आवरीमाता

-आवरीमाता, ऊंटालामाता, सुखदेव, कालका, अंबावमाता, चावंडामाता आदि 9 बहने हैं ।    -भंवरलाल पडशला, उदयपुर, 2.9.83.

आवणी

-भवाई वेश में पड़ में खड़ा रहकर दल का नायक गाता है अथवा दल का नायक वेश के आगमन हेतु गाना गाता है वह ‘आवणी’ कहलाता है संक्षेप में वेश प्रविष्टि की सूचना में गाया जाने वाला गीत ‘आवणी’ है ।  -16/6.

आलाजी/आल्हाजी

-आप जैसलमेर के कनोई गांव के निवासी थे । आपने यवनों की सेना के साथ भयंकर युद्ध किया था और अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन किया था । आप सिर कटने के बाद भी यवनों की सेना से जंूझते हुए वीरगति को प्राप्त हुए । इस क्षेत्र में गांव-गांव में इनकी बड़ी श्रद्धा से पूजा होती है । चारण लोगों ने इनकी वीरता को अमर करने के लिये कई कवित्त रचे हैं । माघ सुदि चैदस को कुछड़ी गांव में इनके नाम का मेला लगता है जहां भक्तजन श्रद्धासुमन अर्पित कर अपने आपको धन्य मानते हैं । -21/150.

आवड़माता/उब्बटादेवी

-एक देवी विशेष । आठवीं शताब्दी में काठियावाड़ के वल्लभीपुर नगर में साउवा शाखा के चारण मामड़ के घर इनका जन्म हुआ था । ये सात बहिने थीं जो सब देवियां मानी जाती हैं । इन्होंने आजीवन कौमार्यव्रत धारण किया था । तत्कालीन सिंध के राजा ऊमर ने इनकी सुंदरता पर मोहित होकर इनसे विवाह करने का हठ किया किन्तु इन्होंने अपने चमत्कार व कौशल से उसे मार कर वहां भाटी वंश के क्षत्रियों का राज्य स्थापित कर दिया । अतः ये भाटी वंश की कुल देवी मानी जाती है । इनके विषय में अनेक किवदंतियां व चमत्कार प्रसिद्ध है । -18/315.
-काठियावाड़ के वल्ला ;वल्लभीपुरद्ध नामक नगर में साउवा शाखा के चारण मादा के पुत्र ;मामड़ द्धके घर भगवती आवड़ ;उब्बटाद्ध का जन्म हुआ । ये सात बहिने थीं, उनके नाम क्रमशः 1. आवड़ ;उब्बटाद्ध, 2. इच्छा ;आछीद्ध, 3. चर्चिका ;चाचीद्ध, हुली ;होलद्ध, 5. रेपली ;रेपलद्ध, 6. गुली ;गहलीद्ध और 7. लध्वी ;लांगी या खोडियारद्ध हैं । ये सातों बहिने ही महाशक्तियां थीं । 9/52.
-अपने अलौकिक शक्ति से सिंध देस के सूमरा शाखा के परमार-क्षत्रीय ऊमर सूमरा, जो कि सूमरों का अंतिम शासक था, इस्लाम धर्म में दीक्षित हो चुका था, को मारा । इसके अतिरिक्त सतलज नदी की एक शाखा जो राजपुताने में ‘मीठा महरांण’
कहलाती थी को तीन चल्लू में पी डाला और वह मीठे पानी का समुद्र कहा जाने वाला ‘हाकड़ा’ मरूभूमि में परिवर्तित हो गया । 9/54.
-आवड़माता के विभिन्न रूपों में आशापुरा, बीजासण, तेमड़ाराय, गिरवरराय, डूगरेच्यां, डूंगरराय, नगणेची आदि प्रभुति नामों से भी पूजा होती है । 9/57.
-संऊवा शाखा के चारण मामड़ के घर शक्तियों ने अवतार लिया । ये मांड प्रदेश के चेलक गांव के निवासी थे । लौद्रवा के जसभांण परमार के समकालिक बताते हुए कहा जाता है कि जसभांण का मामड़ नित्य उठ कर मुंह देखा करता था । उसे किसी ने उलाहना दिया कि जसभांण जिसका तू नित्य उठ कर मुंह देखता है वह तो निःसंतान है ! इस उलाहने से दुःखी होकर मामड़ ने हिंगलाज देवी की पैदल यात्रा का सात बार/कहीं तीन बार, का संकल्प लिया । हिंगलाज देवी ने मांमड़जी के घर शक्ति अवतार लेने का वचन दिया और ये शर्तें रखीं- कि ‘इसको किसी के आगे उजागर न करना, अपनी पत्नी को पवित्रता से रहे, खखर वृक्ष का पालना बनाये -उसे लाल रंग से रंग कर घर के ऊपर लाल ध्वजा बांध दे, प्रति दिन उठ कर सात बार नाम का स्मरण करे ।’ वि.सं. 808 चैत्र शुक्ल.....मंगलवार को मांमड़जी और मोहवती के घर देवी भगवती/हिंगलाज ने आवड़ के रूप में अवतार लिया । इन सातों बहनों और भाई के नाम हैं - आवड़, आसी, सेमी, गेहल, होल, रूपली, लोग और मेहर ।.....आवड़ सबसे बड़ी और रूपवान थी । ‘आवड़ना’ शब्द का अर्थ मन को अच्छा लगने के अर्थ में लिया जाता है । ....यह देवी हिंगलाज की अंशावतार से हिंगलाज से आगमन, आवड़ा, आई आदि नामों से संबोधित किया जाता है । ‘आई’ के साथ ‘नाथ’ शब्द का प्रयोग शिव के नाथ संप्रदाय सरजनाथ से दीक्षा लेने तथा कानों में कुंडल धारण करने के कारण आवड़ा को आईनाथ भी कहा जाने लगा । -19/20.
‘आवड़ तूठी भाटियां, कामेही गोड़ांह,श्री वरवड़ सिसोदियां, करणी राठौड़ांह ।’ -19/2.

आल्हा

-पृथ्वीराज चैहान के समय का मोहबे का एक प्रसिद्ध वीर पुरुष ।   -18/314.


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