राज्याश्रय संगीत

-अजीतसिंह की लड़की सूरजबाई के विवाह की बही (1776 वि.) में यद्यपि कलावंत कायम खां और कासिम खां व रब्बाब वादक सदाराम के नाम मिलते हैं तथापि 1750 ई. के आसपास विजयसिंह के काल में ही जयपुर-किशनगढ़ से कलाकारों का जोधपुर आना व राज्याश्रय पाना प्रारंभ हुआ । पहले पहल घासी खां व उनके साहबजादे हकानी बक्श आये । फिर अंतरोली के भूपतखां, रामपुर के मानतौल खां, अंतरोली के अमानीबक्श और कादिरबक्श, किशनगढ़ के कव्वाल मुहम्मद पन्ना, सिंकंदराबाद के रमजानखां रंगीले, ख्वाजा बक्श, अतरोली के हैदर बक्श, सिकंदराबाद के रहमतुल्ला, पंजाब के रसूल बेग व गुलाम रसूल, कालपी के ठुमरी गायक हसन खां, मेवाती घराने के नजीर खां, ग्वालियर के हिम्मत खां, आगरा के शेर खां और सितार वादक मंगल खां का आगमन 1750-1800 ई. के मध्य हुआ और इनकी परम्परा के प्रतिनिधियों ने रियासत में 1930-40 ई. तक सूर्यनगरी को स्वरनगरी बना दिया ।....ये सभी कलावंत महीनदार-मासिक वेतन पाने वाले थे जिन्हें खासा खजाना से वेतन मिलता था । गैर हाजिरी का वेतन काट दिया जाता था । साधारणतः गायक 15-30 रु., सितार वादक 7.50 रु. व पखावज-तबला वादक को 5 रुपये वेतन था । इन्हें छुट्टी लेकर बाहर जाना होता तथा प्रतिदिन कलाकारों की चैकी पर हाजिरी देनी होती थी । पीरबक्श, रमजानखां, इमामबक्श जैसे कलाकारों को महलों में निर्बाध प्रवेश की छूट थी जिसे ‘म्हाली छूट’ कहते थे । रमजानखां को अहमदपुरा गांव इनाम में दिया था । वरिष्ठ कलाकारों को पालकी का सम्मान भी दिया जाता था । इन कलाकारों की प्रस्तुतियों की बाकायदा समीक्षा लिखी जाती थी । विजयसिंह पुष्टिमार्ग के परम अनुयायी थे । उन्होंने बालकृष्णजी का मंदिर बनाया और जोधपुर के सभी मंदिरों में कीर्तनियों, सारंगी/वीणा वादकों और पखावज वादकों की नियुक्तियां की । जोधपुर में निवास करने वाले ब्राह्मण और भगत गायक-वादकों ने इन कलाकारों कासानिध्य पाकर मंदिर की नियमित सेवा के अलावा तालीम लेकर महफिलों में अपनी कला का प्रदर्शन करना प्रारंभ किया - इनमें पुष्करणा और दाधीच ब्राह्मण अग्रणी थे । थानवी पन्नालाल, बलदेव, हरदेव, जयदेव, छांगाणी हीरालाल और पन्नालाल, सनेईलाल व्यास, हरनाथ और गोरधन, बिस्सा रामकरण और रामनाथ बोहरा, सैजराम और माणकचंद पुरोहित, बच्छराज, सदाराम और रामदास, दाधीच सुरतराम किसनराम, तिवाड़ी तेजराम और सुखराम, तिवाड़ी रिधकरण, विजयसिंह व मानसिंह के समय ऐसे गायक और वादक हुए हैं जिनकी शिष्य परंपरा ने आगामी एक शताब्दी तक नादब्रह्म की उपासना की है । इन्हें 3-10 रु. तक प्रतिमास वेतन मिलता था तथा शादी ब्याह पर अग्रिम 2-3 मास का वेतन लेने की सुविधा थी । जन्माष्टमी, नृसिंह जयन्ती या मंदिरों के पाटोत्सव पर इन्हें सिरोपाव इनायत होते, सर्दी गर्मी के कपड़े मिलते, सर्दी में तो रजाइयां भी इनायत की जाती थीं । कलावंतों और हिन्दु गायकों मेें एक अंतर अवश्य था । गायक या वादक की कुशलता और गुणों के आधार पर उसे कभी प्रशासनिक पदों पर नियुक्त किया जाता, थानवी हरदेव को फलौदी का हाकम भी बनाया गया था ।.......इन ब्राह्मण गायक/वादकों के साथ जोधपुर राज्य के साध और भगतों ने भी संगीत की सेवा कर बड़ा नाम कमाया है । साध वेणीदास, भगत गिरधारी, अम्बादास, भगत कनीराम और गोकलराम, भगत देवीदास, नायक रामकिशन व मोतीलाल और भोजग मोगरियां और बृृजलाल नामी गायक वादक हुए । इनमें से श्रेष्ठ गायकों को रियासत की तरफ से ईसरी/ईश्वरी की उपाधि दी जाती थी । नये कलाकारों को उम्मीदवारी में रखा जाता था । साध-भगत अधिकतर पखावज बजाया करते थे अथवा नृत्य के गुरु थे । मंदिरों में जब कभी महाराजा दर्शन करने पधारते थे तब इन कलाकारों को सिरोपाव या आभूषण इनायत कर इनकी साधना को नवाजा करते थे । -17/13.
