दुरगादास राठौड़

 -वीर दुरगादास राठौड का जन्म मारवाड़ में करनोत ठाकुर आसकरण जी के घर सं. 1695 श्रावन शुक्ला चतुर्दसी को हुआ था। आसकरण जी मारवाड़ राज्य की सेना में जोधपुर नरेश महाराजा जसवंत सिंह जी की सेवा में थे । अपने पिता की भांति बालक दरुगादास में भी वीरता कूट कूट कर भरी थी, । बताते हैं कि एक बार जोधपुर राज्य की सेना के ऊंटों को चराते हुए राईके (ऊंटों के चरवाहे) आसकरण जी के खेतों में घुस गए । बालक दुरगादास के विरोध करने पर भी उन चरवाहों ने कोई ध्यान नहीं दिया तो वीर युवा दुरगादास का खून खोल उठा और तलवार निकाल कर झट से ऊंट की गर्दन उड़ा दी । इसकी खबर जब महाराज जसवंत सिंह जी के पास पहुंची तो वे उस वीर बालक को देखने के लिए उतावले हो उठे । उन्होंने अपने सैनिकों को दुर्गादास को लाने का हुक्म दिया । अपने दरबार में महाराजा द्वारा उस वीर बालक की निडरता व निर्भीकता देख अचंभित रह गए । आसकरणजी ने अपने पुत्र को इतना बड़ा अपराध निर्भीकता से स्वीकारते देखा तो वे सकपका गए। परिचय पूछने पर महाराजा को मालूम हुवा की यह आस्करण जी का ही पुत्र है तो महाराजा ने दरुगादास को अपने पास बुला कर पीठ थपथपाई और इनाम में तलवार भेंट कर अपनी सेना में भर्ती कर लिया । उस समय महाराजा जसवंत सिंह जी दिल्ली के मुगल बादशाह औरंगजेब की सेना में प्रधान सेनापति थे । औरंगजेब की नियत जोधपुर राज्य के लिए अच्छी नहीं थी और वह हमेशा जोधपुर हड़पने के लिए मौके की तलाश में रहता था । सं. 1731 में गुजरात में मुगल सल्तनत के खिलाफ विद्रोह को दबाने हेतु जसवंत सिंह जी को वहां भेजा गया । इस विद्रोह को दबाने के बाद महाराजा जसवंत सिंह जी काबुल में पठानों के विद्रोह को दबाने हेतु चल दिए और वे दुरगादास की सहायता से पठानों का विद्रोह शांत करने के साथ ही वीरगति को प्राप्त हो गए । 28 नवम्बर 1678 को अफगानिस्तान के जमरूद नामक सैनिक ठिकाने पर जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह का निधन हो गया । उनके निधन के समय उनके साथ रह रही दो रानियाँ गर्भवती थीं इसलिए वीर शिरोमणि दरुगादास सहित जोधपुर राज्य के अन्य सरदारों ने इन रानियों को महाराजा के पार्थिव शरीर के साथ सती होने से रोक लिया और इन गर्भवती रानियों को सैनिक चौकी से लाहौर ले आया गया, जहाँ इन दोनों रानियों ने 19 फरवरी 1679 को एक- एक पुत्र को जन्म दिया । उनमें बड़े राजकुमार का नाम अजीतसिंह व छोटे का दलथंभन रखा गया । एक पुत्र दलथंभन की रास्ते में ही मौत हो गयी और दूसरे पुत्र अजीत सिंह को रास्ते का कांटा समझ कर औरंग्जेब ने उसकी हत्या की ठान ली । औरंगजेब की इस कुनियत को स्वामी भक्त दुरगादास ने भांप लिया और मुकंद दास की सहायता से स्वांग रचाकर वे अजीत सिंह को दिल्ली से निकाल लाये । जब औरंगजेब अजीतसिंह को अपने संरक्षण में दिल्ली दरबार ले गया था उस वक्त वीर दुरगादास राठौड़ ने चार सो चुने हुए राजपूत वीरों को लेकर दिल्ली आये और युद्ध में मुगलो को चकमा देकर महाराजा को मारवाड़ ले आये । उसी समय बलुन्दा के मोहकमसिंह मेड़तिया की रानी बाघेली भी अपनी नवजात शिशु राजकुमारी के साथ दिल्ली में मौजूद थी । वह एक छोटे सैनिक दल से हरिद्वार की यात्रा से आते समय दिल्ली में ठहरी हुई थीं । उसने राजकुमार अजीतसिंह को बचाने के लिए राजकुमार को अपनी राजकुमारी से बदल लिया और राजकुमार को राजकुमारी के कपड़ों में छिपाकर खीची मुकंददास व कुंवर हरीसिंह के साथ दिल्ली से निकालकर बलुन्दा ले आई । यह कार्य इतने गोपनीय तरीके से किया गया कि रानी , दुरगादास, ठाकुर मोहकम सिंह, खीची मुकंददास, कु. हरिसिह के अलावा किसी को भी कानों कान भनक तक नहीं लगी । यही नहीं रानी ने अपनी दासियों तक को इसकी भनक नहीं लगने दी कि राजकुमारी के वेशभूषा में जोधपुर के राजकुमार अजीतसिंह का लालन पालन हो रहा है । छह माह तक रानी राजकुमार को खुद ही अपना