिक एवं सांस्कृतिक उपलब्धियों का वर्णन मिलता है । जयचन्द्र सूरिकृत 1403 ई. का ‘‘हमीर महाकाव्य’’ चौहानों के इतिहास के साथ-साथ उलाउद्दीन खिलजी की रणथम्भोर विजय तथा उस समय की सामाजिक, धार्मिक अवस्था की जानकारी भी उपलब्ध करवाता है । मंडन विरचित 15वीं शताब्दी का ‘‘राजवल्लभ’’ स्थापत्य कला को समझने के लिये बड़ा महत्वपूर्ण है । कुंभा द्वारा रचित ‘‘एकलिंग महातम्य’’ से गुहिल-शासकों की वंशावली तथा मेवाड़ के सामाजिक संगठन को समझा जा सकता है । ‘‘राज विनोद’’ से बीकानेर के 16वीं शताब्दी के राजनैतिक एवं सांस्कृतिक जीवन की झलक मिलती है । रणछोड़ भट्ट कृत ‘‘अमर काव्य वंशावली’’ तथा जीवधर रचित ‘‘अमरसार’’ में महाराणा प्रताप व अमरसिंह के समय का वर्णन मिलता है । ‘‘भट्टि काव्य’’ से जैसलमेर के बारे में जानकारी मिलती है । सदा शिव कृत ‘‘राजरत्नाकर’’ में महाराणा राजसिंह के समय का वर्णन मिलता है तथा जगजीवन भट्ट के ‘‘अजितोद्रय’’ से मारवाड़ के अजीतसिंह काल की घटनाओं की जानकारी होती है । सीताराम भट्ट कृत ‘‘जयवंश महाकाव्यम्’’ तथा श्रीकृष्ण भट्ट विरचित ‘‘ईश्वर विलास महाकाव्यम्’’ में जयपुर के जयसिंह तथा ईश्वरी सिंह के बारे में तथा तत्कालीन राजनैतिक, सामाजिक व धार्मिक स्थिति का पता लगता है । -27/214-5.
-महाराजा सूरसिंह (1595-1619 ई.) की आज्ञा से जोधपुर नगर वास्तव्य श्रीमाली ज्ञातीय माधवभट्ट ने ‘सूरसिंह वंशप्रशस्ति’ नामक एक काव्य की रचना की थी, जिसे अन्य स्थलों पर ‘राष्ट्र्कूट -वंशावली’ अभिधान से भी बोधित किया गया है । चार सर्गात्मक इस काव्य के प्रथम सर्ग में पौराणिक क्रमानुसार ब्रह्मा द्वारा सृष्टि संरचना वर्णित है । इसी अनुक्रम में मरीचि से लेकर राजा वंभ तक विस्तृत वंशावली दी गई है । इस क्रम में कवि ने इन पौराणिक शासकों के जीवन एवं तत्कालीन युद्धपरक घटनाओं का प्रमुख रूप से चित्रण किया है । द्वितीय सर्ग वंभ वंशान्वयियों से प्रारंभ कर राव जोधा तथा बीकानेर एवं मेड़ता के प्रमुख राठौड़ों का चित्रण किया गया है । तृतीय सर्ग में महाराजा सूरसिंह की गुजरात एवं दक्षिण भारत की विजय यात्राओं का विस्तार से उल्लेख है । ‘सूरसिंह वंशप्रशस्ति’ मूलतः एक ऐतिहासिक काव्य है, जिसमें काव्य एवं इतिहास का सुन्दर समन्वय है । काव्य का अंगी रस वीर है । युद्ध के नीरस वर्णनों से विकल मानवीय मन को रिझाने हेतु काव्य में स्थान-स्थान पर श्रृंगारपरक विश्राम शय्याओं का निर्माण किया गया है, जहां प्रकृति के सुरम्य वातावरण में परभूतों का कमनीय कलरव व षट्पदों के मधुर गुंजन के साथ कोमलांगियों के हास-परिहास भी वर्णित है । शब्द एवं अलंकारों के प्रयोग एवं वैविध्य में कवि निष्णांत प्रतीत होता है । प्रशस्तिकार ने काव्य के द्वितीय सर्ग में सम्राट जयचन्द्र के पुत्र जयसेन का उल्लेख किया है जिसका अन्य ख्यातों व विगतों में उल्लेख नहीं मिलता ।........