-जयपुर राजा मानसिंह के भाई माधोसिंह ने आगरा में ‘माधोभवन’ बनाया था जिसमें तानसेन की हाजरियां हुआ करती थीं । प्र्रसिद्ध संगीतशास्त्री पुण्डरीक विट्ठल भी यहीं पर नियुक्त थे । मिर्जा राजा जयसिंह (1622-1667 ई.) के समय में कलावंतों को प्रतिमाह बारह से बीस रुपये तक वेतन दिया जाता था । इनके समय के उल्लेखनीय कलाकारों में खान मुहम्मद, हुसैनखां, निजामखां, अब्दुला और छद्दूखां मुख्य हैं ।.....जयपुर के कुछ प्रसिद्ध कलाकारों में वीणावादक रज्जब अली खां, बन्दे अली, सावल खां तथा मुशर्रफ खां, ध्रुपद गायक बहरामखां, अमीरबक्श, सितार वादक रहीमसेन, अमृतसेन और वाग्गेयकार तथा गायक मुहम्मद अली खां, हरिवल्लभाचार्य और कल्लन खां के नाम उल्लेखनीय हैं । -17/14-5.
-उणियारा गोहर तथा खंडार वाणी के संगीतज्ञों का यह केन्द्र रहा है । उणियारा के प्रसिद्ध सीतारामजी के मंदिर में 17वीं शती के अंतिम समय से 8 संगीतज्ञ नियमित रूप से नियुक्त थे । सरदार सिंह के समय के प्रसिद्ध कलाकारों में मोहम्मद खांव रहीम्मुला खां प्रसिद्ध हैं । अल्लादिया खां के पिता ख्वाजा अहमद और दादा जुग्गन खां उणियारा के दरबार में नियुक्त थे । -17/16.
-टौंक में संगीत की दृष्टि से नवाब इब्राहीम अली खां का समय विशेष उल्लेखनीय है । पटियाला के अलीबक्श‘आलियाफत्तू’ इन्हीं इब्राहीम खां के दरबार में थे व नवाब की बंदिशों को अपने स्वरों से जोड़ कर पेश करते थे । इब्राहीम खां के काल में अब्दुल कादिर खां, अल्लाबख्श खां और नन्हे खां बेजोड़ सारंगिये थे । अहमद जान खां, बून्दू खां कलावंत थे और कल्लू हफीज खां सितार बजाया करते थे । ....टौंक के नवाबों ने शास्त्रीय संगीत के साथ कव्वाली की विद्या को भी बहुत प्रश्रय दिया। टोैंक के कव्वाल गायकों में बुन्दूखां, जहूरखां, अहमद नूर और मुहम्मद दीन खां को काफी प्रसिद्धि प्राप्त हुई ।-17/16.
