रासो

-देखें ‘रासौ’ ।

वंश

 -1. कुल, खानदान, गौत्र । संतान परम्परा । 2. संतान, संतति, परिवार । 3. बेड़ा । 4. समुदाय, समूह । 5. खड़्ग के बीच का चौड़ा भाग । 6. युद्ध की सामग्री । 7. रीढ़ की हड्डी । 8. गांठ । 9. गन्ना, ऊख । 10. साल वृक्ष । 11. शहतीर, बल्ला, लट्ठा। 12. पुष्प, फूल । 13. विष्णु का एक नाम । 14. पुरुषों की बहत्तर कलाओं में से एक । 15. वंसलोचन । 16. बारह हाथ का एक नाप । पु. किसी वंश का मूल पुरुष । -33/550.

लोक साहित्य

 -लोक साहित्य लोक-संस्कृति का एक अभिन्नअंग है । जन-संस्कृति का दर्पण को लोक साहित्य कह सकते हैं । लोकभाषा और लौकिक शैली में लिखा साहित्य जिसे ‘लोक साहित्य’ कह कर पुकारते हैं किसी देश या प्रान्त के जनजीवन को, वहां के लोक मानस की सही झांकी को प्रस्तुत करता है । लोक की युग-युग की वाणी साधना इसमें सुरक्षित होती है । कितने ही ज्ञात-अज्ञात जन कवियों ने अपनी सरल और सरस वाणी में अपने जीवन के जीवन्त अनुभवों को इसमें ढाल कर जन साधारण के लिये अमूल्य खजाना प्रस्तुत किया है । लौकिक प्रेमकाव्य, लोकगीत, लोककथाएं, लोकगाथाएं आदि ऐतिहासिक, अर्द्ध ऐतिहासिक, काल्पनिक और पौराणिक आदि विविध प्रसंगों पर आधारित है तथाइसकी शैली का अपना ही अनुठा अंदाज है । भावों की सहज व सरल अभिव्यक्ति लोकसाहित्य की प्रमुख विशेषता है । वस्तुतः लोक साहित्य यहां के लोक-जीवन की ऐसी स्वाभाविक अभिव्यक्ति है जिसमें सतत् जीवन्तता और प्रवाहमानता विद्यमान है । साधनहीन मरुस्थल में जहां पानी तक सरलता से सुलभ नहीं है, लोकगीतों और लोकगाथाओं की सहस्र धाराओं में यहां बसे मानवों की संस्कृति को सरस और भाव प्रवण बनाते रहे हैं । ख्यात, बात, विगत, वंशावली, हाल, हकीकत, याददास्त, बही, रासो, विलास, प्रकास, रूपक, वचनिका, दवावैत, वेलि, झमाल, झूलणा, सिलोका, निसांणी, दूहा, गीत, छन्द, चौपाई, कवित्त, परचो, पच्चीसी, बत्तीसी, बावनी, शतक, सतसई इत्यादि राजस्थानी साहित्य में जो विविध संज्ञक रचनाएं उपलब्ध होती हैं उनमें यहां का प्राचीन सांस्कृतिक वैभव बिखरा पड़ा है । इस गौरवपूर्ण सांस्कृतिक वैभव को जो हमें सौभाग्य से विरासत से प्राप्त हुआ है, उसे हम विस्मृत करते जा रहे हैं । अपने कुल की परंपराओं और मर्यादाओं का पालन करने वाला कुल की समृद्धि व ख्याति फैलाने वाले को सपूत कहा जाता है । इसके विपरीत आचरण करता है वह कपूत कह कर पुकारा जाता है । हमारा प्राचीन साहित्य बड़ा सुसम्पन्न और समृद्ध रहाहै । उसकी एक सुदीर्घ परंपरा रही है । उसीसे प्रेरणा पाकर यहां का इतिहास इतना गौरवान्वित हुआ है । यहां के साहित्य में सामाजिक, राजनैतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, नैतिक, आयुर्वेदिक, खगोल शास्त्रीय, ज्योतिष, मंत्र-तंत्र, नीति शास्त्र, संगीत इत्यादि विविध पहलुओं से संबंधित भरपूर सामग्री है । -35/137-8.