मारवाड़ का द्वितीय वर्ण्य काव्य ‘‘तख्तविलास चम्पू’’ 19वीं शताब्दी की संस्कृत साहित्य परम्परा का एक अद्वितीय उदाहरण है । मारवाड़ के महाराजा अजीतसिंह (1707-1724 ई.) के काल में दो महत्वपूर्ण ऐतिहासिक काव्यों की रचना की गई थी । जगजीवन भट्ट ने ‘अजीतोदय’ एवं दीक्षित बालकृष्ण ने ‘अजीत चरित्र’ नामक काव्य लिखा था । ‘अजीतोदय’ में मारवाड़ की ऐतिहासिक घटनाओं व मुगल-मारवाड़ संबंधों का विस्तार से वर्णन है । इसके अलावा जोधपुर नगर का वर्णन, मण्डोर के बगीचे का सौन्दर्य तथा जन्म, मृत्यु व विवाहादि अनेक विषयों का इसमें समावेश है । महाराजा अभयसिंह के सम्मान में (1724-1749 ई.) ‘अभयोदय’ काव्य लिखा गया तथा भीमसिंह की प्रशंसा में (1793-1803 ई.) ‘भीमबन्ध’ नामक काव्य की रचना की गई । इसके अलावा ‘मानसिंह प्रशस्ति’, ‘मानभास्करोदय चम्पू’ नामक दो अल्प ज्ञात काव्य भी मिलते हैं, जिनमें तत्कालीन सामाजिक एवं धार्मिक व्यवस्था के साथ-साथ उस युग की परम्परा, विचारधारा एवं सामाजिक संगठन के भी दर्शन होते हैं । वास्तव में संस्कुत भाषा एवं साहित्य के संरक्षणार्थ महाराजा मानसिंह के काल में ‘पुस्तक प्रकाश’ नाम से हस्तलिखित ग्रंथों का एक संग्रहालय खोला गया तथा तत्कालीन मारवाड़ में उपलब्ध महत्वपूर्ण हस्तलिखित ग्रंथों की पाण्डुलिपियां मंगवाकर यहां सुरक्षित रखी गई । 1885 ई. में इस संगह में 1230 हस्तलिखित ग्रंथों का संग्रह था जिनका संबंध इतिहास, काव्य, वेद, दर्शन, व्याकरण, काव्यशास्त्र, संगीत, कोष आदि विविध विषयों से था । नाथ संप्रदाय के प्रभाव के कारण योग के भी अनेक ग्रंथ यहां इकट्ठे हो गये थे, जिनमें अद्भुत योग, गोरक्ष संहिता, जलंधर संहिता आदि प्रमुख हैं । मानसिंह द्वारा प्रणित ‘मुण्डकोपनिषद्’ की टीका एवं नाथ चरित्र भी इस संग्रह के महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं । मानसिंह के दत्तक पुत्र तखतसिंह (1843-1873 ई.) स्वयं संस्कृत भाषा के विद्वान व विद्याप्रेमी थे । इनके आश्रित शेष नामक कवि ने ‘तख्तविलास चम्पू’ नामक काव्य की रचना की । ‘गद्यपद्यमयंकाव्यम् चम्पूरित्यभिधीयते’ के अनुसार गद्य-पद्य के सुन्दर समन्वय के साथ काव्य की संयोजना की गई है । जहां समास बहुलता के कारण गद्य भाग कहीं-कहीं क्लिष्ट बन पड़ा है, वहीं सरसता व सरलता के कारण पद्य भाग मनोहारी बन पड़ा है । संपूर्ण काव्य को छः काण्डों में विभाजित किया गया है । प्रारंभ में ही जोधपुर भौगिशैल पर्वत एवं तखतसिंह का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन है । जहां जोधपुर नगरी को भूमिलोक में श्रेष्ठतम, भौगिशैल पर्वत