आलमखांना

-वह स्थान जहां ढोली अथवा गाने वाली वेश्याएं या गायिकाएं रहती हैं । नगाारखाना । -18/310.
-जैसलमेर के राज-दरबार में गाने-बजाने का कार्य करने वाले परिवारों को ‘आलमखाना’ कहा जाता था । इसमें चार नखों के परिवार सम्मिलित थे । प्रथम ‘डगा’ नख जिनको ‘मीर’ की उपाधि थी, इनको रणयास का नगारा सौंपा गया था । ये रण में युद्ध के समय इसे बजाते थे । दूसरा गेला/गेहलड़ा नख के परिवार को ‘सिरे नगारची’ कहते थे । इनको घोड़ा प्रदान किया जाता था । इस पर बैठ कर युद्ध, शोभा यात्रा, उत्सव आदि पर नगारे बजाते थे । तीसरा ‘देधड़ा’ नख जिन्हें ‘भांड’ भी कहा जाता है । राज की ओर से इन्हें शहनाई बजाने का अधिकार था, इसलिये इन्हें ‘शहनाची/शेहनाची’ कहते थे । होली, दीवाली पर ‘भाण्ड’ लोग बहरूपियों की तरह या जोकर की तरह हंसी मजाक, एक-दूसरे की नकल कर लोगों को हंसाते थे । चैथे नख के ‘कालेट’ थे, यह ‘भेर’ बजाते थे । नवरात्रि, राज-दरबार में महारावल के आने-जाने तथा देश पर खतरा आने की सूचना एक विशाल ढोल को बजाकर दी जाती थी जिसे यहां ‘भेर’ बजना कहते थे । यही भेर रण में ‘रणभेरी’ कहलाती थी । आलमखाने के परिवार वालों को राज की ओर से विशेश सम्मान था । ये समस्त‘मांगणियार’ जाति के पंच थे । ये यहां के ‘डिगा’ प्राचीन नख के थे तथा चन्द्रवंशी यादव भाटियों के साथ यहां आये थे । इनको प्रोल बनाने, स्त्रियां को हाथों में चूड़ा पहनने, परदा रखने, पांवों में चांदी की कड़ी पहनने का अधिकार था । ये राज-गायक थे । राजा महाराजाओं को संगीत सिखाते थे । ये अपने झगड़े पंचायत के रूप में आपस में बैठकर निपटाते थे । जैसलमेर व बाड़मेर के मांगणियार अपने आपसी झगड़े मिटाने के लिये आलमखाने के पास आते थे । इनको जेल की सजा तक देने का अधिकार था । महारावल शालिवाहन के समय उस्ताद आराबा जैसलमेर में एक यशस्वी संगीतकार हुवे हैं । इनके शागिर्द जैसलमेर, जोधपुर, बीकानेर, सिंध, हैदराबाद एवं करांची में थे । ये विशेषकर मांड गायक एवं सारंगी वादक के रूप में प्रसिद्ध थे । -21/209-10.

आलम

-दुनिया, संसार । दषा, अवस्था । जनसमूह, जनता । खुदा, ईश्वर । तमाशा, नकल । ढोली । स्वामी, बादशाह ।यवन, मुसलमान । ंराजस्थान में पूजे जाने वाले एक देवता । सिर पर पगड़ी बांधने के पूर्व बांधा जाने वाला पुराना कपड़ा जिससे नई पगड़ी को मैली होने से बचाया जाता है ।      -18/310.

आयस

-लोहा । लोहे का कवच । अस्त्र-शस्त्र । मणि-रत्न । नाथों की एक सम्मानसूचक पदवी, मठाधिपति, आसनपति । -18/300.