-भरतपुर के जसवंत सिंह संगीत को समर्पित शासक रहे हैं । इस रियासत में नियुक्त नामचीन संगीतज्ञों में ‘सरसपिया’ नाम से प्रसिद्ध काले खां, ध्रुपद गायक अलीबक्श, आगरा घराने के नन्हे खां, सलीम खां, सीकरी के गवैये मदार बक्श, नदिया वाले गायक केशर खां तथा धन्ने खां ने विशेष रूप से नाम कमाया है ।.......अखिल भारतीय संगीत सम्मेलनों में काफी प्रशंसा अर्जित करने वाले सितार वादक पं. मनमोहन धौलपुर रियासत में आश्रित कलाकार थे । 1925 ई. में बनारस सम्मेलन में धौलपुर से मनमोहन के साथ उ. विलास खां, रणधीर व हंसधर ने भी भाग लिया था । ...बहादुरशाह जफर, अंतिम मुगल समा्रट के दरबारी गायक तानरस खां की शिष्य परंपरा में उस्ताद अहमद खां, पंचम खां और उनके पुत्र मस्सूखां धौलपुर दरबार में गायक रहे । -17/17.
-बूंदी के चित्रकारों ने 1625 ई. में बनाई हुई रागमाला की चित्रांकित प्रति विश्व भर में प्रसिद्ध है । प्रसिद्ध सितार वादक मीरां बक्श और मेहताब खां बूंदी के दरबार में ही रहे हैं । बूंदी के शासक वल्लभ संप्रदायानुयायी होने से उन्होंने पुष्टिमार्गीय संगीत को संरक्षण दिया । रंगीला घराने के मुहम्मद अल्ली ने भी कुछ समय तक बूंदी नरेश की गान सेवा की है । ...-झालावाड़ के महाराजा भवानी सिंह का नाट्य व संगीत प्रेम काफी प्रसिद्ध है । उन्होंने भवानी नाट्यशाला को संगठित किया था । झालावाड़ में संगीत विद्यालय की स्थापना 1940 ई. में हो गई थी । कोटा रियासत में अधिकांश कलावंत झालावाड़ से ही गये थे । -17/18-9.
-बीकानेर के कलाकारों में मिरची खां, शमसुदीन, रुकनदीन, अल्लारखे खां, लंगड़े हुसैन बक्श, कासिम खां, कादर खां प्रसिद्ध हैं । इनके अतिरिक्त गोस्वामी परिवारों के भी अनेक व्यक्तियों ने संगीत साधना की है जिनमें कृष्णभट्ट, शिव भट्ट जैसे शास्त्रकार और लाभूजी, जेठा महाराज, आसकरण, ढूंढ़ा महाराज के नाम उल्लेखनीय हैं । गोपालपुरा के पं. मोहनलाल व गिरधारीजी, पालास के सुखदेव प्रसाद, बंडवा के शम्भूप्रसाद, चाडवास के नायक माखनलाल, खूड़ी के बद्रीप्रसाद कत्थक, देवलाली के वैजनाथ, ढरढ़ा के कन्हैयालाल जवड़ा, कनवारी के पं. जयलाल और सुंदरप्रसाद, बीकासर के महादेवप्रसाद, भालेरी के पन्नालाल, हरासर के शिवलाल आदि कितने ही कत्थक इस क्षेत्र से निकले हैं।...राजस्थान की प्रायः सभी रियासतों में सारंगी वादक और तबला वादक शेखावाटी क्षेत्र से आते रहे हैं जिनमें मिरासी अधिक हैं । सीकर से तो अनेक सारंगी-वादकों, गायकों व तबला वादकों ने अखिल भारतीय कीर्ति अर्जित की है जिनमें गायक अब्दुलखां, तबला वादक मुबारक अली, घसीटखां, हिदायतखां, शमीमखां और सारंगी वादक नजीरखां, मदारीखां, मुनीरखां, सुल्तानखां और महबूबखां प्रमुख हैं । लक्ष्मणगढ़ के विष्णुराम, खरादी बंधु, मुकुन्द और रामपाल अच्छे गायक हुए हैं ।.....झुंझनू के अन्नुखां रहमानखां और कादरखां, स्वामी नारायणदास और बाबा भगवानदास लोकप्रिय गायक हैं । तानरस खां की शिष्या नन्ही बाई तो भारत भर में विश्रुत रही है । बिसाऊ के ठाकुर विष्णुसिंह स्वयं संगीत के पारखी थे । बिसाऊ के प्रसिद्ध कलाकारों में मोहम्मद बक्श, इनायतखां, मिश्रीसिंह, अमीरखां, याकूबखां, जमालुदीन भारती और इंद्रचंद्र ने संगीत के क्षेत्र में अपना नाम अमर किया है । बीदावाटी और शेखावाटी के कलाकारों द्वारा की गई कला साधना निरपेक्ष है, साधना के लिये उन्हें कोई राज्याश्रय नहीं मिला । -17/19-20.