को महीतल में प्राप्त पर्वतों से पवित्रतम तथा महाराजा तखतसिंह को स्वयं चतुरानन राजोत्तमराजराजः कहकर कथाप्रसंग को आगे बढ़ाते हैं । अलोच्य कृति में तखतसिंह को विविध शास्त्रों का ज्ञाता, धर्मज्ञ, दानी, मानी एवं सुरराज के समान पराक्रमी कहा गया है । उनकी धार्मिक यात्रा वर्णन में हरिद्वार में गंगा पूजा व अर्चना का वर्णन है । इस अवसर पर तखतसिंह ने ‘गंगा स्तोत्रकी’ (10 श्लोकात्मक) की रचना की एवं ब्राह्मणों को प्रभूतमात्रा में दान देकर संतुष्ट किया । उसके अनन्तर मथुरा एवं पुष्कर यात्राओं का भी वर्णन है । पुष्कर प्रवास में तखतसिंह द्वारा ‘पुष्कर स्तोत्र’ नामक कतिपय पद्यों की रचना का उल्लेख है । संस्कृत के उद्भट् विद्वान पं. नित्यानन्दजी शास्त्री की रामचरित्र कथा और विशेषकर हनुमद्दुत-काव्य मेघदूत के वर्णन को साकार किया । महाकवि हरिराय ने अपने ‘जरासंधवध महाकाव्य’ द्वारा मरुधरा में महाकवि माघ का निरन्तर अस्तित्व सिद्ध किया, वहीं जगदीशचन्द्र आचार्य की कादम्बरी का बार-बार स्मरण कराने वाली -‘मंदाकिनी’ और उससे भी ललिति ‘मकरन्दिका’ उपन्यास ने वास्तव में साहित्य सरोवर के हंसों को मकरन्द का आस्वादन कराया । पं. गोपीकिशन व्यास का ‘साम्य संभवम्’ अथवा श्रीराम दवे का ‘भृत्याभृत्य’ काव्य साहित्य सुधासिन्धु मरूधरा में सतत् प्रवाहित रहा है । -35/40-3.

भली

-‘अमल खारा भला, खड़ग धारा भला, हेत मां रा भला, धात पारा भला, हाथ वहता भला, माल खरचता भला, दांन मांन सूं भला, काथा पांनसूं भला, साहिब जमसूं भला, खेत नीचा भला, घर ऊंचा भला, रांण पांणी पातळा भला, अमल जोर का भला, निसांण थोरका भला ।’ 14/17.

भांग

-एक प्रसिद्ध मादक वनस्पति । 2. इस वनस्पति को घोट कर बनाया गया पेय । -33/277.
-‘केसररी क्यारी, दोलळी वासग माथारी, थोहररा विडारी, भाखररा खंड़ारी, भूरै मोररी, काळै पानारी, आबूरा विहड़ांरी, भमरमार मिरघमाळ, लरियाळ, चिडि़याळ, चोटडि़याळ, अेक पान अडगरियां पान अेक पान अहमदाबाद, पान पानरो रस लीजै छै । तिण भांग सारू मसाला मंगाइजै छै । जायफळ,लांग, इळायची, मिरच, बिरहाळी अजूं नागकेसर भमरटंटी तज तमालपत्र तंबोल प्रत संथी, और ई मसाला मंगायजै छै । मिश्री कालपी गंगापाररी मंगाय कोरा घड़ांमें भिंजोयजै छै ।...इलूरारी कूंडी तेजवळरो घोटो धोय तैयार कीजै छै । भांगण वीण मोकळा पाणीसूं धोयजै छै । फेर कोरी होडीमें रांधज छै । तठा पछै घोटजै छै । भला मोटियार होसनाक जुवान बणाव छै । बेवड़ा गळणांसूं मचकाय काढ़ज छै । इसी जाडी काढ़जै छै माथै टीको काड़जै तो नीसरै, पवनरी मारी सींक ठाहरै । इण भांतरी भांग काढ़ तयार कीजै छै । कसूंबांनूं होसनाक पवन करै छै । सूं रूपांटां में लियां खवास पासेवाण हाजर करै छै । मुनहारां हुवै छै ।’ -14/9.

