पठमंजरी

-एक रागिनी विशेष ।

पटह

-1. दुन्दुभी, नगाड़ा । 2. बड़ा ढोल । 3. प्रथम गुरु ढगण का एक भेद ।  -33/17.

हवेली संगीत

 -संवत् 1726 में धर्मान्ध व कुटिल मुगल सम्राट औरंगजेब ने जब ब्रज के मंदिरों को गिराने और देव प्रमिताओं को तोड़ने का
आदेश प्रचारित किया, तब गोकुल और गोवर्धन के वल्लभकुल के गोस्वामी गुप्त रूप से अपने सेव्य ठाकुरों की प्रतिमाओं को,
जिन्हें ‘निधि’ कहा जाता हैै, ले कर ब्रज से राजस्थान के विविध राज्यों की ओर पलायन कर गये । इस प्रकार ब्रज के
कीर्तिगान की 170 वर्ष की परंपरा भंग हो गई । ब्रज के सांस्कृतिक क्षेत्र उजड़ गये । सुरक्षित स्थानों पर पहुंच कर आचार्यों
ने अपने निवास के लिये अपने निजी भवनों का निर्माण कराया । राजस्थान और गुजरात में बड़े भवनों को हवेली कहने की
परंपरा है । अतः यह भवन भी हवेली कहलाये । गोस्वामियों ने अपनी हवेलियों में जो निधि/मूर्ति वे अपने साथ ले गये थे
उन्हें मुगल शासन के भय से अपने निजी ठाकुर के रूप में स्थापित किया, ताकि दुष्ट मूर्तिभंजकों की दृष्टि उन पर नहीं पड़
सके । मूर्ति को जिसे श्री वल्लभाचार्य के सम्प्रदाय में निधि कहा जाता है उसे हवेली के एक कोठे में विराजमान कर दिया ।
इस निजी कोठे को तालाबंद किया जाता है । आचार्यगण प्रायः भवन के ऊपरी भाग में रहते हैं । इन हवेलियों में अथवा
कोठियों में जहां निधि विराजमान रहती है वहां कोई शिखर अथवा स्तम्भ आदि मंदिरसूचक चिन्ह भी नहीं बनवाये । इन
हवेलियों में प्रभु प्रतिमा की सेवा अर्चना पुष्टिमार्ग की पद्धति से प्रारंभ की गई । उसी प्रकार से भोग, राग की व्यवस्था और
आठ झांकियां आज भी होती हैं ।......इन देव मंदिरों में होने वाले कीर्तन को, जो केवल गुजरात के लोगों द्वारा हवेली संगीत
के नाम से पुकारा जाता था और जिसको श्री वल्लभ सम्प्रदाय के ग्रंथों में कीर्तन कहा गया है उसके परम्परागत कीर्तन शब्द
को छोड़कर आकाशवाणी ने देश भर में उसे हवेली संगीत कह कर प्रचारित कर दिया । दुःखद घटना यह है कि इस शब्द
का जोर शोर से प्रचार देश के स्वतंत्र होने के बाद आकाशवाणी ने किया, जिसका विरोध होना आवश्यक है । -17/37.
-वल्लभ संप्रदाय में पुष्टिमार्गीय मंदिरों में नाथजी के सामने सेवा-श्रृंगार एवं भोग के समय कीर्तन की परंपरा रही है । श्री वल्लभाचार्य के पुत्र गोस्वामी विट्ठलनाथजी ने ब्रजभाषा के उत्कृष्ट आठ कवियों का चयन कर ‘अष्टछाप’ की स्थापना की ।
इनमें सूरदास, कुम्भनदास, कृष्णदास एवं परमानन्ददास श्रीमद् वल्लभाचार्यजी के शिष्य थे और क्षीर स्वामी, गोविन्द स्वामी,
चतुर्भुजदास तथा नन्ददास विट्ठलदासजी के शिष्य थे । ये सभी कवि अद्वितीय संगीतकार भी थे । वल्लभ संप्रदाय का यह
