मुक्तक काव्य

- 1. फुटकर कविता या छनद । किसी विषय या भाव विशेष की कविता या छनद । 2. छोटे वाक्यों का सरल गद्य । 3. ‘गणों’ से मुक्त कविता । -33/390.
-जैन संत साहित्य में ‘मुक्तक काव्य’ नौ प्रकार के मिलते हैं, जिनके विषयवार नाम इस प्रकार हैं-
          1. धार्मिक और सैद्धान्तिक मुक्तक काव्य - बारह भावना गौतम् -समय सुन्दर ।
          2. स्तुति प्रधान मुक्तक काव्य - संखेश्वर पार्श्वनाथ स्तवन - समय सुन्दर ।
          3. उपदेशात्मक मुक्तक काव्य - तम्बाकू त्याग संझाय -धर्मवर्द्धन ।
          4. तीर्थ और यात्रा प्रधान मुक्तक काव्य - अष्टादशतीरथमास - समय सुन्दर ।
          5. ऋतु और तिथि संबंधी मुक्तक काव्य - ज्ञान प्रचमी बृहत्स्त्वन - समय सुन्दर ।
          6. ऐतिहासिक मुक्तक काव्य - गीत राउल अमरसिंघ रो -धर्मवर्द्धन ।
          7. बुद्धि परीक्षा संबंधी मुक्तक काव्य -हियाली गीतम् - समय सुन्दर ।
          8. वर्णनात्मक मुक्तक काव्य - सत्यासिया दुष्काल वरणन -समय सुन्दर ।
          9. अन्य - नारी कुंवर सवैया - धर्मवर्द्धन ।
काव्य के रूपभेद की दृष्टि से जैन संत कवियों के मुक्तक काव्य भी अलग-अलग तरह से मिलते हैं-
         -संख्या मूलक -पंचक, अष्टक, बत्तीसी, छत्तीसी, पचासा, बावनी, सतरी ।
        -छन्द मूलक - छप्पय, गीत, कवित्त, ढाल, ढालिया, दोहा ।
        -वन्दना मूलक -स्तुति, स्तवन, स्तोत्र, पूजा, वन्दना ।
        -बुद्धि परीक्षा मूलक - हीयाली, गूढ़ा, सिलोका ।
        -तीर्थ यात्रा मूलक - तीर्थमाला, चैत्यपरिपाटी ।
        -स्वाध्याय मूलक - संझाय । -35/126-7.

प्रबन्ध काव्य

 -1. साहित्य में श्रव्य काव्य का एक भेद विशेष । 2. पद्यबंध रचना, काव्य । 3. काव्य का एक भेद । 4. विभिन्न कथानकों का संकलित ग्रंथ । ऐसा निबंध या लेख जिसका सिलसिला या क्रम जारी रहे ।6. अध्याय, सर्ग । -33/116.
-जैन संत कवियों के प्रबंध साहित्य में महावकाव्य और खण्ड-काव्य दोनों ही हैं । विषय-भेद की दृष्टि से ये प्रबंध काव्य पांच प्रकार के हैं-
             1. धार्मिक और पौराणिक प्रबंध काव्य -सीताराम चौपई-समय सुन्दर ।
             2. ऐतिहासिक प्रबंध काव्य - संधपति सोमजी निर्वाण वेलि -समय सुन्दर ।
             3. उपदेशात्मक प्रबंध काव्य - बारह व्रत रास -उपा, गुणविनय ।
             4. कथात्मक प्रबंध काव्य - पार्श्वनाथगुणवेलि-जिनराज सूरि ।
             5. प्रेम व्यंजना मूलक प्रबंध काव्य -मृगावती रास -समय सुन्दर । -35/126-7.