बातां रा छोगा

-राजस्थान में बातपोस को बात प्रारंभ से पूर्व कुछ कौतुहल व आकर्षक भूमिका निभानी पड़ती है । वह बात को सीधे ढंग से शुरू न करके कुछ वर्णन चातुर्य के रास्ते से चलता है । यह भूमिका पद्याों में होती है । ये पद्य प्रायः राजस्थान की सांस्कृतिक विशेषताओं के बारे में होते हैं । इनको ‘बड़दाव’ भी कहते हैं । कई बात की व्याख्या के बड़दाव भी होते हैं -
‘बात भली दिन पाधरा, पैंडे पाकी बोर,
घर भींडळ घोड़ा जणै, लाडू मारै चोर ।
बातां हंदा मांमला, नदियां हंदा फेर,
बहता ज बहै उतावळा, घरमर घालै घेर ।
बात बात सब अेक है, बात बात में फेर,
वैं ही लोह की कुस घड़ी, वैंकी ही समसेर ।
ज्यूंक केले के पात में, पात पात में पात,
ज्यूं चातर री बात में, बात बात में बात ।
बात बात सब अेक है, बात बात में बैण,
वौ ही काजळ ठीकरी, वौ ही काजळ नैण ।
बातड़ल्यां घर ऊजड़ै, चूल्हे दाळद होय,
जे कोई जांणै बातड़ी, बातड़ल्यां घर होय ।
बात रेवै दिन बीतज्या, समय पलटज्या काळ,
साजन सिळौ न खाइयै, जे सोने री बाळ ।
सोरठियौ दूहौ भलौ, भल मरवण री बात,
जोबन छाई धण भली, तारां छाई रात ।
बातां रा छोगा-किसी हुंकारा बिन बात, किसौ मिंत बिहूणौ साथ,
किसी चांद विहूणी रात, किसौ कडूंबा बिन भात,
किसौ प्रेम विहूंणौ मांन, किसी गायक विहूंणी जांन,
किसी बादळ बिन बीज, किसी पौंच बिन खीझ,
किसौ बळ विहूणौ बांण, किसौ तरवर बिन पांन,
किसी त्रिया बिन प्रीत, किसौ कंठ विहूणौ गीत,
किसौ पांख विहूणौ पंछी, किसी जळ विहूंणी मंछी,
किसी कपट विहूणी दासी, किसी सगा विहूणी हांसी,
किसौ मिंत विहूणौ साथ, किसी हुंकारौ बिन बात ।
2. बात सांची भली, पोथी बांची भली,
देह साजी भली, बहू लाजी भली,
लूवां बाजी भली, नौबत गाजी भली,
गाय दूजी भली, गवर ूपजी भली,
जोबन जोड़ी भली, कच्छी घोड़ी भली,
मौत मौड़ी भली, मंसा थोड़ी भली,
अंब केरी भली, माळा फेरी भली,
कांठळ काळी भली, खेत पाळी भली,
चैक नाळी भली, धीणै छाळी भली,
घाव पाटी भली, भाख फाटी भली,
विरखा बूठी भली, नांणै मूठी भली,
आई तूठी भली, विपता खूटी भली,
मैथी फाकी भली, साख पाकी भली,
पंथ गाडी भली, भैंस पाडी भली,
प्रीत गाढ़ी भली, भींत जाडी भली,
बात सांची भली, पोथी बांची भली,
केई नर सोवै, केई नर जागै-
जागतड़ां री पागड़ी ढोल्यां रै पागै,
सूतां री पागड़ी चोर ले भागै,
बात कहतां बार लागै, हुंकारै बात मीठी लागै,
बात में हुंकारौ, फौज में नगारौ-
सार बाबा सार, पल में लगार,
दुबळा सा घोड़ा, माता असवार,
जीयौ बात रा कहणिया, जीयौ हुंकारा देवणिया-
बात रा चालणा, संजोग रा पीवणा......रांमजी भला दिन दे तौ .....