-उदयपुर, महाराणा कुम्भा के समय तक मेवाड़ में प्राचीन प्रबंध गान तथा चच्चतपुट, चर्चरी, मण्ठ, प्रतिमण्ठ, त्रिपुट आदि तालों का प्रयोग होते रहने का उल्लेख किया गया है । ये प्रयोग ‘एकलिंगमाहात्म्यम्’ में देखे जा सकते हैं । कुम्भा की कन्या रमाबाई को ‘वागीश्वरी’ कहा जाता था । महाराणा प्रताप के समय में (1605 ई.) रागमाला का हुआ चित्रांकन राजदरबारों में भी संगीत की सत्ता को ही द्योतित करता है ।.....दस्तावेजी साक्ष्य महाराणा जगतसिंह की राज्यसभा में ‘गायनगनगंधर्व’ और ‘वादित्रिक’ नामक पदाधिकारियों का उल्लेख करते हैं । ‘राजविलास’ और ‘भीमविलास’ में तो संगीत की ऐसी पचासों महफिलों के वर्णन मिलते हैं जो राजसिंह व भीम सिंह के शासनकाल में समय समय पर संपन्न हुई थीं ।......उदयपुर के कलावंतों से संबंधित अभिलेख 1750 ई. से प्रारंभ होते हैं । इस समय के उदेराम, मीठा, कालूखां अजमेरी और खाजबगस को गांव अथवा जमीनें जागीर में इनायत की गईं थीं। 19वीं शती के प्रारंभ से अधिकतम वेतन रुपये 90 तथा न्यूनतम 30 रुपये पर कलावंतों को नियुक्त किया जाता था । महाराणा स्वरूप सिंह, जो स्वयं सितार वादक थे, के आश्रय में अलीबक्श, अमीनखां, मीरांबक्श, उनके पुत्र करीम बक्श और पौत्र अहमद बक्श तथा अतर खां व उनके पुत्र आवादान श्रेष्ठ कोटि के कलाकार माने जाते थे । दिलदारखां के पुत्र ननेखां सूरसिंगार बजाते थे। महाराणा शंभूसिंह के समय में सितार वादक मंगलूखां, ख्याल गायक खाजुखां व मानखां तथा कानूनवादक अलाहीबक्श व उनके पुत्र अहमद बक्श, बीनकार पं. अनंतराम, दायेमखां, जयलाल गौड़, गुलाम भीखू और दायरे खां प्रमुख हैं । 19वीं शती के प्रारंभ में पं. बहराम खां की शिष्य परंपरा ने उदयपुर में रह कर धु्रपद धमार गायन शैली व वीणा वादन की बड़ी सेवा की है ।.....उदयपुर रियासत में नियुक्त दिलरूबावादक नाथु के पुत्र पं. रामनारायण ने सारंगी वादन में और पं. चतुरलाल ने तबला वादन में विश्वव्यापी ख्याति अर्जित की है । -17/21-2.

पखावज वादक

-जोधपुर के पखावज वादकों में जावली/मारवाड़ जंक्शन के निकट, घराने के पहाड़सिंह और उनके पुत्र जवारसिंह और पौत्र देवा उल्लेखनीय हैं । हालूका/जयपुर परंपरा के गोपाल, गोमदराम, लक्ष्मणदास, बैजनाथ और नत्थू मानसिंह-कालीन नामचीन पखावजी रहे । इस सिलसिले में जयपुर के पखावज वादक पं. रूपराम के पुत्र वल्लभदास विजयसिंह के समय में जोधपुर रहे थे और बाद में श्रीनाथजी की सेवामें नाथद्वारा चले गये थे । नाथद्वारा का प्रसिद्ध पखावजियों का घराना इन्हीं रूपरामजी का है । इसी परंपरा के घनश्यामदासजी ने मृदंगसागर की रचना की थी ।.....भगत कीरतराम, कुषालदास, गिरधारी, खेमदास और नटवा किशनदास, गणेशदास और डूगल/डूंगर मानसिंह के समय के अच्छे पखावजियों में गिने जाते थे । -17/13-4.

