गुणीजन खाना

-सवाई जयसिंह ने जयपुर को राजधानी बनाकर 36 कारखानों की स्थापना की उनमें ‘गुणीजन खाना’ भी एक प्रमुख कारखाना था । उनके समय में ब्रजभूषण भट्ट, रामकृष्ण, सेवाराम तथा नाथूराम तिवाड़ी प्रसिद्ध संगीतज्ञ रहे हैं । सवाई प्रतापसिंह स्वयं अच्छे संगीतशास्त्री रहे हैं जिन्होंने चांदखां से तालीम ली थी । इनके समय में छाजूखां, जुगन कलावंत और लल्लूखां पखावजी प्रसिद्ध रहे । सवाई रामसिंह का समय गुणजनखाने का ‘स्वर्णयुग’ था जिसमें 161 से अधिक कलावंत तथा नक्कारखाने के 38 कलाकार नियुक्त थे । घासीखां के पुत्र समनु को अखेपुर का वास तथा अमीरबक्श को गांव चावड़का मंड तथा हवेलियां दी गईं थीं । रामसिंह के समय में बंशीधर भट्ट और वीणावादक ब्रजलाल को भी जागीरें तथा हवेलियां इनायत की गईं थीं ।.....जयपुर के गुणीजनखाने जैसा विशाल गुणीजनखाना राजस्थान में अन्य किसी रियासत का नहीं था । सन् 1882 में गुणीजनखाने का बजट 44045 रुपये था जो क्रमशः घटते हुए 1945 ई. में 21600 रुपये हो गया । गुणीजनखाने के विशिष्ट कलावंतों को पालकी या घोड़े की सवारी का ‘कुरब’ दिया हुआ था । रजबअली जैसे कलाकार काएक मशालची, एक घोड़ा, दो डील तथा एक चोबदार दिया हुआ था । अमृतसेन की पालकी खींचने के लिये बैलों की जोड़ी थी एवं एक हलकारा उनकी सेवामें था । यही सम्मान कुछ गायिकाओं को भी दिया गया था, जिनमें केसर तवाईफ और अजमेर की नन्ही जान उल्लेखनीय है । -17/14-6.
-अलवर के प्रथम शासक रावराजा प्रतापसिंह के समय में ही गुणीजनखाना स्थापित हुआ था । प्रतापसिंह के पुत्र विनयसिंह ने इस गुणीजन खाने को व्यवस्थित किया और कलावंतों को राजकीय प्रश्रय देना शुरू किया । इनके समय में रहीम सेन व हिम्मत सेन गुणीजन खाने में नियुक्त थे । ....जयसिंह के समय में अलवर के गुणीजन खाने में 70 कलावंत एवं संगीतकार, 22 गायिकाएं तथा बेला बैंड में 45 कलाकार नियुक्त थे । अलवर में गायकों को 70 से 100 रुपये तक, बीनकारों को 50 रुपये तथा सारंगियों व तबलियों को 30-30 रुपये वेतन दिया जाता था ।...अलवर के प्रसिद्ध कलावंतों में ध्रुपद गायक
अलाबन्दे खां, सितार वादक कालेखां व जमरूद्दीन, वीणा वादक सादिक अली खां, ध्रुपदिये हुसैनुद्दीन के अलावा आसिफ अली, असगर अली, मुश्ताक अली और अब्दुल वहाब उल्लेखनीय है । अलवर के ढोलकिये जान मुहम्मद ने मंदिरों में वाद्यों परचमड़े के स्थान पर कपड़े की पुडि़यां चढ़ा कर बजाने का एक अभिनव उपक्रम किया था । जयसिंह के परवर्ती समय में टप्पा गायक कुबड़े उस्ताद व यासीम खां, लच्छा उस्ताद सारंगी के लिये प्रसिद्ध हुए हैं । -17/17.
