विसहर काव्य

 -चारण लोग अपने शासनिक गांवों के जब्त करने के प्रयास पर शासक के विरूद्ध धरना, अनशन, आत्महत्या और देश त्याग तक कर देते थे । वे ब्राह्यणों की तरह शाप न दे कर ‘‘विसहर’’ छंद बनाते थे जिसमें भूमि अपहारक शासक की कटु भर्त्सना  और निदा की जाती थी । शासक लोग उनके द्वारा आत्मघात के पाप और निदा से बहुत डरते थे । विसहर का अभिप्राय विषधर/सर्प है । सर्प के काटने पर मनुष्य मर जाता है उसी प्रकार ‘‘विसहर काव्य’’ से भूमिहर्ता की कीर्ति नष्ट हो जाती थी । इस प्रकार लोक मेें अपयश का दावेदार बन जाने से वह जीवित ही मृत समझा जाता था । -30/124.

चारण हरि भक्त कवि

 -चारणों में 16 हरि भक्त कवि हुए- कर्मानन्द, अल, चैरा, चंड, ईश्वर, केशव, दूदा, जीवद, नरा, नारायण, मांडण, कोल्ह, माधवदास,
अचलदास, चैमुख और सांपा । -30/67.

मुंदियाड़ ठिकाने री ख्यात

-नागौर से 10 मील दक्षिण में स्थित मुंदियाड़ गांव राठौड़ शासकों द्वारा चारणों को दिया हुआ था । ख्यात की रचना एवं रचनाकार के बारे में अब तक कोई जानकारी नहीं मिली है । इस ख्यात में राठौड़ राज्य की/मारवाड़ में स्थापना से लेकर महाराजा जसवंतसिंह प्रथम की मृत्यु तक का जिक्र है । यदि इसकी रचना जसवंतसिंह के काल में हुई हो तो कोई आश्चर्य नहीं । मारवाड़ में प्रत्यक राजा के जन्म, राज्याभिषेक व मृत्यु की तिथियों के लिये यह ख्यात बड़ी उपयोगी है । डाॅ. वी. एस. भार्गव के अनुसार इस ख्यात का महत्व भी नैणसी की ख्यात से कुछ कम नहीं ।   -27/218.

बांकीदास री ख्यात

 -अपनी प्रतिभा के कारण कविराज बांकीदास ने जोधपुर के महाराजा मानसिंह के राज्य में उच्च सम्मान प्राप्त किया । कवि के साथ ही बांकीदास एक इतिहासकार भी था । नैणसी की तरह ‘‘बांकीदास की ख्यात’ भी ‘बातों’ का संग्रह है । उसकी बातें छोटे-छोटे फुटकर नोटों के रूप में है । उनमें कोई क्रमबद्धता नहीं है । ख्यात में करीब दो हजार बातों का संग्रह है । यह ख्यात ऐतिहासिक घटनाओं तथा सामाजिक व आर्थिक दशा की जानकारी के लिये एक अच्छा कोष है । जोधपुर व जयपुर की स्थापना का विस्तृत वर्णन उपलब्ध होता है । इससे यह भी ज्ञात होता है कि बीकानेर के महाराजा रतनसिंह ने वि.सं. 1885 में गया के पवित्र स्थल पर अपने मुख्य सरदारों की एक सभा बुलाकर उन्हें शपथ दिलवाई कि वे भविष्य में अपनी शिशु कन्या का वध नहीं करेंगे । बांकीदास ने त्यौहार-उत्सव, भौगोलिक स्थान, मार्ग, सिक्कों की जानकारी भी दी है । ओझा के अनुसार ‘‘यह इतिहास का खजाना है । राजपूताना के तमाम राज्यों के इतिहास संबंधी रत्न उसमें भरे पड़े हैं ।’’ -27/219.

जोधपुर राज्य री ख्यात

 -महाराजा मानसिंह के युग में लिखी गई इस ख्यात में प्रारंभ से लेकर मानसिंह की मृत्यु तक का हाल है । डाॅ. गौ. ही. ओझा ने इस ख्यात के बारे में लिखा है -‘‘लेखक ने विशेष छान‘बीन न करके जनश्रुति के आधार पर बहुत-सी बातें लिख डाली हैं, जो निराधार होने के कारण काल्पनिक ही ठहरती हैं, साथ ही राजा के आश्रय में लिखी जाने के कारण इसमें दिये हुए बहुत से वर्णन पक्षपात पूर्ण एवं एकांगी हैं ।’’ अतः इससे कई घटनाओं पर वास्तविक प्रकाश नहीं पड़ता है फिर भी जोधपुर राज्य का इतिहास जानने में यह ख्यात बड़ी सहायक है । -27/218.


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