गप्पें -सार रा चणा मसरकै फूटै, भैंस्यां री कमर मुक्की सूं टूटै, कीड़ी रौ धक्कौ नै माछर री लात, भांखड़ी रौ कांटौ साढ़ी
सोळै हाथ, फब जावै तौ बच्चे, नीं तौ बच्चै परभात.... -20/110-2.
-बातां री फुलवाड़ी (लेखक-विजयदान देथा, प्रकाशक-रूपायन संस्थान, बोरूंदा)से-
1. -ढगळ पांनड़ौ उड़तौ जाय, हुंकारियोै गुळ खातौ जाय,
बात केवूं साची, कांना री राधा नाची,
कोनौ छोड़्यौ तीर, राधा रौ फाट्यौ चीर ।
राधा फेंक्यौ बोर, बड़लै कूक्यौ मोर,
मोर तोड़ी डाळी, बाबा री मरगी छाळी,
बाबौ वायौ भाटौ, ठाकर रौ सिळग्यौ लाटौ,
ठाकर वगाई डांग, कांमेती री भागी टांग,
कांमेती लायौ खाट, बांमण मरग्या साठ,
बांमण बांच्या टीपणा, बागां बळग्या रींगणा,
माळी तोड़ी काकड़ी, सेठां री तूटी ताकड़ी,
सेठां ढोळ्यौ पांणी, तेली री फूटी घांणी,
तेली लायौ चाडी, घांची री मरगी पाडी,
भैंस ऊभी रांचै, सासू मरगी मांचै,
रोटी रैयगी काची, अर बात केवूं साची ।
2. -गधौ जांणै लात, ग्यांनी जांणै बात,
हीयौ जांणै पाप, मायड़ जंाणै बाप,
सांसी जांणै राड़, बेद जांणै नाड़,
जीभ जांणै मीठौ, दीठ जांणै दीठौ,
संत जांणै रांम, बणिक जांणै दांम,
कूड़ जांणै मार, पिंडत जांणै सार,
चोर जांणै चोरी, कीड़ौ जांणै मोरी,
हंस जांणै खीर, मच्छ जांणै नीर,
पुरख जांणै मांन, ईली जांणै धांन,
वेस्या जांणै प्रीत, बुढ़ा जांणै रीत,
गरू जांणै ग्यांन, खाग जांणै म्यांन,
खोज जांणै पागी, राग जांणै रागी,
जाचक जांणै लेणौ, दाता जांणै देणौ,
खाती जांणै काठ, कुम्हार जांणै माट,
ढोर जांणै चरणौ, सूर जांणै मरणौ,
3. -बात कैतां वेळा लागै, हूंकारै बात आछी लागै,
सर बाबा सार, पल में निगार,
माता सोै घोड़ा, दूबळा सो टार ।
तौ बीसां बातां रा विचार-
ओछी सींव बिचाळै भाखर, अेक गांव में दोय ठाकर,
लागत घणी नै खाली पल्लौ, अेक भाई नै वो ई निठल्लौ,
कोरौ कोड करौ क्यूं कंवरां, आंगळ डोढ़ लिलाड़- देाय भंवरां,
अेक तिल वो ई कांणौ, नित उठ पीव कढ़ावै घांणौ,
पाड़ोसण मांगै खळ रौ डळौ, कठा री तेलण कठा रो पळौ,
कठै आवती काढ़्यौ गळौ,..... तौ रांमजी भला दिन देवै-
4.-डूंगर री चढ़ाई भूंडी, सांसी री लड़ाई भूंडी,
घर में तौ पड़ाई भूंडी, ऊचलौ तौ खेत भूंडौ,
साधू वाळौ हेत भूंडौ, कुत्ती वाळौ वैंत भूडौ,
खीचड़ा में लोदौ भूंडौ, गायां मांय गोदौ भूंडौ,
घरै हिळियौ सोदौ भूंडौ, कांन मांयली कोडी भूंडी,
दाढ़ी बिना ठोडी भूंडी, घर में राड मोडी भूंडी.......