दूध पिलाती, नहलाती व कपडे पहनाती थी ताकि किसी को पता न चले । पर एक दिन राजकुमार को कपड़े पहनाते, एक दासी ने देख लिया और उसने यह बात दूसरी रानियों को भी बता दी । अतः अब बलुन्दा का किला राजकुमार की सुरक्षा के लिए उचित न जानकार रानी बाघेली ने अपने मायके जाने का बहाना कर खीची मुक्न्ददास व कु. हरिसिंह की सहायता से राजकुमार को लेकर सिरोही के कालिंद्री गाँव में, अपने एक परिचित व निष्ठावान जयदेव नामक पुष्करणा ब्रह्मण के घर ले आई । वहीं उसने राजकुमार को लालन-पालन के लिए उसे सौंपा, जहाँ उस (जयदेव) की पत्नी ने अपना दूध पिलाकर जोधपुर के उतराधिकारी राजकुमार को बड़ा किया । अजीत सिंह के बड़े होने के बाद गद्दी पर बैठाने तक वीर दुरगादास को जोधपुर राज्य की एकता व स्वतंत्रता के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ीं । औरंगजेब का बल व लालच भी दुरगादास को नहीं डिगा सका । जोधपुर की आजादी के लिए दुरगादास ने कोई पच्चीस सालों तक संघर्ष किया, लेकिन जीवन के अन्तिम दिनों में दुरगादास को मारवाड़ छोड़ना पड़ा ! महाराज अजीत सिंह के कुछ लोगों ने दरुगादास के खिलाफ कान भर दिए थे जिससे महाराज दुरगादास से अनमने रहने लगे। वस्तुस्तिथि को भांप कर दुरगादास ने तब मारवाड़ राज्य छोड़ना ही उचित समझा और वे मारवाड़ छोड़ कर उज्जैन चले गए । वहीं शिप्रा नदी के किनारे उन्होने अपने जीवन के अन्तिम दिन गुजारे और वहीं उनका निधन 22 नवम्बर, सन् 1718 को हुवा । इनका अन्तिम संस्कार शिप्रा नदी के तट पर किया गया था । इसी वीर दुर्गादास राठौड़ के बारे में रामा जाट ने कहा था कि-
                     “धम्मक धम्मक ढोल बाजे दे दे ठोर नगारां की,,
                      जो आसे के घर दुर्गा नहीं होतो,सुन्नत हो जाती सारां की’ ।’
आज भी मारवाड़ के गाँवों में लोग वीर दुर्गादास को याद करते है कि
                     -मायड़ ऐड़ा पूत जण जेड़ा दुरगादास,
                      भार मुंडासा थामियौ, बिन थंभ आकास ।”
                    -घर घोड़ौ, खग कामनी, हियो हाथ निज मीत
                     सेलां बाटी सेकणी, श्याम धरम रण नीत ।
हिंदुत्व की रक्षा के लिए उनका स्वयं का कथन “रुक बल एण हिन्दू धर्म राखियों” .....अर्थात्, हिन्दू धर्म की रक्षा मैंने भाले की नोक से की ।’’ इनके बारे में कहा जाता है कि इन्होंने सारी उम्र घोड़े की पीठ पर बैठकर ही बिता दी। अपनी कूटनीति से इन्होंने औरंगजेब के पुत्र अकबर को अपनी ओर मिलाकर, राजपूताने और महाराष्ट्र की सभी हिन्दू शक्तियों को जोडकर औरंगजेब की रातां की नींद छीन ली थी और हिंदुत्व की रक्षा की थी । उनके बारे में इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने कहा था कि..“उनको न मुगलों का धन विचलित कर सका और न ही मुगलों की शक्ति उनके दृढ निश्चय को पीछे हटा सकी, बल्कि वो ऐसा वीर था जिसमे राजपूती साहस और कूटनीति मिश्रित थी”. । ये निर्विवाद सत्य है कि अगर उस दौर में वीर दुरगादास राठौड़, छत्रपति शिवाजी, वीर गोकुल, गुरु गोविन्द सिंह, बंदा सिंह बहादुर जैसे शूरवीर पैदा नहीं होते तो पूरे मध्य एशिया, ईरान की तरह भारत का पूर्ण इस्लामीकरण हो जाता और हिन्दू धर्म का नामोनिशान ही मिट जाता ।....... वीर दुरगादास राठौड़ के नाम के सिक्के और पोस्ट स्टाम्प भारत सरकार द्वारा जारी किये गये । -साभार, दुर्गादास राठौड़ जयंति समारोह समिति, जोधपुर से]

दुरसा आढ़ा

