कवि सुरजन

 -इनका अपर नाम सूजोजी था । इनका जन्म भींयासर, जिला जोधपुर में सन् 1583 ई. में हुआ था । ये जाति के पूनिया थे । सन् 1616 में इनके गुरु बील्होजी का स्वर्गवास हुआ, उस समय इन्होंने अपने गुरु की मृत्यु पर दो मरसिये कहे थे । इनसे कवि की गम्भीरता का पता चलता है । कुमारावस्था में ही इन्होंने वैराग्य धारण कर लिया था और साधु बन गये थे । वे अपने गुरु स्थान रामड़ावास में न रहकर वहां से 5 कि. मी. दूर रहते थे । वहीं इन्होंने एक तालाब बनवाया था, जो ‘सुरजनजी की नाडी’ के नाम से प्रसिद्ध
है । गद्य में पौराणिक पद्धति पर रचित ‘जाम्भोलाव-महातम’ की कथा के वक्ता सुरजनजी ही हैं । इन्हें जाम्भाणी विचारधारा, साहित्य और सम्प्रदाय का तात्त्विक ज्ञान था । इस कारण इन्हें विश्नोई समाज का ‘‘सूतजी’’ माना गया है । विश्नोई समाज की प्रसिद्ध रचनाएं ‘हिंडोलणो’ और ‘भक्तमाल’ में भी इनका नाम है । कवि साहबराम राहड़ ने भी कवि सुरजनजी के गुणों का जिक्र किया है । सुरजनजी अपने धर्म प्रचारार्थ जोधपुर गये । उस समय महाराजा जोधपुर सुरजनजी महात्मा के पास आये थे । उस समय दुरगादास द्वारा ‘मेह का परचा’ मांगने पर उन्होंने खड़े होकर अपना प्रसिद्ध गीत ‘‘गूड़े बंब निसांण’ गाया था, जिससे उसी समय वर्षा होने लगी थी । इन्होंने पांच सौ से भी अधिक कवित्त लिखे, जो नीतिपरक और आध्यात्मिक हैं । संभवतः कवि ने रामरासौ की रचना सन् 1620 ई. में की थी । कवि सुरजनजी की जाम्भोजी के प्रति अगाध भक्ति थी । इस कारण उन्होंने अपनी रचनाओं में जाम्भोजी की वाणी और उनके उपदेशों का विस्तार से वर्णन किया है । ईश्वर भक्ति एवं आध्यात्म से संबंधित उनकी साखियां, हरजस, गीत एवं कथाकाव्य बड़े महत्वपूर्ण हैं, जिन्हें गाया भी जा सकता है । सुरजनजी का स्वर्गवास सन् 1691 में जाम्भोलाव में हुआ लेकिन उनके शव को उनके पैत्रिक गांव भींयासर में समाधि दी गई ।         -विश्वम्भरा, पृ. 9-10, अंक 4, वर्ष 24, अक्टू.-दिसं. 1992.                          

रामरासौ

 -सुरजन कवि कृत ‘‘रामरासौ’’ बहुत ही महत्वपूर्ण कृति है । यह वीररस-प्रधान काव्य है । इसमें दवाळा, लीला, दूहा, कवित्त आदि छंदों का प्रयोग किया गया है । यह मरुभाषा में लिखा गया है और हमें इसमें मरु जीवन की 17वीं शती की अच्छी झांकी मिलती है । समूचे जांभांणी साहित्य में रासौ साहित्य पर और वीररस प्रधान ऐसी कोई अन्य पुरानी रचना नहीं है । रामरासौ की कथा राम के वनवास से प्रारंभ होती है, जब उनके पास शूर्पणखां आती है और यह राम के लंका विजय के बाद अयोध्या पहुंचने तक है । इसमें इस समय के दौरान घटी प्रमुख घटनाओं का ही वर्णन है । इस कथा काव्य में सीता-मंदोदरी, सीता-हनुमान, मंदोदरी-रावण और अंगद-रावण का संवाद बहुत प्रभावशाली बन पड़े हैं । इस काव्य की कई अन्य विशेषताएं भी हैं, जैसे- सीता वियोग में दुःखी राम का मुंह लक्ष्मण घड़े के पानी से धुलाते हैं, हनुमानजी जब लंका में सीता की खोज में जाते हैं तो वे मार्जार रूप बनाते हैं, रावण की सभा में हनुमानजी स्वयं अपनी मृत्यु का उपाय बताते हैं, लक्ष्मणजी दो बार मूर्छित होते हैं और लक्ष्मण के द्वारा रावण मारा जाता है आदि । कवि सुरजन का प्रथम उद्देश्य इस काव्य की रचना करने का यही था कि चाहे कोई दुष्ट कितना भी शक्तिशाली हो, उसका अंत होता ही है । हमेशा सत्य की विजय होती है । उनका दूसरा उद्देश्य अपने गुरु वील्होजी के कार्यों को पूर्ण करना था । जाम्भोजी ने स्वयं को विष्णु का अवतार राम बताया है ।           -विश्वम्भरा, पृ. 8-9, अंक-4, वर्ष 24, अक्टू.-दिसं., 1992.