5.-जैड़ी दीख, वैड़ी सीख,
जेड़ौ खांण, वैड़ी जांण,
जेड़ौ वास, वैड़ौ अभ्यास,
जेड़ौ दीजै, वैड़ौ लीजै,
जेड़ी रात, वैड़ौ परभात,
जेड़ी करणी, वैड़ी भरणी,
6.- बाप जैड़ा बेटा, रूंख जेड़ा टेंटा,
घड़ा जेड़ी ठीकरी, मां जेड़ी डीकरी,
झाड़ जेड़ा मूळ, धरती जेड़ी धूळ,
रूई जेड़ौ सूत, माईत जेड़ा पूत,
भाखर जेड़ा भाटा, बिरखा जेड़ा लाटा,
रूंखां जेड़ा छोडा, मढ़ी जेड़ा मोडा,
7.- पिंड पांणी रौ, देवळ तौ आबू रा,
ळवेलियां तौ जेसांणै री,
गढ़ तौ चितौड़ रौ,
ताळ तौ भोपाळ रौ,
मिंदर तौ मथुरा रौ,
नीर तौ गंगाजळ रौ,
धींणौ तौ भैंस रौ,
भैंस तौ नाळी री,
बळद तौ नागौरी,
गाय तौ सांचोरी,
ऊंट नाचणा रे टोळा रा,
उजास तौ सूरज रौ,
आदर तौ माया रौ,
कांकण तौ केदार रौ,
गदा तौ भींव री,
बांण तौ अरजुण रौ,
तिलक तौ केसर रौ,
चूड़ौ तौ हस्ती दंत रौ,
रूपौ तौ जावर रौ,
मत्तौ तौ पंचां रौ,
ममता तौ मां री.....
8. -बातां हंदा मांमला, दरियां हंदा फेर,
न्दियां बहे उतावळी, दे दे घूमर घेर.....
लाई उधारौ करगी गटकौ,
मांग्यां बतायौ ताळी रौ तटकौ,
तद भागौ ववार,
पींजण घालौ खाक में, झूंपड़ी करौ जवार,
सासू आगली बहू आई, गंवू देय नै चिणौ लाई,
थोथौ चिणौ बाजै घणौ, बात करै जणौ जणौ,
खेजड़ी रौ कांटौ साढ़ी सोळै हाथ,
भागै तौ बचै नहीं, नींतर राजा रामचन्द्र रै हाथ,
जिण रा व्हिया तीन पाट,
दो सुळियोड़ा नै अेक चढ़़ै ई नीं,
ज्यांमें थपिया तीन गांव-
दो ऊजड़ नै अेक बसै ई नीं,
ज्यांमें बसिया ती कुम्हार-
दो ठोटी नै अेक घड़ जांणै ई नीं,
ज्यां घड़ी तीन हांडियां-
दो फूटोड़ी नै अेक चढ़ै ई नीं,
ज्यांमें रांधिया तीन चावळ-
दो कटकटा नै अेक सीझ्यौ ई नीं,
ज्यांमें नींवतिया तीन बिरांमण-
दो इग्यारस्या नै अेक जीमै ई नीं,
ज्यांनै दीनीं तीन गायां-
दो बांझड़ी नै अेक व्यावै ई नीं,
ज्यांरै व्हिया तीन बिछिया-
दो माठा नै अेक चालै ई नीं,
ज्यांरा वटिया तीन रिपिया-
दो खोटा नै अेक चालै ई नीं,
ज्यांनै परखिया तीन सोनार-
दो नै रात रौ रातींधौ नै अेक नै दिसै ई नीं,
ज्यांरै मारी तीन थाप-
दो टळगी नै अेक लागी ई नीं,
सार बाबा सार, पल में लिगार,
थाकोड़ा सा टारड़ा नै दूबळा असवार,
फौज में नगारौ, बात में हूंकारौ,