 -राजस्थानी साहित्य में दुरसा आढ़ा का नाम सर्वाधिक प्रसिद्ध कवियों में अग्रणी है ।.. दुरसा आढ़ा राजस्थान के चारण कवियों में इतनी सिद्धि, प्रसिद्धि और समृद्धि प्रप्त कर गये कि उनके कारण चारण जाति में ‘आढ़ा’ गोत्र विशेष सम्मान का अधिकारी बन गया । अपनी सपूती और सुयशमयी मर्यादा के कारण चारणों में ‘आढ़ा’ और राजपूतों में ‘चांपावत’ श्रेष्ठता केप्रतीक माने जाते हैं और इन दोनों जातियों के वे यशस्वी पूर्व पुरुष दुरसा आढ़ा और गोपालदास चांपावत (सं. 1590-1663 वि) समकालीन एवं घनिष्ठ मित्र थे ।...दुरसा आढ़ा अत्यंत प्रसिद्ध एवं प्रभावशाली व्यक्ति होने के साथ ही दीर्घजीवी रहे, अतः उनकी जीवनी और रचनाओं के नाम पर अनेक किंवदंतियां और क्षेपक जुड़ते गये ।...डॉ. मोतीलाल मेनारिया ने दुरसा आढ़ा का जन्म संवत् 1592 में और देहांत संवत् 1712 में माना है । इस दृष्टि से उनकी आयु 120 वर्ष हो जाती है । इनके जन्म स्थान के विषय में भी विभिन्न मत हैं ।... इतना ही नहीं, इनकी जाति आढ़ा क्यों पड़ी, इस पर भी कल्पना के सहारे मत प्रकट किये गये ।.. संवत् 1733 में लिखित ‘आढ़ों की वंशावली’ एक हस्तलिखित प्रति के अनुसार आढ़ा शाखा के आदि पुरुष ‘अढ़’ से लेकर दुरसा के प्रपौत्रों तक के नाम उल्लिखित है । उस वंशावली के अनुसार दुरसा के दादा अमरा के पिता और पितामह का नाम क्रमशः चोभोजी और सालजी था । वह वंशावली इस प्रकार है : अढ़ - आसराव - गोकल - गुणजी - सांसारजी - नींबोजी - तेजोजी - चोगनोजी - मंडणजी - जांगड़जी - कवरोजी - सालाजी - चोभेजी - अमरोजी - मेहोजी - दुरसोजी - किसनोजी - महेसदासजी - 1. दोईदेवजी, 2. राहिबजी और 3. खुमांणजी । ...दुरसाजी की वृद्धावस्था हो जाने से ही उनके पुत्र किसनाजी ने अनेक जगहों से जागीरें एवं भेंट प्राप्त की थीं । संवत् 1677 में ‘पांचेटिया’ किसना आढ़ा को मिला । ...किसना आढ़ा उनके सबसे छोटे और प्रियपुत्र थे, जिनका स्वर्गवास सं. 1704 वि. मिगसर वदी 14 को गांव पांचेटिया में हो गया था ।...दुरसा आढ़ा के डिंगल गीतों के आधार पर चंद्रसेन का गीत (सं.1631), हल्दीघाटी का वर्णन (सं. 1633), दतांणी के युद्ध में दुरसा का लड़ना व घायल होना (सं.1640), चारणों का आउवा में धरना और गोपालदास चांपावत के उपकार संबंधी गीत (सं.1643), महाराणा प्रताप का मरसिया (सं.1653), कल्ला रायमलोत सिवाणा का गीत (सं.1645 में काम आया), राणा अमरसिंह (सं.1653-1673) ने दुरसाजी को गांव रायपुरिया प्रदान किया था । राव सुरतांण, सिरोही के मरसिये (सं. 1667 में मृत्यु), राजा मानसिंह की विरता के झूलणे (सं. 1646-1671), अज्जजी की भूचर मोरी का युद्ध (सं0 1648), बल्लूजी चांपावत की विरता के गीत (सं. 1676 में हरसोळाव का पट्टा पाया था), महाराजा रायसिंह बीकानेर द्वारा नागौर इनायत करने का गीत (सं.1657), वीरमदेव सोलंकी, देसूरी की कवरता का काव्य (सं. 1656 में काम आया), विजा देवड़ा की प्रशंसा का गीत (सं. 1644 में सिरोही प्रदान की बादशाह ने) । दुरसाजी ने लंबी उम्र अवश्य पाई थी और उनके बुढ़ापे में रची गई काव्यकृतियों में‘किरतार बावनी, छंद चाळकनेच माताजी रौ, परमेसरजी री नांममाळा और भगवान रामचंद्रजी के डिंगल गीत विशेष उल्लेखनीय हैं । -विश्वम्भरा पृ. 54-62, वर्ष-19, अंक-1-2, 1987.
-वास, आबूरोड़ में ऐसा मानना है कि ‘‘युद्ध की समाप्ति पर युद्धभूमि का जब राव सुरताण ने निरीक्षण किया तब उसने राव रायसिंह के पास अकबर के दरबारी कवि दुरसा आढ़ा घायलावस्था में मिले । सुरताण के एक सरदार ने दुरसा आढ़ा को मारने की आज्ञा मांगी । तब सुरताण ने कहा कि वह चारण है, राजपूत नहीं । इस कारण अनुमति से इंकार कर पलटकर राव दुरसा आढ़ा के मुखातिब हुआ और कहा - तुम चारण हो तो युद्ध में वीरगति पाए देवड़ा समरा का यशगान करो । देवड़ा समरा नरसिंहोत सुरताण का सहयोगी था तथा इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ था । इस पर दुरसा आढ़ा ने तुरंत एक दोहा सुनाया जिसके अनुसार समरा चौहान ने लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त किया । यह सुनते ही सुरताण बहुत प्रसन्न हुए तथा स्वयं उन्होंने दुरसा आढ़ा को पालकी में बिठाया और घर ले जाकर चिकित्सा करवायी । ठीक होने पर उन्हें अपना पोलपात चाकर नियुक्त किया एवं पेशवा गांव जागीर में दिया । -राज. पत्रिका, जोधपुर, 17.2.1990.
