संत साहित्य

 -संत साहित्य से तात्पर्य ऐसे साहित्य से है जिसमें अधिकतर निर्गुण भक्ति का गुणगान मिलता है । यहा का संत साहित्य उत्तरी भारत की संत परम्परा से प्रभावित होने के बाद भी उसकी एक विशेषता यह है कि उसका झुकाव अधिकतर निर्गुण भक्ति की ओर रहा है । यहां के संतों ने, यहां की भाषा में नवीन उपमाओं और अत्प्रेक्षाओं आदि के माध्यम से अपने भावों की अभिव्यक्ति को जो नया रूप दिया है वह बड़ा ही प्रभावोत्पादक और सरस है । संत सात्यि के रचनाकारों की अपनी शैली है जिसमें बोलचाल की राजस्थानी भाषा के अतिरिक्त विभिन्न पड़ौसी प्रान्तीय भाषाओं और खड़ी बोली का प्रभाव भी पाया जाता है । संत साहित्य के निर्माण में विभिन्न धर्मावलम्बियों और मतमतान्तरों के अनुरूप पंथीय साहित्य की संरचना अधिक हुई और उसमें अपने सम्प्रदाय की गुरु परम्परा गुरुवांणी, आराध्य अर्चना, ईश्वरीय माया, उसके रूप व गुण का गुणगान तथा जगत की मिथ्या बातों से दूर रह कर कल्याणकारी आचरण की सीख इसमें प्रायः देखने को मिलती है । संत साहित्य में अध्यात्म की सरल उदाहरणों द्वारा जो सहज अभिव्यंजना की गई है वह उसकी अपनी विशेषता है और साधारण पढ़े लिखे लोगों को भी उसे हृदयंगम करने में विशेष प्रयास की आवश्यकता नहीं होती । निगुर्ण ब्रह्म की जो अवधारणा है वह सगुण से कुछ क्लिष्ट है परन्तु इन संतों में ऐसी प्रतिभा थी कि स्थानीय उपमाओं, रूपकों और दृष्टांतों के माध्यम से उसे सरल और बोधगम्य बना दिया । संतों ने सांसारिकता त्याग दी थी किन्तु संसार के कल्याण की भावना से वे कभी विमुख नहीं हुवे । मध्यकाल में संतों और उनके साहित्य ने यहां जो लोक शिक्षण का कार्य किया वह महत्वपूर्ण कहा जायेगा । उस समय जब प्रमुख प्राचीन भारतीय शिक्षण संस्थाओं का आक्रान्ताओं द्वारा विध्वंस और विनाश हो चुका था और लोकशिक्षण की सारी व्यवस्था चरामरी गई थ्ज्ञी उस समय संतों ने शिक्षक की महत्ती भूमिका निभाई । अपनी वाणियों के माध्यम से उन्होंने जनकल्याण का निरंतर प्रयास किया और लागों को आचरणगत व शिष्टाचार की शिक्षा देकर उन्हें मानवीय गुणों से संस्कारित करने में संतों व संतसाहित्य की प्रमुख भूमिका रही है । संत साहित्य में यहां कबीर, दादू, गोरख, रैदास आदि संतों की वाणियों का प्रभाव अधिक दृष्टिगोचर होता है । इसके अतिरिक्त मीरां, दरियावजी, रामचरणदास, जांभोजी जैसे अनेक प्रसिद्ध संतों व इनके अतिरिक्त अनेक स्थानीय संतों की वाणियां व भजन अपने अपने आंचलों में बड़े चाव से गाये जाने की परंपरा रही है । -35/132-3.

धार्मिक साहित्य

-धर्म मानव जीवन की बहुत अंशों और विविध क्षेत्र में प्रभावित करता रहा है । जिस साहित्य में धर्म का प्रधान्य हो वह धार्मिक साहित्य कहलाता है । मध्यकाल में मारवाड़ में पनपने और विकसित होने वाले विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों और पंथों का साहित्य इस श्रेणी का ही है । इसमें कबीर, मीरां, दादू, निरंजनी, रामस्नेही, नाथ-संप्रदाय, दशनामी, वल्लभ संप्रदाय, जैन संप्रदाय इत्रूदि विभिन्न विचारधाराओं और मत-मतान्तरों की रचनाएं धार्मिक साहित्य में सम्मिलित की जा सकती है । यहां के धार्मिक साहित्य को मुख्यरूप से तीन भागों में बांटा जा सकता है- 1. जैन साहित्य, 2. संत साहित्य, और 3. भक्ति साहित्य । -35/132.