झील

-स्वर । ‘लिखना पढ़ना सीख कर भवाई के दल से आठ-दस वर्ष का लड़का जुड़ जाता है । ऐसे लड़कों का गला उन्नीस-बीस वर्ष की अवस्था प्राप्त करने तक अच्छा रहता है । इसे ‘झील’ कहते हैं । किन्तु लग्न हो जाने के बाद झील बिगड़ने लगती है । सुर फटने लगता है । भवाई का कलाकार जब तक ब्रह्मचर्य का पालन करता है तभी इसी झील को सुस्थिर बनाये रख सकता है । -16/12.

नाच-गायन

-हाडो देवो वांगावत भैंसरोड परी छोडनै बूंदी मैणांरो मेवास जांण अठै बूंदी आयो । तरै बूंदीरै मैणै दूड़ी नाचणरो घर थो, तठै घर ठौड़नूं जायगा दिखाई । सु दूड़ीनूं क्युं अगमरी खबर पड़ती । सु दूड़ीनै देवे भेळै रहतां सुख हुवो । सु दूड़ी एकत देवानूं कहै छै - ‘इण धरतीरा धणी थे हुस्यो ।’   -10/88-9.

गुणीजन खाना

-सवाई जयसिंह ने जयपुर को राजधानी बनाकर 36 कारखानों की स्थापना की उनमें ‘गुणीजन खाना’ भी एक प्रमुख कारखाना था । उनके समय में ब्रजभूषण भट्ट, रामकृष्ण, सेवाराम तथा नाथूराम तिवाड़ी प्रसिद्ध संगीतज्ञ रहे हैं । सवाई प्रतापसिंह स्वयं अच्छे संगीतशास्त्री रहे हैं जिन्होंने चांदखां से तालीम ली थी । इनके समय में छाजूखां, जुगन कलावंत और लल्लूखां पखावजी प्रसिद्ध रहे । सवाई रामसिंह का समय गुणजनखाने का ‘स्वर्णयुग’ था जिसमें 161 से अधिक कलावंत तथा नक्कारखाने के 38 कलाकार नियुक्त थे । घासीखां के पुत्र समनु को अखेपुर का वास तथा अमीरबक्श को गांव चावड़का मंड तथा हवेलियां दी गईं थीं । रामसिंह के समय में बंशीधर भट्ट और वीणावादक ब्रजलाल को भी जागीरें तथा हवेलियां इनायत की गईं थीं ।.....जयपुर के गुणीजनखाने जैसा विशाल गुणीजनखाना राजस्थान में अन्य किसी रियासत का नहीं था । सन् 1882 में गुणीजनखाने का बजट 44045 रुपये था जो क्रमशः घटते हुए 1945 ई. में 21600 रुपये हो गया । गुणीजनखाने के विशिष्ट कलावंतों को पालकी या घोड़े की सवारी का ‘कुरब’ दिया हुआ था । रजबअली जैसे कलाकार काएक मशालची, एक घोड़ा, दो डील तथा एक चोबदार दिया हुआ था । अमृतसेन की पालकी खींचने के लिये बैलों की जोड़ी थी एवं एक हलकारा उनकी सेवामें था । यही सम्मान कुछ गायिकाओं को भी दिया गया था, जिनमें केसर तवाईफ और अजमेर की नन्ही जान उल्लेखनीय है । -17/14-6.