-भारमल, सादूळ, जगमाल, किसनो, कमो -पांच बेटा आढ़ा दुरसारे हुवा । ...भारमलरा गांव पेसुवै, जगमालरा गाव झारवां, सादूलरा गांव लुगीमें, किसनारा गांव पाचटियै, रायपुरियै । -15/180.
-भारमल दुरसावतरै च्यार बेटा हुवा - रूपजी, भीमजी, नंदोजी, चंदोजी । वडी डोडी रूपजीरी चाळक नै चरोमढ़ रूपजीरो डोढ़ीमें ।....वरायळ, हींगोळो, लासोळ, पांचेटियो -च्यार गांव किसनै दुरसावत पाया । किसनारै बेटा दोय -महेसदास, मेघराज । बरायळ, हींगोळो मेघराजरै रह्या, पांचेटियै । -15/180
-दुरसाजी आढा का जन्म वि स 1592 को माघ सुदी चवदस को मारवाड राज्य के सोजत परगने के पास धुन्दला गांव में हुआ। इनके पिताजी मेहाजी आढा हिंगलाज माता के अनन्य भक्त थे जिन्होने पाकिस्तान के शक्तिपीठ हिंगलाज की तीन बार यात्रा की। मां हिंगलाज के आशीर्वाद से उनके घर दुरसाजी आढा जैसे कवि का जन्म हुआ। गौतमजी व अढ्ढजी के कुल में जन्म लेने वाले दुरसाजी आढा की माता धनी बाई बोगसा गोत्र की थी जो वीर व साहसी गोविन्द बोगसा की बहिन थी। भक्त पिता मेहाजी आढा, जब दुरसाजी छ वर्ष के थे, तब वे फिर से हिंगलाज यात्रा पर चले गये। इस बार इन्होने सन्यास धारण कर लिया। कुल मिलाकर दुरसाजी आढा का बचपन संघर्ष व अभाव ग्रस्त रहा। बगडी के ठाकुर प्रताप सिह ने इनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर अपनी सेवा में रखा, यही पर इनकी प्रारम्भिक शिक्षा हुई । इनको अपने दीर्घ जीवनकाल में अपरिमित धन ,यश एवं सम्मान मिला-
-एक वीर योद्धा के रूप में मूल्यांकन : दुरसाजी आढा इतिहास प्रसिद्ध दत्ताणी युद्ध के एक प्रमुख सेनानायक थे। यह युद्ध वि स 1640 (ई संऽ 1573 को कार्तिक सुदि 11 के दिन सिरोही के महाराव सूरताण व दूसरी तरफ मारवाड के रायसिंह चन्द्रसेनोत,मेवाड़ के जगमाल सिसोदिया,दांतीवाडा के कोलीसिह की सम्मिलित सेना के बीच में हुआ।इस युद्ध में दुरसाजी आढा ने मारवाड की सेना के प्रमुख सेनानायक के रूप में भाग लिया। इस युद्ध में दुरसाजी आढा इस शाही सेना के साथ आये थे जिसमें इनकी सेना के रायसिंह चन्द्रसेनोत,जगमाल सिसोदिया,कोलीसिह अपने बहुत से सैनिकों के साथ काम आये। इस युद्ध में राव सूरताण की सेना के सेनानायक समरा देवडा व दुदाजी आशिया के रण कौशल के आगे मारवाड की सेना नहीं टिक सकीं। लेकिन दुरसाजी आढा वीरतापूर्वक लडते हुए घायल हुए। इस प्रकार सूरताण के शौर्य,पराक्रम व कुशल नेतृत्व की जीत हुई। दुरसाजी आढा मारवाड की सेना की तरफ से लडते हुए घायल हुए लेकिन अपने काव्य बल के सहारे राव सूरताण का हृदय जीतने में सफल हुए। हुआ इस तरह कि सूरताण की सेना ने विपक्षी घायल सेनिकों को दुध पीलाकर मारना (हारी सेना के घायल सैनिकों को विषैला दूध देकर मारा जाता था ) शुरू किया तो दुरसाजी आढा ने स्वयं का चारण होने का कहने पर उन्हें विषैला दूध नहीं दिया गया बल्कि उनके द्वारा चारण के प्रमाण स्वरुप कहे दोहे से विपक्षी सेना के शासक राव सूरताण बहुत प्रसन्न हो गये और उनके घावों पर मरहम लगवाकर इन्हें ठीक करवाना उचित समझा। दुरसाजी आढा का घायलावस्था में कहा गया दोहा इस प्रकार था-
               धर रावां जश डूंगरां, ब्रद पोतां सत्र हाण।
               समरे मरण सुधारियो, चहु थोकां चहुयआण।।
इस दोहे को सुनकर राव सूरताण दुरसाजी आढा पर अत्यंत प्रसन्न हुआ और उनका समुचित इलाज करवाया व दुरसाजी आढा को पेशुआ, शेरूवा, पेरूआ, साल, वराल नामक पांच गांव सांसण में देकर दुरसाजी आढा को सिरोही का पोलपात बनाया।
