चारण हरि भक्त कवि

 -चारणों में 16 हरि भक्त कवि हुए- कर्मानन्द, अल, चैरा, चंड, ईश्वर, केशव, दूदा, जीवद, नरा, नारायण, मांडण, कोल्ह, माधवदास,
अचलदास, चैमुख और सांपा । -30/67.

बांकीदास री ख्यात

 -अपनी प्रतिभा के कारण कविराज बांकीदास ने जोधपुर के महाराजा मानसिंह के राज्य में उच्च सम्मान प्राप्त किया । कवि के साथ ही बांकीदास एक इतिहासकार भी था । नैणसी की तरह ‘‘बांकीदास की ख्यात’ भी ‘बातों’ का संग्रह है । उसकी बातें छोटे-छोटे फुटकर नोटों के रूप में है । उनमें कोई क्रमबद्धता नहीं है । ख्यात में करीब दो हजार बातों का संग्रह है । यह ख्यात ऐतिहासिक घटनाओं तथा सामाजिक व आर्थिक दशा की जानकारी के लिये एक अच्छा कोष है । जोधपुर व जयपुर की स्थापना का विस्तृत वर्णन उपलब्ध होता है । इससे यह भी ज्ञात होता है कि बीकानेर के महाराजा रतनसिंह ने वि.सं. 1885 में गया के पवित्र स्थल पर अपने मुख्य सरदारों की एक सभा बुलाकर उन्हें शपथ दिलवाई कि वे भविष्य में अपनी शिशु कन्या का वध नहीं करेंगे । बांकीदास ने त्यौहार-उत्सव, भौगोलिक स्थान, मार्ग, सिक्कों की जानकारी भी दी है । ओझा के अनुसार ‘‘यह इतिहास का खजाना है । राजपूताना के तमाम राज्यों के इतिहास संबंधी रत्न उसमें भरे पड़े हैं ।’’ -27/219.

जोधपुर राज्य री ख्यात

 -महाराजा मानसिंह के युग में लिखी गई इस ख्यात में प्रारंभ से लेकर मानसिंह की मृत्यु तक का हाल है । डाॅ. गौ. ही. ओझा ने इस ख्यात के बारे में लिखा है -‘‘लेखक ने विशेष छान‘बीन न करके जनश्रुति के आधार पर बहुत-सी बातें लिख डाली हैं, जो निराधार होने के कारण काल्पनिक ही ठहरती हैं, साथ ही राजा के आश्रय में लिखी जाने के कारण इसमें दिये हुए बहुत से वर्णन पक्षपात पूर्ण एवं एकांगी हैं ।’’ अतः इससे कई घटनाओं पर वास्तविक प्रकाश नहीं पड़ता है फिर भी जोधपुर राज्य का इतिहास जानने में यह ख्यात बड़ी सहायक है । -27/218.

मुंदियाड़ ठिकाने री ख्यात

-नागौर से 10 मील दक्षिण में स्थित मुंदियाड़ गांव राठौड़ शासकों द्वारा चारणों को दिया हुआ था । ख्यात की रचना एवं रचनाकार के बारे में अब तक कोई जानकारी नहीं मिली है । इस ख्यात में राठौड़ राज्य की/मारवाड़ में स्थापना से लेकर महाराजा जसवंतसिंह प्रथम की मृत्यु तक का जिक्र है । यदि इसकी रचना जसवंतसिंह के काल में हुई हो तो कोई आश्चर्य नहीं । मारवाड़ में प्रत्यक राजा के जन्म, राज्याभिषेक व मृत्यु की तिथियों के लिये यह ख्यात बड़ी उपयोगी है । डाॅ. वी. एस. भार्गव के अनुसार इस ख्यात का महत्व भी नैणसी की ख्यात से कुछ कम नहीं ।   -27/218.