-अलवर के प्रथम शासक रावराजा प्रतापसिंह के समय में ही गुणीजनखाना स्थापित हुआ था । प्रतापसिंह के पुत्र विनयसिंह ने इस गुणीजन खाने को व्यवस्थित किया और कलावंतों को राजकीय प्रश्रय देना शुरू किया । इनके समय में रहीम सेन व हिम्मत सेन गुणीजन खाने में नियुक्त थे । ....जयसिंह के समय में अलवर के गुणीजन खाने में 70 कलावंत एवं संगीतकार, 22 गायिकाएं तथा बेला बैंड में 45 कलाकार नियुक्त थे । अलवर में गायकों को 70 से 100 रुपये तक, बीनकारों को 50 रुपये तथा सारंगियों व तबलियों को 30-30 रुपये वेतन दिया जाता था ।...अलवर के प्रसिद्ध कलावंतों में ध्रुपद गायक
अलाबन्दे खां, सितार वादक कालेखां व जमरूद्दीन, वीणा वादक सादिक अली खां, ध्रुपदिये हुसैनुद्दीन के अलावा आसिफ अली, असगर अली, मुश्ताक अली और अब्दुल वहाब उल्लेखनीय है । अलवर के ढोलकिये जान मुहम्मद ने मंदिरों में वाद्यों परचमड़े के स्थान पर कपड़े की पुडि़यां चढ़ा कर बजाने का एक अभिनव उपक्रम किया था । जयसिंह के परवर्ती समय में टप्पा गायक कुबड़े उस्ताद व यासीम खां, लच्छा उस्ताद सारंगी के लिये प्रसिद्ध हुए हैं । -17/17.
-करौली में भंवरपाल, भोमपाल तथा गणेशपाल के शासन में यहां लगभग 20 कलावंत गुणीजनखाने में नियंक्त रहे हैं । मदनमोहनजी के विग्रह की करौली में स्थापना से करौली के गुणीजनखाने में जुगलबंदी से ध्रुपद गाने वाले उ.जममन-सम्मन, ग्वालियर के ध्रुपदिये वामन बुवा देशपांडे/फलटणकर, परमानंद, पूसाराम लटूरराम आदि उल्लेखनीय कलावंत रहे हैं । मदनमोहनजी के विग्रह की स्थापना के बाद वैष्णव संगीत की भी परंपरा करौली में प्रारंभ हुई । यद्यपि यह मंदिर पुष्टिमार्गीय परंपरा का नहीं है, इस मंदिर मंे गायक, सारंगिये और पखावज वादकों की नियुक्ति की जाती थी -17/18.
-18वीं शती में जोधपुर नरेश विजय सिंह का एक विवाह बूंदी में हुआ था । इस अवसर पर जोधपुर व बूंदी के गुणीजनों का जलसा आयोजित होने का महत्वपूर्ण उल्लेख जोधपुर की हकीकत बहियों में भी मिलता है । -17/19.
-बीकानेर में महाराजा रामसिंह के समय में 1574 ई. में ही गुणीजन खाने की स्थापना होने के संदर्भ मिलते हैं । इस गुणीजन खाने के नियंत्रण में संगीतशाला भी चलाई जाती थी । महाराजा गंगा सिंहजी के समय में 45 विद्यार्थी इसमें शिक्षा ग्रहण करते थे । -17/19.
-उदयपुर दरबार में नियुक्त कलावंतों की व्यवस्था के लिये उत्तर मध्यकाल में गुणीजनखाने की तर्ज पर ‘संगीत प्रकाश’ नामक विभाग को कायम किया गया था, जो वाद्यों की व्यवस्था, कलावंतों की उपस्थिति, उनके वेतन तथा इनाम के अभिलेखों का संधारण करता था । 19वीं शती में संगीत प्रकाश का बजट अधिकांश रूप से 11,500 रुपये रहा है । संगीत प्रकाश के अधिकारी को‘म्हासाणी’ कहा जाता था । उसकी सहायता के लिए एक कामदार तथा दफ्तर में काम करने के लिये दो व्यक्ति थे । विभिन्न अवसरों पर शंभुनिवास, खुशमहल, छोटी चतरसाली, बड़ी चतरसाली, प्रीतमनिवास में महफिलोंके आयोजन का जिम्मा म्हासाणी का था । कलावंत, भगतणें, नटवा, नेगी, सारंगिये, पखावज वादक तथा सपरदायी संगीतप्रकाश में नियुक्त थे । नगारखाने का नियमन भी संगीतप्रकाश के अधिकारियों को ही करना होता था । नगारचियों और ढोलियों की पत्नियों को सुबी शाम महलों में गीत गाने के लिये जाना होता था ।.....कलावंतों की तरह संगीतप्रकाश में महिला संगीतज्ञों को भी नियुक्ति की जाती थी जिनका वेतन मासिक 180 रुपये तक भी बढ़ जाता था । 19वीं शती की बधु अथवा छबरूप जैसी गायिकाओं को जमीन व हवेलियां भी जागीर में दी गईं थीं । -17/21-23.


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