-करौली में भंवरपाल, भोमपाल तथा गणेशपाल के शासन में यहां लगभग 20 कलावंत गुणीजनखाने में नियंक्त रहे हैं । मदनमोहनजी के विग्रह की करौली में स्थापना से करौली के गुणीजनखाने में जुगलबंदी से ध्रुपद गाने वाले उ.जममन-सम्मन, ग्वालियर के ध्रुपदिये वामन बुवा देशपांडे/फलटणकर, परमानंद, पूसाराम लटूरराम आदि उल्लेखनीय कलावंत रहे हैं । मदनमोहनजी के विग्रह की स्थापना के बाद वैष्णव संगीत की भी परंपरा करौली में प्रारंभ हुई । यद्यपि यह मंदिर पुष्टिमार्गीय परंपरा का नहीं है, इस मंदिर मंे गायक, सारंगिये और पखावज वादकों की नियुक्ति की जाती थी -17/18.
-18वीं शती में जोधपुर नरेश विजय सिंह का एक विवाह बूंदी में हुआ था । इस अवसर पर जोधपुर व बूंदी के गुणीजनों का जलसा आयोजित होने का महत्वपूर्ण उल्लेख जोधपुर की हकीकत बहियों में भी मिलता है । -17/19.
-बीकानेर में महाराजा रामसिंह के समय में 1574 ई. में ही गुणीजन खाने की स्थापना होने के संदर्भ मिलते हैं । इस गुणीजन खाने के नियंत्रण में संगीतशाला भी चलाई जाती थी । महाराजा गंगा सिंहजी के समय में 45 विद्यार्थी इसमें शिक्षा ग्रहण करते थे । -17/19.
-उदयपुर दरबार में नियुक्त कलावंतों की व्यवस्था के लिये उत्तर मध्यकाल में गुणीजनखाने की तर्ज पर ‘संगीत प्रकाश’ नामक विभाग को कायम किया गया था, जो वाद्यों की व्यवस्था, कलावंतों की उपस्थिति, उनके वेतन तथा इनाम के अभिलेखों का संधारण करता था । 19वीं शती में संगीत प्रकाश का बजट अधिकांश रूप से 11,500 रुपये रहा है । संगीत प्रकाश के अधिकारी को‘म्हासाणी’ कहा जाता था । उसकी सहायता के लिए एक कामदार तथा दफ्तर में काम करने के लिये दो व्यक्ति थे । विभिन्न अवसरों पर शंभुनिवास, खुशमहल, छोटी चतरसाली, बड़ी चतरसाली, प्रीतमनिवास में महफिलोंके आयोजन का जिम्मा म्हासाणी का था । कलावंत, भगतणें, नटवा, नेगी, सारंगिये, पखावज वादक तथा सपरदायी संगीतप्रकाश में नियुक्त थे । नगारखाने का नियमन भी संगीतप्रकाश के अधिकारियों को ही करना होता था । नगारचियों और ढोलियों की पत्नियों को सुबी शाम महलों में गीत गाने के लिये जाना होता था ।.....कलावंतों की तरह संगीतप्रकाश में महिला संगीतज्ञों को भी नियुक्ति की जाती थी जिनका वेतन मासिक 180 रुपये तक भी बढ़ जाता था । 19वीं शती की बधु अथवा छबरूप जैसी गायिकाओं को जमीन व हवेलियां भी जागीर में दी गईं थीं । -17/21-23.

उत्तरमंद्र

-संगीत की एक मूर्छना ।    -18/383.

आरोह

-चढ़ाव, चढाई । आक्रमण । घोड़े, हाथी आदि पर चढ़ने की क्रिया, सवारी करने का भाव । जीवात्मा की ऊध्र्व गति, या
जीव का क्रमशः उत्तमोत्तम योनियों का प्राप्त करना । विकास, उम्थान । आविर्भाव, अवतार । नारी के नितंब या वक्ष । ऊपर
उठी हुई जगह, उभार । स्वरों का चढ़ाव या नीचे स्वर के पश्चात् क्रमशः ऊंचा स्वर निकालना, स्वरों का सीधा क्रम -सा रे
ग म प ध नि सा । सीढ़ी । ग्रहण के दस भेदों में से एक । सवारी करने वाला, सवार । -18/308.

उडव

-रागों की एक जाति, वह राग जिसमें पांच स्वर लगें और कोई दो स्वर न लगें ।  -18/374.  

आभीर नट

-नट और आभीर से मिलकर बनने वाला एक संकर राग । -18/299.


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