नैणसी री ख्यात

-राजस्थान में सबसे पुरानी ‘‘ख्यात’’ नैणसी द्वारा लिखी हुई मानी जाती है । यह ख्यात कोई 280 वर्ष पुरानी है । मुहणोत नैणसी का जन्म शुक्रवार, नवम्बर 9, 1610 ई. को जोधपुर के ओसवाल परिवार में हुआ था । उनके पिता जयमल जोधपुर राज्य के दीवान थे । महाराजा गजसिंह के समय में नैणसी ने राजकीय सेवा में प्रवेश किया तथा वह करीब 20 वर्षों तक विभिन्न परगनों का हाकिम रहा । नैण्सी कलम और तलवार दोनों के ही धनी थे । महाराजा जसवन्त सिंह ने नैणसी के कार्यों से काफी प्रभावित हो, मई 18, 1658 ई. को उन्हें जोधपुर राज्य के देश-दीवान के पद पर नियुक्त किया । फिर भी नैणसी के अंतिम दिन अच्छे नहीं बीते । महाराजा जसवंतसिंह किन्हीं कारणों से उनसे नाराज हो गये थे । अतः नैणसी अपने भाई सुन्दरदास के साथ बन्दी बना लिये गये थे । ओझा के अनुसार दोनों भाइयों ने महाराजा के छोटे आदमियों की सख्तियां सहन करने के बजाय वीरता से मरना उचित समझा । इन्होंने फूलमरी गांव में बुधवार, अगस्त 3, 1670 ई. को अपने पेट में कटार मार कर शरीरांत कर लिया । नैणसी की एक कृति ‘‘मारवाड़ रा परगना री विगत’’’ तथा दूसरा मुख्य ऐतिहासिक ग्रंथ ‘‘नैणसी री ख्यात‘‘ है । इसमें राजस्थान के विभिन्न राज्यों के अतिरिक्त गुजरात, काठियावाड़, कच्छ,  बघेलखंड, बुन्देलखंड और मध्य भारत के इतिहास पर भी प्रकाश डाला गया है । ओझा का कहना है कि नैणसी का इतिहास देखने से विदित होता है कि वह जगह-जगह के चारणों भाटों आदि से भिन्न-भिन्न वंशों या राज्यों का इतिहास मंगवा कर संग्रह किया गया था । वे कहीं भी जाते थे तो वहां के कानूनगो से पुराना हाल मालूम करके लिख लेते थे, इसी भांति वह अपने रिश्तेदारों से भी संग्रह करवाया करते थे । उन्होंने प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन कर तत्संबंधी विवरण दिया है । उसने जैसलमेर के भाटियों की उत्पत्ति का विवरण ‘‘हरिवंश पुराण’’ और ‘यादवों के वंश का विवरण ‘श्रीमद्भागवत’ के आधार पर दिया है । उसने अनेकों उपयोगी काव्य ग्रंथों, विभिन्न शासकों से संबंधित गीत, दोहे, छंद व कवित्त आदि काव्य का भी संग्रह कर उन्हें संबंधित शासकों के विवरण शासकीय दस्तावेजों के आधार पर ही लिखा होगा । नैणसी की ख्यात में उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ के गुहिलोत या सिसोदिया, हाड़ा, देवड़ा, कापलिया आदि चैहानों के साथ-साथ जैसलमेर के भाटियों, जोधपुर और किशनगढ़ के राठौड़ों तथा बून्देलों, बघेलों आदि का इतिहास मिलता है । इसमें राजपूत जातियों व इनकी भिन्न-भिन्न शाखाओं के साथ-साथ नदियों, पहाड़ों और अनेक शहरों का विस्तृत वर्णन है । 1243 ई. के बाद से नैणसी के समय तक के राजपूतों के इतिहास के लिये तो मुसलमानों की लिखी हुई फारसी तवारिखों से भी नैणसी की ख्यात कहीं अधिक महत्वपूर्ण ग्रंथ है । नैणसी का दूसरा महत्वपूर्ण ग्रंथ जिसे ‘‘राजस्थान का गजेटियर’ कह सकते हैं, लिखा - डाॅ. कानूनगो के अनुसार इसमें जो वर्णन मिलता है वह ब्रिटिश युग के गजेटियर में भी नहीं मिलता है । इस ग्रंथ में मुख्यतः जोधपुर राज्य के परगनों का निरीक्षण किया गया है ।....... 275 वर्ष पुरानी मारवाड़ी भाषा को इस समय ठीक ठीक समझना भी सुलभ नहीं है । कहीं कहीं संवतों में भी अशुद्धियां रह गई हैं । नैणसी ने किसी क्रम से नहीं अपितु उसे ज्यों-ज्यों वृत्तांत मिलते गये वह एक पुस्तक के रूप में संग्रहीत करता गया । अतः  इस ख्यात में क्रम नहीं है । निःसंदेह नैणसी की दृष्टि कोण अबुलफजल की बजाय अधिक प्रभावशाली व वैज्ञानिक था । नैणसी ने अपने ग्रंथ में महत्वपूर्ण साधनों के नाम भी दिये हैं तथा अपने स्वामी के गुण-दोषों को भी स्पष्ट रूप से व्यक्त किया, जबकि फजल में इसकी कमी नजर आती है । नैणसी की ख्यात में कुछ कमियां होते हुए भी राजस्थान-इतिहास जानने का एक महत्त्वपूर्ण साधन है ।               -27/117-8.

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