-प्राप्त सांसण में जागीरे : धुंदला,नातल कुडी,पांचेटिया, जसवन्तपुरा,गोदावास (मारवाड रा परगना री विगत भाग 1 पृष्ठ संख्या 484 वि स 1702 में महाराजा जसवन्तसिंह द्वारा पौत्र महेश दास को), हिंगोला खूर्द ( किसना दुरसावत ने मारवाड रा परगना री विगत भाग 1 पृष्ठ संख्या 262, लुंगिया, पेशुआ, झांखर, साल, ऊंड (यह गांव इनके पौत्र महेश दास को मिला), दागला, वराल, शेरूवा, पेरूआ, रायपुरिया, डूठारिया, कांगडी, तासोल, सिसोदा । इनके अलावा बीकानेर के राजा रायसिंह ने इनको चार गांव सांसण में दिये थे जिनकी पुष्टि दयालदास की ख्यात भाग 2 के पृष्ठ संख्या 118 से होती है। उक्त में से करीब 11 सांसणों के ताम्र पत्र अभी भी उनके वंशजों के पास ऐतिहासिक धरोहर के रूप में पडे है जो की इतिहास की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है । अभी उनके कई ताम्र पत्र प्रकाश में आने बाकी है ।
-दुरसाजी आढा को इनाम के रूप में प्राप्त नकद धन राशि :
                          1 करोड पसाव रायसिंह जी बीकानेर ने
                          1 करोड पसाव राव सूरताण सिरोही ने
                          1 करोड पसाव मानसिह आमेर ने
                          1 करोड पसाव महाराणा अमरसिंह मेवाड ने
                          1 करोड पसाव महाराजा गजसिंह मारवाड ने
                          1 करोड पसाव जाम सत्ता ने
                          3 करोड पसाव अकबर बादशाह ने दिये जिन्हे जनकल्याण में खर्च किये अर्थात् तालाबो, कुओ, बावडियों इत्यादि के निर्माण में व्यय किया।
                          -लाख पसाव के पुरस्कार -दुरसाजी को कई लाख पसाव मिले जिन्हे सिरोही महाराव राजसिंह, अखेराजजी, मुगल सेनापति मोहबत खान व बैराम खान से                                                प्राप्त हुए ।
-एक समाज सेवक के रूप में मूल्यांकन : दुरसाजी आढा ने अपने जीवन काल में धर्मराज पुष्कर में अपने समाज का एक महासम्मेल बुलवाया । जिसमें तत्कालीन मुगलकालीन व्यवस्था को देखते हुए चारण समाज की महिलाओं के पर्दा रखने की अनिवार्यता पर बल दिया। इसके पीछे उनका मूल कारण मुगल शासकों की कुदृष्टि से अपने समाज की महिलाओं की सुरक्षा की भावना निहित थी। दुरसाजी आढा ने पुष्कर के चारण सम्मेलन में 14 लाख रूपये खर्च करके समाज हित का कार्य किया। जिसके प्रमाण के रूप में यह सोरठा प्रसिद्ध हैं -
              विरच्यो प्रबंध वरणरो, सूरज शशिचर साख।
              तठै खस्व दुरसा तणा, लागा चवदा लाख।।
-आउवा धरणा के अग्रज आढा : दुरसाजी आढा में अन्याय के खिलाफ लडने की भावना कूट कूट कर भरी हुई। इस घटना का उल्लेख मुंहता नैणसी री लिखी मारवाड रा परगनां री विगत भाग 1 के पृष्ठ संख्या 78-79 पर हुआ है । “आढा दुरसौ नै दुणलौ राऽआसकरण देवीदासोत रौ दीयौ थौ। पछै दुरसौ बाहारट अखा कन्है गयौ।पछै अखौ भलौ हुऔ।मोटौ राजा गुजरात नुं चालतौ हुतौ।आय सोजत डेरौ थौ।ऊठै काजेसर माहादेव चारणां तागो कीयौ।बारहठ अखौ भांण रौ घणा चारणां सुं मुवौ।घणा जणां गलै घाती ।दुरसै गलै घाती थी,सु ऊबरियौ। संवत 1643 रा चौत माहे इतरा गांव लोपाणा परगनै जोधपुर रा ।’’ दुरसाजी आढा के नेतृत्व में आउवा का धरणा वि स 1643 के चौत्र मास के शुक्ल पक्ष को कामेश्वर महादेव के मंदिर में हुआ।इनके धरणे में इनके मुख्य सहयोगी अक्खाजी बारहठ आदि समकालीन चारण थे सबसे ज्यादा चवालीस खिडिया गोत्र के चारणों के साथ कुल 185 व्यक्तियों ने शहादत दी । दुरसाजी आढा ने गले में कटारी खाई। तागा करने के बाद भी देवी कृपा से वे बच गये। उन्होने मोटा राजा उदयसिंह को दिल्ली के दरबार में सरेआम लज्जित किया । गले में कटारी का घाव खाने से दुरसाजी के गले की आवाज विकलांग हो गई। इस पर अकबर ने पूछा कि आपकी आवाज कैसे बिगड गई ! तब उन्होने कहा कि कुत्ते ने काट लिया था इतना बडा कुत्ता कैसे हो सकता है ? तो उन्होने मोटा राजा की तरफ संकेत किया।
-दुरसाजी आढा के ऐतिहासिक व जनोपयोगी निर्माण कार्य :