कीर्तन-संगीत प्रबंध-गायन का अप्रतिम उदाहरण है । इसे धु्रपद, धमार, ख्याल, ठुमरी और ठप्पा शैलियों के साथ-साथ
प्राचीन शास्त्रों में वर्णित पंच-गीतियों के संक्रमण की कड़ी कहा जा सकता है ।...वल्लभ संप्रदाय के कीर्तन में राग-समय का
पालन तो किया ही जाता है इसके अलावा ऋतुओं के अनुसार रागों का चयन करने की परंपरा भी देखी जा सकती है ।
मल्हार केवल वर्षा ऋतु में, काफी व बसन्त केवल फाल्गुन मास में, ललित, जौनपुरी, नायकी आदि शिशिर और हेमन्त ऋतु
में, अड़ाना, सारंग तथा उसी प्रकार, हमीर व केदार ग्रीष्म ऋतु में गाने की परंपरा रही है ।...कीर्तन की संगत तानपुरा, मृदंग,
वीणा या सारंगी, झांझ आदि वाद्यों से प्रमुखतः की जाती है । उत्सव व आनन्द के पर्वों पर झांझ की संगत आवश्यक समझी
जाती है, जबकि बसन्त-पंचमी से ढोल (होली के दूसरे दिन तक) डफ वादन आवश्यक माना जाता है ।...बनारस के
वाजपेयीजी जैसे वीणाकार, पागलदासजी, घनश्यामजी, पुरुषोत्तमजी, मक्खनजी जैसे मृदंगाचार्य तथा श्री चन्दनजी चैबे जैसे
गायक वल्लभ संप्रदाय की देन है । मिंया तानसेन, धोंधी कलावन्त, नायक रामदास, हरिदास डागुर आदि ‘वाग्येकार’ इसी
संप्रदाय में दीक्षित थे ।...बीकानेर राजघराने में ठाकुरजी की सेवा-परंपरा महाराजा सरदारसिंहजी के काल में विशेष रही ।
सरदारसिंहजी की रानी नरूकाजी ने जो अलवर महाराजा की पुत्री थी, अपने जनानखाने में एक रास-मंडली स्थापित कर
रखी थी । आप स्वयं गाती थी और सारंगी भी बजाती थी । प्रमुख सितार वादक श्री जस करण गोस्वामी की दादीजी
श्रीमती बदनीबाई इस मण्डली में श्री कृष्ण बनती थीं । ठाकुर जसवंतसिंहजी खीची की मां हारमोनियम बजा कर समस्त
रास का संचालन करती थी । -विश्वम्भरा पृ. 24-27, वर्ष-18, अंक-3-4, 1986.

पटवाद्य

-झांझ से मिलता-जुलता एक वाद्य ।

श्रुति

 -श्रुतियों का वास स्वर माना गया है । साधारणतया श्रुति का अर्थ है जो सुना जा सके । परन्तु श्रुति अभिव्यक्ति का माध्यम मानी गई है । कुल श्रुतियों की संख्या 22 मानी गई हैं और गुणों के अनुसार उनके नाम हैं -1. तीव्रा, 2. कुमुद्वती, 3. मंदा, छंदोवती, 5. दयावती, 6. रंजनी, 7. रक्तिका, 8. रौद्री, 9. क्रोधा, 10. वज्रिका, 11. प्रसारिणी, 12. प्रीति, 13 मार्जनी, 14. क्षिति, 15. संदीपनी, 16. रक्ता, 17. आलापिनी, 18. मदंती, 19. रोहिणी, 20. रम्या, 21. उग्रा, 22. क्षोभिणी । ...
जाति गायन में ये श्रुतियों रस निष्पत्ति का साधन थीं । इन बाईस श्रुतियां की पांच जातियां थीं- 1. दीप्ता, 2. आयता, 3. मध्या, 4. मृदु और 5. करुणा । -17/92.


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