जैन साहित्य

 -जैन शैली का साहित्य अधिकांश जैन यतियों, जैन साधुओं और उनके अनुयायी श्रद्धालु श्रावकों द्वारा लिखा गया है । यहां के हस्तलिखित ग्रंथालयों में सुरक्षित कृतियों में जैन विषयक सामग्री का बाहुल्य है । जैनागम के मूल ग्रंथों के अतिरिक्त अनेक टीकाएं, बालावबोध, टब्बा, ढालें, सिज्झाएें, रास, स्तवन स्तोत्र, चोढालिये, सिलोके वार्तिक आदि नामों से उल्लेखित कृतियों में जैन धर्म के नियमों और आदर्शों का कई प्रकार से वर्णन किया गया मिलता है । यहां जैन साहित्य बहुत बड़े परिणाम में लिखा गया । संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश आदि सभी भाषाओं के जैन साहित्य में विषयवस्तु की एक-सी समानता मिलती है । इसी कारण जैन कवि के सामने कथानकों का स्वरूप प्रायः निश्चित रहता था और प्रतिभा सम्पन्न कवि परंपरा में बंधी कथा में काव्यानुगत प्रसंगों पर कवित्व का प्रदर्शन व धार्मिक तत्त्वों का विवेचन करते । चरित चउपई, रास संज्ञक रचनाओं में जैन शैली के रचनाकारों ने पौराणिक पात्रों, जोककथाओं, प्रसिद्ध वीरों, दानियों और धार्मिक प्रवृत्ति के नायकों, व्रत-कथाओं, धार्मिक उपदेशों आदि नाना प्रसंगों को अपनी कल्पना और प्रतिभा के आधार पर अपनाया है । पौराणिक व सनातन धर्म के आख्यानों व मिथकीय मूल्यों के समानान्तर कई जैन रचनाओं में वर्णन मिलता है जिसके घटना प्रसंगों को उन्होंने तर्क-विर्तक के सारे मनमाने ढंग से तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया है । ऐसा करने का उनका मंतव्य अपनी धार्मिक श्रेष्ठता करना ही रहा है । जिसमें स्थानीय राग-रागनियों का सम्मिश्रण भी उल्लेखनीय है । मालदेव, पुण्यसागर, पद्मराज, कनक सोम, साधुकीर्ति, विमलकीर्ति, विमलरत्न, हेमरत्न सूरि, गुणविजय, सहजकीर्ति, श्रीसार, समयसुन्दर, जिनहर्ष, जिनसमुद्र सूरि, जयमल्ल, रायचन्द्र इत्यादि अनेक रचनाकार हुए हैं । -35/132.

 