कत्ता

 -कत्ता का शाब्दिक अर्थ राजकीय विवरण से है । इसमें ऐतिहासिक सामग्री भरपूर मात्रा में मिलती है । राजस्थान राज्य अभिलेखागार, बीकानेर में उपलब्ध कत्ते अधिक प्राचीन नहीं है । उनमें से कुछ कत्ते  इस प्रकार हैं- डाबी मिसल रो कत्तो, महाराजा श्री अजीतसिंह जी रै समय रौ कत्तो; महाराजा श्री अजीतसिंहजी रौ जीवणी मिसल रो कत्तो; राठौड़ां रै गधवतां री बंदगियां रौ कत्तो; सन् 1885 से 1886 तक महाराजा सरदारसिंघजी रै राजतिलक रौ कत्तो; सन् 1885-1889 तक रो कत्तो, महाराजा श्री जसवन्तसिंघजी द्वितीय रे जन्म और अहमदनगर पधारने रो कत्तो आदि महत्वपूर्ण कत्ते हैं ।               -30/141.

बात

-1. किसी विषय को सूचित करने वाला सार्थक शब्द, वाक्य, वाणी, वचन बोल, कथन । 2. चर्चा, जिक्र, प्रसंग । 3. वार्तालाप, कथोपकथन । 4. विचार-विमर्श । 5. मामला, माजरा, मसला । 6. विषय । 7. समाचार, सूचना, खबर, संदेश । 8. अफवाह, प्रवाद । 9. वृत्तांत, हाल-चाल । 10. गुप्त वार्त्ता, रहस्य, भेद । 11. अभिप्राय, आशय, भाव । 12. संबंध, लगाव । 13. व्यवहार, बर्ताव, सम्पर्क । 14. स्वाभाव, प्रकृति, लक्षण, चरित्र, आचरण । 15. विशेषता, खूबी । 16. प्रशंसा, तारीफ, यश, कीर्ति । 17. सामर्थ्य, हस्ती, हैसियत । 18. मान, मर्यादा, प्रतिष्ठा । 19. वचन, प्रमाण, साख, विश्वास । 20. प्रभाव, धाक, रौब । 21. प्रतिज्ञा, प्रण, वादा, कौल । 22. कार्य, कर्म, क्रिया । 23. कोई घटना, संयोग । 24. कारण, हेतु । 25. प्रश्न, सवाल । 26. अभिलाषा, कामना, इच्छा, चाह । 27. मिस, बहाना । 28. विचार । 29. भाव । 30. नसीहत, सीख, शिक्षा । 31. आदेश, हुक्म । 32. उक्ति, चमत्कार पूर्ण कथन । 33. अवस्था, परिस्थिति । 34. समस्या, उलझन । 35. विवाद, हुज्जत । 36. सलाह, सुझाव । 37. स्पष्टीकरण । 38. उल्लेख । 39. व्यवस्था, प्रबंध । 40. अभिलेख । 41. वस्तु, पदार्थ, चीज । 42. मूल कारण, बीज । 43. वस्तु का मूल्य, दाम, कीमत । 44. उचित, ठीक । 45. निश्चय । 46. आवश्यकता, जरूरत । 47. उपाय, तरकीब, तरीका । 48. तरह, भांति, प्रकार । 49. वास्तविकता, सही मतलब, तत्त्व । 50. सामान्य बात । 51. क्रिया-कलाप । 52. बहकावा, धोखा, प्रवंचना । 53. अन्तर कथा, गूढ़ आशय । 54. चुगली । 55. इतिवृत्त, इतिहास । 56. प्रेमाख्यान । 57. धर्मिक या पौराणिक आख्यान । 58. कहानी, लघु कथा । 59. उपन्यास ।  -33/201.
 

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विसहर काव्य

 -चारण लोग अपने शासनिक गांवों के जब्त करने के प्रयास पर शासक के विरूद्ध धरना, अनशन, आत्महत्या और देश त्याग तक कर देते थे । वे ब्राह्यणों की तरह शाप न दे कर ‘‘विसहर’’ छंद बनाते थे जिसमें भूमि अपहारक शासक की कटु भर्त्सना  और निदा की जाती थी । शासक लोग उनके द्वारा आत्मघात के पाप और निदा से बहुत डरते थे । विसहर का अभिप्राय विषधर/सर्प है । सर्प के काटने पर मनुष्य मर जाता है उसी प्रकार ‘‘विसहर काव्य’’ से भूमिहर्ता की कीर्ति नष्ट हो जाती थी । इस प्रकार लोक मेें अपयश का दावेदार बन जाने से वह जीवित ही मृत समझा जाता था । -30/124.


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