सिलोकौ

  -एक प्रकार की पद्य बंध वचनिका । -33/789.

 

रासो

-देखें ‘रासौ’ ।

विगत

-1. अतीत, बीता हुआ, वर्तमान से पूर्व का । 2. अंतिम या बीते हुए से पूर्व का । 3. इधर-उधर गया हुआ । 4. निष्प्रभ, कान्तिहीन । 5. रहित, विहीन । -वि. 1. विवरण, व्योरा । 2. वृत्तांत, हाल । 3. इतिहास । 4. हिसाब । 5. परिचय, जानकारी । 6. सूची, नामावली । 7. घटना । 8. वर्णन सूची, तफसील । 9. संख्या, गिनती । 10. विशेष मुक्ति, मोक्ष । 11. अधोगति गया हुआ प्राणी ।  -33/600.

वंश

 -1. कुल, खानदान, गौत्र । संतान परम्परा । 2. संतान, संतति, परिवार । 3. बेड़ा । 4. समुदाय, समूह । 5. खड़्ग के बीच का चौड़ा भाग । 6. युद्ध की सामग्री । 7. रीढ़ की हड्डी । 8. गांठ । 9. गन्ना, ऊख । 10. साल वृक्ष । 11. शहतीर, बल्ला, लट्ठा। 12. पुष्प, फूल । 13. विष्णु का एक नाम । 14. पुरुषों की बहत्तर कलाओं में से एक । 15. वंसलोचन । 16. बारह हाथ का एक नाप । पु. किसी वंश का मूल पुरुष । -33/550.

लोक साहित्य

 -लोक साहित्य लोक-संस्कृति का एक अभिन्नअंग है । जन-संस्कृति का दर्पण को लोक साहित्य कह सकते हैं । लोकभाषा और लौकिक शैली में लिखा साहित्य जिसे ‘लोक साहित्य’ कह कर पुकारते हैं किसी देश या प्रान्त के जनजीवन को, वहां के लोक मानस की सही झांकी को प्रस्तुत करता है । लोक की युग-युग की वाणी साधना इसमें सुरक्षित होती है । कितने ही ज्ञात-अज्ञात जन कवियों ने अपनी सरल और सरस वाणी में अपने जीवन के जीवन्त अनुभवों को इसमें ढाल कर जन साधारण के लिये अमूल्य खजाना प्रस्तुत किया है । लौकिक प्रेमकाव्य, लोकगीत, लोककथाएं, लोकगाथाएं आदि ऐतिहासिक, अर्द्ध ऐतिहासिक, काल्पनिक और पौराणिक आदि विविध प्रसंगों पर आधारित है तथाइसकी शैली का अपना ही अनुठा अंदाज है । भावों की सहज व सरल अभिव्यक्ति लोकसाहित्य की प्रमुख विशेषता है । वस्तुतः लोक साहित्य यहां के लोक-जीवन की ऐसी स्वाभाविक अभिव्यक्ति है जिसमें सतत् जीवन्तता और प्रवाहमानता विद्यमान है । साधनहीन मरुस्थल में जहां पानी तक सरलता से सुलभ नहीं है, लोकगीतों और लोकगाथाओं की सहस्र धाराओं में यहां बसे मानवों की संस्कृति को सरस और भाव प्रवण बनाते रहे हैं । ख्यात, बात, विगत, वंशावली, हाल, हकीकत, याददास्त, बही, रासो, विलास, प्रकास, रूपक, वचनिका, दवावैत, वेलि, झमाल, झूलणा, सिलोका, निसांणी, दूहा, गीत, छन्द, चौपाई, कवित्त, परचो, पच्चीसी, बत्तीसी, बावनी, शतक, सतसई इत्यादि राजस्थानी साहित्य में जो विविध संज्ञक रचनाएं उपलब्ध होती हैं उनमें यहां का प्राचीन सांस्कृतिक वैभव बिखरा पड़ा है । इस गौरवपूर्ण सांस्कृतिक वैभव को जो हमें सौभाग्य से विरासत से प्राप्त हुआ है, उसे हम विस्मृत करते जा रहे हैं । अपने कुल की परंपराओं और मर्यादाओं का पालन करने वाला कुल की समृद्धि व ख्याति फैलाने वाले को सपूत कहा जाता है । इसके विपरीत आचरण करता है वह कपूत कह कर पुकारा जाता है । हमारा प्राचीन साहित्य बड़ा सुसम्पन्न और समृद्ध रहाहै । उसकी एक सुदीर्घ परंपरा रही है । उसीसे प्रेरणा पाकर यहां का इतिहास इतना गौरवान्वित हुआ है । यहां के साहित्य में सामाजिक, राजनैतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, नैतिक, आयुर्वेदिक, खगोल शास्त्रीय, ज्योतिष, मंत्र-तंत्र, नीति शास्त्र, संगीत इत्यादि विविध पहलुओं से संबंधित भरपूर सामग्री है । -35/137-8.


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