हुंकारै बात आछी लागै, बात नै सुणियां भाग जागै,
जीवै बात रौ कहण वाळौ, जीवै हूंकारा रौ देवण वाळौ ।
9.- नवां में लियौ नारियौ, दसां रौ चारौ चारियौ,
बीसां री बेची वाळी, तौ ई पाळी री पाळी,
भाई रै मन भाई भायौ, बिना बुलावै माडै आयौ,
गेहली रांड कळपै कांईं, घी ढुळियौ तौ ई मूंगां मांईं,
पगां उरबांणौ चालै, ठोकर वावै भाटा नै,
फाटी पगड़ी, भंवरिया पा’ड़ै, रोवै रीत रा खाटा नै,
कोरै ऊखळ बाजै घाई, फिर फिर निंवता देवै नाई,
खीच परूसै नै ठाकर छीजै, नौ लीजै नै तेरह दीजैै,
देखली सीधा री सोय, लेणा अेक नै देणा दोय....
10.-अेक राळी अर जणा पचास, ओढ़ण री करै सारा ई आस,
आधी रात रा लागी खंाचा तांणी, खातां खांण नीं पीतां पांणी,
अेक लरड़ी अर सातां रौ सीर, नित उठ पीव रंधावै खीर,
छछवारियां नै छाछ घलावै, आडौ फिर फिर माडै लावै,
मिंतरियां नै बगसै लांणी, खातां खांण न पीतां पांणी,
अेक घोड़ौ नै सातां रौ सीर, ऊभौ चरै समंदर री तीर,
बांधण नै नीं है जायगा, डोढ़ घोड़ौ डीडवांणै पायगा,
आठ बाटकी नवमीं थारी, ज्यांमें पुरसी अढ़ाई संवाळी,
उकरड़ै चढ़ नै नींवत्यौ गांव, अेक अेक गोडै तीन तीन ठांव,
पुरसण वाळी सोळै जणीं, हांती थोड़ी नै हळवळ घणी ।
11.-इत्ती बात इत्ती चींत, पाछला घर री पछीत,
पछीत बंध्या घोड़ा,
घोड़ां कीनी लीद,
लीद लेग्या कुम्हार,
कुम्हार घड़्या हांडा,
हांडा मेल्या नाडी री तीर,
आती जाती गायां फोड़ै,
क्यूं रै गंवाळिया ! आडी गेडी क्यूं नीं दे ?
कांईं करूं, मां रोटी नीं दे ।
क्यूंअ े मां ! रोटी क्यूं नीं दे ?
बेटां री बहुआं पीसै कोनीं ज्यूं ।
क्यूं अे बहुआं ! थे पीसौ क्यूं नीं अे ?
के घरटी कनै पांवणा बैठा ज्यूं ।
पांवणा ! थें ऊठौ क्यूं नीं रे ?
के मेह घणौ बरसै ज्यूं ।
क्यूं रे मेह ! घणौ क्यूं बरसै रे ?
के मोरिया घणा बोलै ज्यूं ।
क्यूं रे मोरियां ! थे घणा क्यूं बोलौ रे ?
के बादळा घणा गाजै ज्यूं ।
क्यूं रे बादळां ! थे घणा क्यूं गाजौ रे ?
के बिजळियां घणी चिमकै ज्यूं ।
क्यूंअ े बिजळियां ! थे घणी क्यूं चिमकौ अे ?
के बातां रा टमरका घणा सुणां ज्यूं ।


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