             -पेशुआ : दुरसालाव पेशुआ, बालेश्वरी माता मंदिर, कनको दे सती स्मारक, पेशुआ का शासन थडा ।
             -झांखर : फुटेला तालाब, झांकर का शासन थडा ।
             -रायपुरिया : बावडी का निर्माण जो मेवाड रियासत का सांसण गांव था जहां से इनके लिए पांचेटिया (मारवाड )  में पानी पहुंचता था क्योकि आउवा धरणे के बाद                                    उन्होने मारवाड के पानी का त्याग कर दिया था ।
             -पांचेटिया : किसनालाव, शिव मंदिर, दुरसश्याम मंदिर, कालिया महल, धोलिया महल ।
              -हिगोंला खुर्द : हिगोंला के महल, हिगोंला का तालाब ।
-अतिविशिष्ट सम्मान : 1. अचलेश्वर शिव मंदिर आबू पर्वत - आबू पर्वत के अचलेश्वर जी के शिव मंदिर में जहां शिवजी के अंगूठे की पूजा की जाती है वहां मंदिर में शिव जी के               सामने नंदी के पास दुरसाजी आढा की पीतल की मूर्ति लगी हुई है जिस पर लगे लेख के अनुसार इनकी जीवित अवस्था में इस मूर्ति की स्थापना हुई। ऐसा सम्मान                 किसी कवि को नही मिला। इस मूर्ति पर वि स 1686 (आषाढादि) (ई स 1630 वैशाख सुदि 5 का लेख है । आषाढादि गुजरात की गणना के अनुसार (राजपूताना के                   हिसाब से श्रावण) से प्रारंभ होने वाला वर्ष या संवत् । इस पीतल की मूर्ति के लेख पर शक संवत् 1552 लिखा है जिससे स्पष्ट है कि यह मूर्ति चौत्रादि वि स 1687                     (आषाढादि 1686 में बनी थी
           2. पद्मनाथ मंदिर सिरोही- पैलेस के सामने इस मंदिर के बाहर हाथी पर सवार इनकी मूर्ति भी बडी महत्वपूर्ण है जो विष्णु मंदिर के बाहर लगी हुई है । जो सदियो से                    उनके अतुल्य सम्मान का प्रतीक है जो दत्ताणी के युद्ध के बाद दुरसाजी आढा के सम्मान में स्थापित की गई थी ।
दुरसाजी आढा का देवलोक गमन वि स 1712 (सन् 1655 ईऽ को होना माना जाता है। इस प्रकार 120 वर्ष की दीर्घायु उन्होने पाई।
-एक साहित्यकार के रूप में मूल्यांकन : इस दीर्घायु में उन्होने अतुलनीय साहित्य का सर्जन करके महाराणा प्रताप,सिरोही के राव सूरताण व मारवाड के राव चन्द्रसेन व नागोर के अमरसिंह राठौड पर काव्य रचना करके इन्हे इतिहास व साहित्य में अमर कर दिया उन्होने महाराणा प्रताप की प्रंशसा में बिरद छिहत्तरी की रचना की जो डिंगल की सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना है। उनका कहा छप्पय जो इस प्रकार है जो उन्होने ने अकबर के सम्मुख कह सुनाया था-
               अस लेगो अणदाग, पाघ लेगो अणनामी।
               गो आडा गवडाय,जिको बहतो धुरबांमी।।
               नवरोजे नह गयो, न गौ आतसा नवल्ली।
               न गौ झरोखां हेठ, जेथ दुनियांण दहल्ली।।
               गहलोत राणा जीती गयो, दसण मूंद रसणा डसी।
               नीसास मूक झरिया नयण, तो म्रत साह प्रतापसी।।
राष्ट्र कवि दुरसाजी आढा कृत छप्पय जो अकबर के दरबार मे उसके सम्मुख महाराणा प्रताप की मृत्यु पर कहा था इतिहास के समस्त ग्रंथो मे इसका उल्लेख हुआ है। कवि दुरसाजी आढा के साहस व स्पष्ट वक्ता का विश्व में यह सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है जो उनके लिए यह कहलाने के लिए हमें कहता है कि भूतो न भविष्यति।
दुरसाजी आढा की भविष्यवाणी बिरद छिहतरी का सोरठा संख्या 65 से-
                  अकबर जासी आप, दिल्ली पासी दूसरा।
                  पुन-रासी परताप,सुजस न जासी सूरमा।
