पटमंजरी

-संपूर्ण जाति की एक रागिनी ।

पखावजी

-पखावज बजाने वाला।

संगीत

-1.गायन, वादन, नृत्य । 2.समूह गान । 3.गायन-वादन की कला या शास्त्र । 4.वाद्यों के साथ कोई वर्गीकृत गायन।-33/683
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-संगीत शब्द ‘सम’ उपसर्गक ‘‘गै’’ धातु से ‘क्त’ प्रत्यय लगाने से निष्पन्न होता है जिसका अर्थ है - एक साथ गाया हुआ अथवा ‘सहगान’ । प्राचीनकाल में ‘संगीत’ शब्द का प्रयोग सामूहिक गान के लिये किया जाता था । सामवेद में जो संगीत उपलब्ध होता है वह ‘सामूहिक गान’ है जिसे यज्ञीय कर्म में भाग लेने वाले विभिन्न पात्र -जैसे ‘होता’ और ‘अध्वर्यू’ आदि, एक साथ मिलकर समवेत स्वर से गाया करते थे । इस समय भी संगीत का प्रयोग दो रूपों में किया जाता है -1. सामूहिक तथा 2. अेकल । सामूहिक गान उसे कहते हैं जिसे अनेक व्यक्ति मिलकर एक साथ गाते हैं, जैसे होली के गीत । ‘एकल’ गीत वह है जो केवल एक ही व्यक्ति के द्वारा गाया जाता है । हमारा कोई भी संस्कार तथा प्रथा ऐसी नहीं है जिस अवसर पर संगीत का प्रयोग न किया जाता हो । -31/233-4.
-ऋषियों एवं मनीषियों ने संगीत को दो भेदों का उल्लेख ग्रंथों में किया है । मार्ग संगीत एवं देशी संगीत के विषय में सभी विद्वान एकमत हैं । मार्ग संगीत देवताओं के लिये एवं देशी संगीत मानव समाजोपयोगी माना गया है । -17/81.
-नाट्य शास्त्र के 28वें और 29वें अध्याय में संगीत में प्रयुक्त बाईस श्रुतियां, नौ स्वर, दो ग्राम, चौदह मूर्च्छनाएं, चौरासी तानें, जाति गायन के अन्तर्गत अठारह जातियों के लक्षण, वर्ण, अलंकार और रसों का विशद विवेचन किया गया है । -17/89.

गायण

-1. गाने की क्रिया, गायन । 2. गीत, भजन । 3. ईश्वर का नाम, संकीर्तन । 4. गायक । 5. वेश्या ।   -32/327.

लोकनृत्य

-मनोरंजनार्थ स्त्री व पुरुष सामुहिक रूप से व एकल गीत गाते हैं । गीतों के साथ नृत्य भी होते हैं । प्रायः सभी त्यौहारों, उत्सवों आदि पर लोग मिलजुल कर नृत्य करते व गाते हैं । नृत्यों में स्त्री व पुरुष दोनों ही भाग लेते हैं । ऐसे नृत्यों में घूमर, गेर, गौरी, चंग, बालट, डांडिया ईडली, षंकरिया, भवाई, तेरहताली, कच्छीघोड़ी, गींदड़ आदि नृत्य प्रसिद्ध हैं । विभिन्नजातियां- सांसियों, कंजरों, बनजारों, मीणों, भीलों, गरासियों, कालबेलियों आदि के भी विशेष नृत्य होते हैं । भीलों का गौरी नृत्य, गरासियों का बालट नृत्य, कालबेलियों का इडांणी नृत्य प्रसिद्ध है । ये लोकनृत्य राजस्थान की अमूल्य निधि है-23/191-2.
-बादशाह शाहजहां के काल से ही मांडल, भीलवाड़ा में ‘रंग तेरस’ के दिन विचित्र सफेद सींगों वाले नाहरों के नृत्य की परंपराएं आज तक प्रचलित है । यहां के गांवों में भोपों द्वारा ‘देवनारायण और पाबूजी की पड़’ का वाचन परंपरागत शैली मेंकिया जाता है । भीलवाड़ा जिले के महेन्द्रगढ़ कस्बे के पं. देवीलाल एवं पद्मश्री दुर्गालाल के कत्थक नृत्य ने क्षेत्र का नाम रोशन किया है । शाहपुरा मांडल व जहाजपुर में ‘कच्छीघोड़ी’ नृत्य करने वाले लगभग पच्चास श्रेष्ठ कलाकार हैं । भील्याखेड़ा के भीलों का कलात्मक ‘राई’ नृत्य लोकप्रिय है । -25/151


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