विगत

-1. अतीत, बीता हुआ, वर्तमान से पूर्व का । 2. अंतिम या बीते हुए से पूर्व का । 3. इधर-उधर गया हुआ । 4. निष्प्रभ, कान्तिहीन । 5. रहित, विहीन । -वि. 1. विवरण, व्योरा । 2. वृत्तांत, हाल । 3. इतिहास । 4. हिसाब । 5. परिचय, जानकारी । 6. सूची, नामावली । 7. घटना । 8. वर्णन सूची, तफसील । 9. संख्या, गिनती । 10. विशेष मुक्ति, मोक्ष । 11. अधोगति गया हुआ प्राणी ।  -33/600.

भक्ति साहित्य

 -धार्मिक साहित्य के अन्तर्गत निर्गुण भक्ति का साहित्य संत साहित्य की अनुपम देन है तो सगुण भक्ति के अन्तर्गत राम और कृष्ण भक्ति की ज्ञानाश्रयी और प्रेमाश्रयी दोनों ही प्रकार की शाखाओं का यहां प्राबल्य रहा है । संतों की निर्गुण निराकार ईश्वर की परिकल्पना की अपेक्षा अवतारी राम और कृष्ण की लीलाएं यहां के जनमानस को अधिक सरस और रोचक प्रतीत हुई । इसलिये इन दोनों के चरित्रों पर उनकी आराधना व पूजा के लिये बहुत-सा भक्ति साहित्य लिखा गया । मध्यकालीन परिस्थितियों के परिणाम स्वरूप सगुण भक्ति की ओर यहां के लोगों का झुकाव अधिक रहा और सम्भवतः लोक-देवताओं, लोक देवियों, झुंझारों, भोमिया, पितरों, सतियों आदि के प्रति विशेष आकर्षण का कारण भी तत्कालीन परिस्थितियां ही रही होंगी । इन सबके गुणगान और महिमा वर्णन में यहां बहुत-सा साहित्य लिखा गया । तुलसी, सूर, और मीरां आदि भक्तों के पदों ने यहां की जनता में आत्मप्रेरणा प्रदान की और उनके साहित्य ने जन-मन में आशा के दीप जलाकर भक्ति की मंद पड़ती लौ को प्रज्वलित किया । मध्यकाल में राम और कृष्ण की भक्ति यहां के जनमानस के साथ अंतरंगता से जुड़ी हुई थी । विवेच्य काल में यहां राम और कृष्ण भक्ति को राज्याश्रय भी मिला । विभिन्न राजवर्गीय व साधन-संपन्न लोगों द्वारा अपने अपने इष्ट देव राम और कृष्ण के बड़े-बड़े मंदिर बनवाये गये । जन सहयोग से भी कई मंदिरों का निर्माण हुआ । राम और कृष्ण से संबंधित धार्मिक महत्व के ग्रंथों का अनुवाद व टीकाएं आदि लिखी गईं जिसमें गीता और रामचरित मानस प्रमुख हैं । रामकथा के आधार पर यहां अनेक काव्य ग्रंथ लिखे गये । रघुवर जसप्रकाश, रघुनाथ रूपक आदि ग्रंथों में रामकथा के माध्यम से छंद व अलंकारों का वर्णन किया गया है । मारवाड़ में नाथ संप्रदाय का प्रभाव पा्रचीन काल से रहा है । इस संप्रदाय के चमत्कारी साधुओं को यहां के शासकों से ही नहीं, छोटे-बड़े जागीरदारों से भी जमीन आदि दान में प्राप्त हुई । इस पंथ के जोगी घर-घर जाकर भिक्षाटन से अपनी उदर पूर्ति करते थे । वे अपने इकतारे पर गोपीचंद, भरथरी आदि राजाओं की कथा व शिव व्यावला आदि लोकाव्य की सरस भावभूमि में गा-गाकर उन्हें लोकप्रिय बनाने में पीछे नहीं रहे । यहां शैव मत का प्रचार-प्रसार बहुत ही व्यापक और शिव भक्ति यहां बहुत लोकप्रिय रही । प्रायः प्रत्येक गांव में छोटा-बड़ा शिववालय बना हुआ है । शिव के विशाल व प्राचीन मंदिरों में जो