आंवळाइग्यारस

-फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी ।    -18/256.      

आंवळ

-गर्भाशय की वह झिल्ली जिसमें भ्रूण लिपटा रहता है ।.....वह झाड़ीनुमा पौधा जिसके फूल पीले रंग के होते हैं । इस झाड़ी की छाल चमड़े को रंगने के काम में ली जाती है ।  -18/255.

आंबिल

-स्वेछा से अवधि विशेष के लिये किया जाने वाला एक व्रत या तप जिसमें एक दिन में एक ही बार नीरस, शुष्क एवं लवण रहित  आहार किया जाता है और व्रतधारी प्रभु-स्मरण कार्य में लीन रहता है ।.....जैन धर्मावलंबी इस व्रत को स्वेच्छा से तीन, सात, नौ, ग्यारह, इक्कीस आदि दिनों की अवधि के लिये करते हैं । जितने दिन का व्रत करना होता है उस अवधि में व्रतधारी एक दिन में एक ही बार भूंजे हुए चने या उबाले हुए चावल आदि कोई एक धान का आहार करता है जो नमक, घृत, शक्कर आदि रस से विहीन होता है । व्रतधारी इस अवधि में प्रभु-स्मरण करने में तल्लीन रहता है । -18/252.          

आंबौ

-पुत्री को विवाहोपरांत ससुराल गमन के लिये विदा देते समय गाये जाने वाला एक गीत ।...आम, आम्र ।         -18/253.

आंधळघोटौ

-एक प्रकार का खेल जिसमें एक व्यक्ति कपड़े द्वारा अपनी आंखें बंद कर दूसरों को पकड़ने का प्रयत्न करता है । अन्य खिलाड़ी आवाज द्वारा अपनी उपस्थिति की सूचना देते रहते हैं । प्रायः यह खेल अक्षय तृतीया पर लड़कियों द्वारा खेला जाता है । -18/251.


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