जैन संत साहित्य

 -वि. सं. 835 में उद्योतन सूरि ने जालोर में बैठकर ग्रंथ ‘‘कुवलयमाला’’ की रचना की । यह ग्रंथ पाकृत में लिखा गया है परन्तु इसमें मरुभाषा के नाम से राजस्थानी का उल्लेख मिलता है । 10वीं शताब्दी में सिद्धिर्षि नामक एक दूसरे संत कवि ने भीनमाल में ‘‘उपमिति भव प्रपन्च कहा’’ रूपक ग्रंथ बनाया । इसमें भी राजस्थानी भाषा का आदि स्वरूप देखने को मिलता है । अपभ्रंश की रचनाएं भी इसी क्षेत्र में लिखी हुई मिलती है, उनमें धनपाल कवि की सांचोर में लिखी ‘सत्यपुरीय महावीर उच्छाह’ रचना प्रमुख है । इस रचना के अन्तर्गत सांचोर के महावीर जिनालय की मूर्ति महमूद गजनवी ने वि. सं. 1081 में तोड़ने की कोशिश की परन्तु उसे सफलता हाथ नहीं लगी, उस बात का वर्णन है । उसी भांति ब्राह्मणवाड़ में बारहवीं शदी में सिंह कवि ने ‘‘पुज्जुनकहा’’ नामक काव्य ग्रंथ लिखा । ये दोनों ही रचनाएं अपभ्रंश की हैं परंतु इनमें प्राकृत के बाद के राजस्थानी साहित्य स्वरूप देखने को मिलता है । जिनदत्त सूरि की अपभ्रंश काव्यत्रयी के अंतर्गत छपी हुई है । तरहवीं शदी राजस्थानी का आदिकाल माना जाता है । इस काव्य से राजस्थानी जैन संतों की स्वतंत्र रचनाएं मिलनी प्रारंभ होती है । सर्वप्रथम रचना नागौर के वादिदेवसूरि के शिष्य वज्रसेनसूरि की ‘‘भरतेश्वरबाहुबली घोर’’ मिलती है । यह पैंतालीस छंदों की रचना है और इसमें जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के पुत्र भरत और बाहुबली के युद्ध का वर्णन है । वि. सं. 1258 में वर्तमान जोधपुर जिले के खेड़ नगर में शांतिनाथ जिनालय की प्रतिष्ठा जिनपति सूरि ने करवायी । जिनपतिसूरि के पश्चात् उनकी गद्दी पर जिनेश्वर सूरि बैठे । जिनेश्वरसुरि की लिखी ‘‘महावीर जन्माभिषेक’’ श्री बासूपूज बोलिका चर्चरी शंतिनाथ बोली नामक राजस्थानी रचनाएं मिलती हैं । जिनपति सूरि के एक अन्य शिष्य सुमतिगणि ने ‘‘नेमिरास’’ की रचना की । इसके अंतर्गत बाईसवें तीर्थंकर नेमिनाथ के चरित्र का वर्णन है । इस तरह तेरहवीं शदी के अंदर जो राजस्थानी जैन संत रचनाएं मिलती हैं वे सब राजस्थानी की रचनाएं तो हैं किन्तु इन पर अपभ्रंश और गुजराती का प्रभाव भी दृष्टिगोचर होता है । चौदहवीं शदी में खतरगच्छ के आचार्य जिनेश्वर सूरि का शिष्य उपाध्याय लक्ष्मीतिलक एक प्रसिद्ध विद्वान और संत कवि था । साठ छंदों का ‘‘शांतिनाथ देवदास’’ लक्ष्मीतिलक रचित राजस्थानी का काव्य है । इसमें खेड़ नगर के शांतिनाथ जिनालय की प्रतिष्ठा और वि. सं. 1313 में जालोर के शांतिजिनालय की प्रतिष्ठा का ऐतिहासिक वर्णन है । कालान्तर में इस रास को जालोर में मंचित भी किया गया । जोधपुर राज्य के कोरटा गांव में वि. सं. 1363 में प्रज्ञातिलक के समय में ‘‘कच्छूली रास’’ नामक राजस्थानी रचना भी मिलती है । 15वीं शदी के उत्तरार्द्ध में पीपलगच्छ का हीरानन्द सुरि एक अच्छा संत कवि हुआ, इसकी वस्तुपाल तेजपाल रास, विद्याविलास पवाड़ा, कलिकाल रास नामक रचनाएं मिलती हैं । इसकी ‘‘जम्बूसामी विवाहउल’’ रचना सांचोर में लिखी हुई है । सोलहवीं शदी के प्रारंभ में वि. सं. 1505 में ‘संघकलस’ नामक संत ने सम्यवत्व रास मारवाड़ के तलवाड़ापुर/तिलवाड़ा में बनाया । मारवाड़ के समियाणा ग्राम में जन्मे नाहटा गौत्रीय गुणरत्न सूरि के देहावसान के पश्चात् उनके शिष्य पद्मन्दिरगणि ने ‘गुणरत्न सूरि विवाहलउ’ नाम की49 छन्दों की एक रचना लिखी । ‘‘पद्म्न्दिर सूरि’ के राजस्थानी में लिखे हुए दो स्तवन भी मिलते हैं । ये दोनों ही स्तवन वि. सं. 1543 में लिखे गये । पहलस स्तवन वरकाणा पार्श्वनाथ का स्तवन है जिसमें 20 गाथा हैं और दूसरा जालोर नवफणा पारस दस भव स्तवन है जिसमें 35 गाथा हैं ।........काव्य के रूपभेद की दृष्टि से मारवाड़ के जैन संत कवियों का साहित्य अलग-अलग रूपों में मिलता है । प्रबंध काव्य रास, चौपई, वेलि, फागु, चर्चरी, चरित, संणि, मंगल आदि रूपों में उपलब्ध होते हैं । -35/119-21.

लिपि

-1. कोई भाषा या शब्द लिखने के वर्णाक्षर । रेखाओं की वह बनावट जो अक्षर या शब्द बनाती हो । 2. लेख, लेखन । 3. लेपन । 4. मालिश, उबटन । 5. लेपन के लिये तैयार किया गया पदार्थ । 6. चित्रण । 7. हस्तलेख । -33/534
-18 प्रकार की लिपियां के नाम - हंस लिपि, भूतलिपि, यशलिपि, राक्षसलिपि, उड्डीलिपि, पावनीलिपि, मालवीलिपि, नागरीलिपि, लाटीलिपि, पारसीलिपि, अनिमितलिपि, चारणी, मौलवी, देशाविशेष । इनके अतिरिक्त - लाटी, चोटी, माहली, कानड़ी, गुर्जरी, सोरठी, मरहठी, कांकणी, खुरासणी, मागधी, सिंहली, हाड़ी, किटी, हम्मीरी, परतीस, नसी, मालवी, महापोधी और नाम गिनाये हैं । -10158 गुटका सं. 4 । पत्र सं. 1228।-विश्वम्भरा, पृ. 15, अंक 2, वर्ष 16, अप्रेल-जून, 1984.
-स्वीडिश एक्सपीडिसन की डॉ. हन्नारिड को रंगमहल की खुदाइ्र्र में चौथे-पांचवे धरातल पर दो तीन मिट्टी की सीलें मिली थीं, जिन पर ‘गुप्तलिपि’ में त्रुटित लेख है । -विश्वम्भरा, पृ. 10-1, अंक 1, वर्ष 24, जन.-मार्च 1992.

 


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