भावार्थ -काल की गति बडी विचित्र है सभी को एक दिन संसार सागर छोडकर जाना है। उसी नियति नियमानुसार अकबर को भी एक दिन काल का ग्रास बनना है और दिल्ली पर दूसरो का अधिकार हो जायेगा। परन्तु हे पुण्यराशि शूरवीर प्रताप ! तुम्हारी शूरवीरता का यश संसार से काल भी नही मिटा सकेगा। बिरद छिहतरी दुरसाजी आढा की सर्वाधिक प्रसिद्ध रचनाओं में से एक हैं । इसके अलावा दुरसाजी आढा की किरतार बावनी एक अद्भुत व अनोखी रचना है जिसमें उन्होंने 52 तरह के काम करने वाली जातियों-व्यक्तियों का उल्लेख किया है । मध्यकालीन राजपूताना के समाजिक इतिहास को समझने के लिए इस कृत्ति विशिष्ट स्थान हैं जिसमें किसान, प्रवहण, बोलाऊ, कासीद, महावत, राजपूत, पायक, चोर, भवाई, बाजीगर, कवि, राजा, पासीगर, माछीगर , वेश्या, महतरांणी, कलबी, ब्राह्मण, गारूडी, कांगो, दुष्काल, हाको, पोहराइत, तारू, मंत्रवादी, भाट, कृतघणी, भील, भिखारी, पालखियो, हेरू, ताडियो, खान खोदणियो, छइल, छत्रपति, लोहार, पट्टेबाज, प्रवासी, व्यापारी, भारो, लावणियो, मदारी ,लोभी, भोपाल, मरजीवो, चांचियो (समुद्री डाकू), मलेच्छ, खस्सी करने वाला, कसाई, (हरामखोर) वोलाऊ, विश्वासघाती, लाँचियो मरजीदांन व ढोंगी साधू का वर्णन बडे ही सजीव तरीके से किया है । उक्त कृति को पढने पर हमारे मन मस्तिष्क में मध्यकालीन राजपूताना का चित्रण हो जाता है। ऐसे अनोखे कवि भारतीय इतिहास में हमें दृष्टिगत नहीं हुए है जिसने ऐसी रचना की हो अर्थात दुरसाजी आढा का जुडाव न केवल राजसत्ता से था बल्कि उनके मन मस्तिष्क में आम व्यक्ति के लिए भी विशिष्ट स्थान था, अर्थात् वे प्रथम राष्ट्रीय कवि के साथ साथ प्रथम जनकवि कहलाने के सच्चे हकदार है । उनके कहे गीत के बोल इस प्रकार है-
               कलमां बांग न सुणियै कानां, सुणिये वेद पुराण सुभै।
               अहडौ सूर मसीत न अरचौ ,अरचौ देवल गाय उभै।।
राष्ट्र कवि दुरसाजी आढा ने हिन्दवां सूरज महाराणा प्रताप को इतिहास में अमर बना दिया। उनके शब्दों में महाराणा प्रताप ने अकबर की अभिलाषा को पूरा नहीं होने दिया-
                मन री मन रै मांहि,अकबर रै रहसी अकस।
               नर वर करये नाहि,पूरी राण प्रतापसी।
-दुरसाजी आढा एक भक्त के रूप में -दुरसाजी आढा एक ऊँचे दर्जे के भक्त कवि थे उन्होंने अपनी कुल देवी चालकनेची पर बहुत ही उत्कृष्ट काव्य रचना की हैं इसके अलावा परमेसरजी नाममाला आदि रचनाओं के रचयिता थे व शिव मंदिर (पाचेटिया), कृष्ण मंदिर (दुरसाश्यामी मंदिर पाचेटिया) शक्ति मंदिर में बालेश्वरी माताजी मंदिर (पेशुआ), पुष्कर में श्री श्रीकरणी माताजी के निर्माता रहे हैं जो इनके दृढ आस्थावान भक्त होने के प्रमाण  है-
-दुरसाजी आढा साक्षीकर्ता (परठवार) के रूप में- न केवल दुरसाजी आढा महाकवि थे बल्कि दत्ताणी खेत आदि युद्धों के वीर योद्धा व कुशल सेनानायक थे उनके प्रयास से ही मारवाड व सिरोही की दत्ताणी युद्ध के बाद मैत्री हुई थी इनके साक्षीकर्ता (परठवार) मानकर दोनो रियासते मैत्री भाव रखने के लिए वचनबद्ध हुई थी। जोधपुर राज्य की ख्यात के अनुसार महाराज सूरसिहजी अहम्दाबाद से वापस आते वक्त महाराज कंवर गजसिंहजी, भाटी गोयन्दासजी सामने आये थे तब सिरोही सारो ही साथ भेला हुआ और ने राजाजी, कंवरजी, भाटी गोयन्दास मानावत, भैरवदास ,चारण दुरसाजी आढा इन सभी ने मिलकर जोधपुर व सिरोही राज्य के आपस वैर को समाप्त किया । इसकी लिखत वि स 1669 की जेठ सुद 9 सिरोही में लिखी गई । महाराज सूरसिहजी महाकंवर गजसिंहजी के वचनानुसार सिरोही के राजसिह जी के वैर को समाप्त किया । समझौते के तहत सारणेश्वर के बीच में दत्ताणी के युद्ध में मारे गये 29 राजपूतों के भाईयों व बेटों को नारेल झीलाए यानि सम्बध तय हुआ । न केवल राजपूत के सम्बध हुए बल्कि बारहठ जी के वैर के बदले में ईसर बारठ जी के बेटे से दलाजी आसियां की बेटी परणायी गई । अर्थात दोनो पक्षों ने महादेव सारणेश्वर जी व दुरसाजी आढा को साक्षी मानकर वचनबद्ध हुए और इस