चारण साहित्य

 -चारण साहित्य के प्रणेता चारण रहे हैं और चारणों की अत्यधीक देन होने के कारण इसे ‘चारण साहित्य’ के नाम से अभिहित किया जाने लगा । चारण शैली की अधिकांश रचनाएं ‘डिंगल’ नाम से अभिहित हैं । डिंगल का अधिकांश साहित्य वीर-रसात्मक है और ऐतिहासिक प्रसंग काव्य में गुम्फित है । गीत इस शैली की प्रमुख विधा रही है तथा ‘वैण सगाई’ का प्रयोग इस शैली की अपनी विशेषता है । इसमें वीर रस की प्रधानता है और उनका यह वीररसात्मक साहित्य प्रायः पूरा का पूरा ऐतिहासिक परिवेश में सृजित है । वीररस के अतिरिक्त भक्ति, नीति, श्रृंगार, वैराग्य, ज्ञान, उपदेश इत्यादि अनेक विषयों की रचनाओं से यह ज्ञात होता है कि उन्होंने विभिन्न विषयों को अपना प्रतिपाद्य बनाया । बारहठ आसा, बारहठ ईसरदास, दुरसा आढ़ा, जग्गा ख्ड़िया, माधोदास दधवाड़िया, रामदान लाल़स, बीठू मेहा, सांदू माला, केसवदास गाडण, बारहठ लक्खा, शंकर बारहठ, अखा बारहठ, वीरभांण रतनू, कविया करणीदान, बखता खिड़िया, हुकमीचंद ख्ड़िया, सगता सांदू, खेतसी सांदू, सांदू पृथ्वीराज, सांदू रांमा, सिढ़ायच पूना, जाड़ा मेहड़ू, भीमा आसिया, चूंडा दधवाड़िया, चारण भूधरदास, कल्याणदास मेहड़ू, आढ़ा किसना दुरसावत, सिंड़ायच गेंयो तुंकारौ, बारहठ एजन, गाडण कोळो मेहावत आदि अनेक चारण कवि मध्यकालीन मारवाड़ के राजस्थानी साहित्य के महत्वपूर्ण रचनाकार थे । यहां की सांस्कृतिक परम्पराआें का इन रचनाकारों ने अपनी कृतियों में जो सुन्दर और प्रभावी चित्रण प्रस्तुत किया है, उससे भावी पीढ़ियां प्रेरणा प्राप्त करती रही है । ‘डिंगल गीत’ जहां चारणों की अपनी उपज है, वहीं ‘झूलणा, छप्पय, कुण्डलियां, दोहा आदि छन्दों पर उनका एकाधिकार दृष्टिगोचर होता है । भाषा में प्रवाह और ओज ऐसे अनुपम गुण हैं जो हिन्दी वीर काव्य में कम देखने को मिलते हैं । भारतीय वांगमय को मारवाड़ के इन चारणों की विशिष्ट देन है । साथ ही स्वाधीनता की भावना को उजागर करने में उनकी महत्ती भूमिका रही है । -35/130-1.

 

 

 

चारणेतर साहित्य

 -चारणों के अतिरिक्त राजपूत, मोतीसर, भोजक, ब्राह्मण, ओसवाल, ढाढ़ी, ढोली, सेवग आदि चारणेतर जातियों के कवियों ने जो रचनाएं शिष्ट शैली में लिखीं उसे ‘चारणेतर साहित्य’ के अन्तर्गत माना जाता है । शिष्ट साहित्य के निर्माण में चारणेतर जातियों के रचनाधर्मियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है और राजस्थानी के शिष्ट साहित्य की कई प्रमुख रचनाओं का सृजन इनके द्वारा हुआ है । चारण कवियों की एक विशिष्ट परम्परा रही है और अधिकांश कवि उस परम्परा के अनुरूप ही साहित्य सृजन करते रहे जबकि चारणेतर साहित्य में उस परंपरा से सान्निध्य रखते हुए भी भावों की अभिनव व्यंजना, विषय वैविध्य, प्रसंगानुकूल विशिष्ट शब्द योजना एवं सांस्कृतिक गरिमा की अनुपम छवि को देखते हुए इस साहित्य की अपनी विशेषता है । ‘कृष्ण रुकमणि री वेलि’ की रचना पृथ्वीराज राठौड़ ने तथा ‘माधवानल कामकंदला’ व ‘ढोला मारू री चौपाई’ जैसी शिष्ट साहित्यिक कृतियां की रचना जैन कवियों ने की है । पृथ्वीराज राठौड़, मुहणोत नैणसी, पद्मनाभ, कुशललाभ, नयचन्द्र सूरि, बहादर ढाढ़ी, चतरा मोतीसर, मंछाराम सेवग इत्यादि कई ऐसे रचनाकार हुए हैं जिन्होंने विविध विधाओं व विषयों को लेकर चारणेतर साहित्य की श्रीवृद्धि में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया और उसकी कृतियां यहां सांमत वर्ग में बड़े सम्मान व आदर के साथ देखी जाती रही हैं । -35/131

 

संभ्रांत साहित्य

 -संभ्रांत वर्गीय साहित्य से तात्पर्य उस शिष्ट साहित्य से है जिसका सृजन शास्त्राय परम्पराओं के अनुरूप किया गया हो । ऐसे साहित्य का सृजन और पठन-पाठन का प्रचलन संभ्रांत वर्गीय लोगों में ही प्रायः अधिक रहा है, अतः इसे इस नाम से संबोधित किया जा सकता है । दूसरे शब्दों में इसे शिष्ट साहित्य या शास्त्रीय साहित्य भी कह सकते हैं । इस संभ्रांत वर्गीय साहित्य को मोटे रूप से दो प्रमुख भागों में बांटा जा सकता है- 1. चारण साहित्य, और 2. चारणेत्तर साहित्य । -35/130.


Copyright © Rajfolkpedia.com 2016 All rights reserved.                                                                                                                                                                          Website Developed By: Representindia.com