प्रायः विजन प्रदेश या पहाड़ी क्षेत्रों में बने हुए हैं वहां भी मारवाड़ की जनता अपने भक्तिभाव को प्रदर्शित करने व आराध्य की पूजा-अर्चना के लिये जाती रही है । शिवभक्ति का रामभक्ति के साथ तुलसी ने जो समन्वय स्थापित किया उसकी सहज अनुभूति हमें मध्यकालीन मारवाड़ की जनता के भक्ति साहित्य में दृष्टिगोचर होती है । रामलीला और कृष्णलीला के मंचन की परंपरा से राम व कृष्ण भक्ति को यहां लोकप्रियता हासिल हुई और इस भक्ति-भावना का यहां प्रचार-प्रसार अत्यधिक हुआ । गांव के ठाकुरों, सेठ-साहूकारों व धर्मपरायण श्रद्धालु भक्तों द्वारा चतुर्मास में राम चरित मानस व गीता भागवत आदि धर्मग्रंथों के पाठ का आयोजन भी करवाया जाता था । यही भक्ति भावना यहां के भजनों व हरजसों से भी अभिव्यक्त होती है । इसी प्रकार यहां ऐसे अन्य दूसरे पंथ व संप्रदायों की भक्ति के प्रति जनमानस अधिक आकृष्ट हुआ, जिसमें सैद्धान्तिक विवेचना की गूढ़ता व कर्मकाण्डों की बहुलता के विपरीत सरल, अनौपचारिक व बहुत ही सहज जिनके नियम थे । इनमें कबीर, दादू पंथ का प्रभाव अधिक रहा, इसके अतिरिक्त रामस्नेही, निम्बार्क, निरंजनी आदि अन्यान्य संप्रदायों के प्रति भी यहां के लोगों का रुझान काफी था । राम या कृष्ण चाहे किसी में श्रद्धा रखने वाले यहां के शासकों द्वारा शक्ति और शौर्य की प्रतीक दुर्गा, अम्बिका आदि देवियों की उपासना भी की जाती रही है । मारवाड़ के राठौड़ राजपूतों की कुलदेवी नागणेचियां रही है । इसी प्रकार अन्य राजपूतों और विभिन्न जातियों की अपनी-अपनी कुलदेवी के प्रति अगाध आस्था रही है । मारवाड़ में चारणों द्वारा दुर्गा की वंदना तथा उसकी लीला का गान अपने साहित्य में बहुत अधिक मात्रा में किया है । जैन यतियों द्वारा भी दुर्गा की स्तुति में यहां कई काव्य रचे गये । आदि शक्ति के विभिन्न स्वरूपों के साथ चारण समाज में उत्पन्न विभिन्न देवियां जैसे, करणी, आवड़ आदि का भी यहां बड़ा वर्चस्व रहा है। मध्यकाल के जनजीवन पर इन देवियों का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है । मध्यकाल की राजनैतिक उथल-पुथल के उस अस्थिर माहौल में जनता की आशा का केन्द्र उसकी ईश्वर के प्रति आस्था और भक्ति में ही रह गया था । इस युग में यहां भक्ति साहित्य का खूब सृजन हुआ, सगुण व निर्गुण दोनों तरह के भक्तिमार्ग यहां पनपे, जिसमें सगुण धारा का बोलबाला अधिक रहा । इसके फिर कई विभाजन रामाश्रयी, कृष्णाश्रयी, प्रेममार्गी, ज्ञानमार्गी आदि किये जा सकते हैं । भक्ति साहित्य के सृृजन में नरहरिदास, ईसरदास, माधोदास दधवाड़िया, पृथ्वीराज राठौड़, चूंडा दधवाड़िया आदि कई प्रमुख रचनाकार अग्रणी थे । मीरां, करमांबाई, धन्ना भगत इत्यादि अनेक भक्त सिरोमणी इस क्षेत्र में उत्पन्न हुए कि यह वीर भूमि संतों व भक्तों की क्रीड़ास्थली बन गईं । -35/133-6.

 


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