वैर समाप्ती में दुरसाजी आढा की भूमिका बडी महत्वपूर्ण थी । जोधपुर राज्य की ख्यात के पृष्ठ संख्या 145-149 तक में इसका बडा विस्तृत वर्णन है और जगह जगह दुरसाजी आढा के लिए परठवार (साक्षी कर्ता) के रूप में उल्लेख होना निश्चित ही उनके विराट व्यक्तिव का द्योतक है। यही कारण रहा होगा जिसके कारण दुरसाजी आढा की मूर्तियां अचलेश्वर मंदिर व पद्मनाथ मंदिर में स्थापित हुई और चारण जो शिव के गण थे, जो नंदी चारने के कारण ‘चारण’ कहलाये । अत आबू के अचलेश्वर मंदिर में नंदी के पास दुरसाजी आढा की जीवित अवस्था में मूर्ति लगी। -डा. नरेन्द्र सिंह आढा झांकर, इतिहास व्याख्याता रा उ मा वि घरट सिरोही

जयाचार्य

-जैन संत कवि जयाचार्य तेरापंथ के चौथे आचार्य थे । इनका जन्म जोधपुर के रोहट गांव में वि. सं. 1860 की आश्विन शुक्ला चतुर्दशी को हुआ था । ये जन्मजात आशुकवि थे । अब तक प्राप्त जानकारी के अनुसार ये राजस्थानी के सबसे बड़े साहित्यकार माने जाते हैं । छोटी-बड़ी इनकी 128 रचनाएं मिलती हैं जिसमें ‘भगवती री जोड़’ नामक रचना सबसे बड़ी है, जिसमें एक लाख गद्य परिमाण हैं । इनकी सब रचनाएं प्रकाशित हो रही हैं । -35/126.

माधव भट्ट

-"सूरसिंह वंशप्रशस्ति’ के काव्यप्रणेता श्रीमाली जातीय माधवभट्ट जोधपुर में ब्रह्मपुरी मोहल्ले के निवासी थे । इनकी हवेली आज भी ब्रह्मपुरी में बनी हुई है । तुलादान का चबूतरा एवं माधवेश्वर का मंदिर अतीत की एक दुखान्तिका के साक्षी हैं -दयादेव भट्ट की अकाल मृत्यु की । ‘चिमनीचरित’ एवं ‘भीमप्रबन्ध’ में प्राप्त कथा के अनुसार माधवभट्ट के पुत्र दयादेव को मुगल सम्राट शाहजहां के अमराव अलावर्दीखान के अन्तःपुर में शाहजादियों को पढ़ाने के लिये नियुक्त किया गया था । निगरानी हेतु एक नाजर एवं दासी को भी नियुक्त किया गया था । एक दिन अलावर्दीखान की पुत्रवधु महल की खिड़की से देखकर दयादेव के सौन्दर्य पर मुग्ध हो जाती है तथा दासी के माध्यम से प्रणय याचना करती है । ब्राह्मण पुत्र की अनिच्छा के बावजूद काल की कू्रर गति के कारण चिमनी व दयादेव एकाकार होकर निरन्तर प्रणय परिपाक की स्थिति में आ जाते हैं । चिमनी दयादेव को चार मूल्यवान मोती भी भेंट करती है । धीरे-धीरे यह प्रणय-कथा बादशाह के पास पहुंच जाती है तथा सम्राट की आज्ञा से दयादेव को जिन्दा दीवार में चुनवा दिया जाता है । इस दारूण समाचार से उसकी मां अत्यंत विलाप करती है तथा पुत्र-वियोग में अपने आपको अग्नि को समर्पित कर महासतीत्व का वरण करती है । इन घटनाओं से माधवभट्ट का मन भी विषाद से भर उठता है तथा वे अपनी समस्त सम्पत्ति तुलादान के चबूतरे पर बैठकर दान कर देते हैं । महासती के हाथ का निशान आज भी माधवभट्ट की दुःखद आत्माहुति के रूप में हवेली में देखा जा सकता है । माधवेश्वर का जीर्ण मंदिर मानो उस 400 साल पुराने अत्याचार का मौन विरोध कर रहा है ।  -35/141.

संत भीखणजी

-जैन श्वेताम्बर तेरापंथ के प्रवर्त्तक संत भीखणजी राजस्थानी के बहुत बड़े कवि और लेखक थे । इनका जन्म वि. सं. 1783 की आषाढ़ शुक्ला त्रयोदसी को हुआ । वि. सं. 1817 की आषाढ़ी पूर्णिमा को इन्होंने तेरापंथ की स्थापना की । आचार्य संत भीखणजी की रचनाएं ‘भिक्षु ग्रंथ-रत्नाकर’ के नाम से दो भागों में छपी है । इन्होंने राजस्थानी गद्य और पद्य दोनों में रचनाएं लिखीं । इनकी गद्य रचनाओं में ‘हुण्डिया, चरचाएं, थोकड़ै’ आदि प्रमुख हैं । -35/126.


Copyright © Rajfolkpedia.com 2016 All rights reserved.                                                                                                                                                                          Website Developed By: Representindia.com