आयस लाडूनाथजी

-संवत् 1884रा आसोज सुद 15 आयसजी महाराज श्री लाडूनाथजी महामंदिर हाथी पचीस दिया । ज्यांरी विगत- हाथी 1 भांडियावासरा आसिया बांकीदासनूं दियो, 1 मूंदियाड़रा बारट अनाड़सिंघनूं दियो, हाथी 1 कोटड़ारा वणसूर भैरानूं दियो, हाथी 1 लोलावसरा बारट गोकळदासनूं दियो, हाथी 1 मोरटउंकारा बारट चालगदांननूं दियो, हाथी 1 भदोरारा संादू गिरवरदाननै दियो, हाथी 1 कंबाळिसारा खडि़या जालानूं दियो, हाथी 1 मिहरूरा महियारिया नंदलालनूं दियो, हाथी 1 मथाणियारा बारट बगसीरामनूं दियो, हाथी 1 खुरलारा सुरताणिया वीजानूं दियो, हाथी 1 धड़ोईरा रतन केहरानूं दियो, हाथी1 खारावाररा बोगसा सुरतानूं दियो, हाथी 1 कसूंबलारा बारट सिवदासनूं दियो, हाथी 1 धबूकड़ारा गूंगा उदैरामनूं दियो, हाथी अेक भोजग मनोहरदास जोधपुररो जिणनूं दियो, हाथी 1 जोधपुररा भाटनूं दियो, हाथी 1 जोगियांरा भाटनूं दियो ।   15/172.

आभूषण

-गहना, आभूषण, जेवर -ये मुख्यतः बारह माने जाते हैं- नूपुर, किंकण, चूड़ी, अंगूठी, कंकण, विजायठ, हार, कंठश्री, बेसर, बिरिया, टीका, सीसफूल ।....डिंगल के ‘वेलिया सांणोर’ छंद का एक भेद विशेष जिसके प्रथम द्वाले में 46 लघु और 9 गुरु कुल 64 मात्राएं होती हैं । अन्य द्वालों में 46 लघु और 8 गुरु कुल 62 मात्राएं होती
हैं । -18/299.      
 -स्त्री-मनोविज्ञान के पारखी वात्सायन ने कामसूत्र में लिखा है कि बालिकाएं पुष्प, सुगंध आदि से और प्रोढ़ाएं आभूषणों से प्रसन्न होती हैं । प्रत्येक राजस्थानी स्त्री की यह धारणा रही है कि आभूषण उनके परिवार की शान और ऊंचे घराने का मापदण्ड है । इन्हीं के कारण सगे- संबंधियों में उनका मान है । इस प्रकार आभूषण राजस्थानी महिलाओं के सौंदर्य तथा स्मृद्धि के प्रतीक बन गये हैं । कई स्त्रिया ंतो कर्जा लेकर भी आभूषण बनवाती है । स्वतंत्रता के बाद तो आभूषणों का ज्यादा ही प्रचलन हो गया है । ये आभूषण न केवल सोने के बल्कि चांदी, पीतल, ताम्बे, गिलट आदि के बने होते हैं । बहुमूल्य आभूषणों में हीरे, मोती, लाल, पुखराज, माणक, पन्ने आदि रत्न जड़े होते हैं । प्रत्येक अंग-प्रत्यंग के अनुकूल आभूषणों की रचना की जाती है । पुरुष भी आभूषण धारण करते हैं । पुरुष सामान्यतः कानों में मुरकी, लांेग या कुण्डल; हाथ व पैर में कड़ा, हाथ की अंगुलियों में अंगुठी/बींटी, गले में हार, फूल-पत्ती या कण्ठी पहनते हैं । कानों में आभूषण पहनने के लिये प्रत्येक हिन्दू के कानों में बाल्यकाल से ही छेद कर दिये जाते हैं । महिलाओं के शीर्शाभूषण, कर्णाभूषण, नासिकाभूषण, कराभूषण आदि अलग-अलग होते हैं । मध्यकाल तक राजस्थान के हिन्दुओं में नासिका भूषण नहीं पहने जाते थे । मुगलकाल में ही मुसलमानों के प्रभाव के कारण नासिकाभूषण अपनाये जाने लगे ।....सामंतकाल में पैरों में सोने के गहने प्रत्येक स्त्री-पुरुष नहीं पहन सकते थे । तब वही व्यक्ति पैरों में सोना पहन सकता था जिसे रियासत से अनुमति मिली हो । तब पैरांे में सोना पहनना राजकीय सम्मान माना जाता था । -23/183-8. 
-बणजारा आभूषण: बणजारिन कौड़ी, सीप, ढुवन्नो, चवन्नी आदि से तैयार करती हैं और रांगे-कांसे जैसी साधारण धातु से बने गहने पहनती हैं । -विश्वम्भरा पृ.35-6, वर्ष-30. अंक-2, 1998.
-जोधमल भंडारीरै गळै दोवड़ो टेपो देनै गुंजवर केटी ले लीवी । उवां विजियानूं दीवी राम न्रप । 15/43.


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