छतरी - सोढ़ा कीरतसिंह

-जोधपुर दुर्ग के प्रवेश द्वार जयपोल में प्रेवश करते ही बायें हाथ की ओर सोढ़ा कीरत सिंह की छतरी है जो जसोल रावल का प्रधान था । वह वीर जयपुर की फौजों के समक्ष बड़ी बहादुरी से लड़कर काम आया । उसकी वीरता पर प्रसन्न होकर महाराजा मानसिंह ने यह दोहा श्रद्धा सुमन स्वरूप अर्पित कर दिया -
               ‘‘तन झड़ तेगा तीख, पाड़ घणा भड़ पोढ़ियौ,
                किरतौ नग क्रोड़ीक, जड़ियौ गढ़ जोधांण रै ।’ -35/146

घंटियाला

 -जोधपुर से 20 मील पश्चिम में स्थित घंटियाला (प्राचीन रोहिन्सकूप) से प्रतिहार शासक कवकुक के अभिलेख प्राप्त हुए हैं । घंटियाला अभिलेख चैत्र शुक्ला द्वितीया वि. सं. 918 का है । कक्कुक के भाई बाउक का संवत् 894 का अभिलेख जोधपुर नगर की शहरपनाह/परकोटा से मिला था । इन अभिलेखों में हरिश्चन्द्र ब्राह्मण से कक्क तक की वंशावली मिलती है । अभिलेखों से स्पष्ट है कि हरिश्चन्द्र के बाउक तथा कक्कुक दो पुत्र थे । हरिश्चन्द्र के पुत्रों ने वि. सं. 670 के लगभग मण्डोर के दुर्ग पर अधिकार कर वहां कोट या चारदीवारी का निर्माण करवाया, जो घंटियाला एवं मएडोर पर शासन करते थे । प्रतिहारों की यह शाखा ‘मण्डोर के प्रतिहार’ नाम से ही प्रसिद्ध हुई । -35/4.

मुगल बादशाह

 -मुगलों में चंगेजखां बड़ा भागधारी हुआ है जिसने हिन्दुस्तान की बहुत सी उत्तरी विलायतों में चीन की सरहद से रूस तक बहुत-से मुल्क और शहर मुसलमानों के फ़तह करके अपना राज जमा लिया था । वह संवत् 1212 में पैदा हुआ था । 1263 में ‘कुराकुरम’ के तख्त पर बैठा और 1278 में मर गया । उसके पीछे मुगलों ने कई हमले हिन्दुस्तान पर भी किये मगर यहां के तुर्क बादशाहों, गयासुद्दीन बलवन, अलाउद्दीन खिलजी वगैरह ने हर दफै उनको लड़ाई में हरा कर भगा दिया । बहुतसों को पकड़ कर मुसलमान कर लिया जो यहां रह गये । फिर चंगेजखां के बहुत से बेटे पोते भी जो ईरान और तूरान के बादशाह थे, मुसलमान हो गये । चंगेजखां का एक पोता ‘कुबलाक़ाआन’ जो चीन और ख़ता का बादशाह हुआ था, बौद्ध हो गया था । उसने तौरेत इनबील कुरान और बौद्ध मत की पुस्तको का तरजुमा भी मुगली ज़बान में कराया था । चंगेजखां के पीछे कई 100 बरस तक उसके खानदान में बादशाही रही फिर अमीर तेमूरका खानदान उनकी जगह बादशाह बना । अमीर तेमूर भी मुगल था और मुगलों में चंगेजखां से बढ़कर प्रतापी हुआ कि जिसकी फ़तह का डंका पश्चिम में रूम और फरंग तक बजता था । चंगेज के दादा का पड़दादा तोमनाखां था । उसके 12 बेटों में से दो जोड़ले भाई क़बलखां और क़जोलीखां बहादुर थे । तोमनाखां ने कबलखां को तो वलीअहद दिया और क़ाजोली बहादुर को फौज का अफसर बनाया । ये दोनों औहदे दोनों की औलाद में हमेशां के वास्ते मुकर्रर कर दिये । जिसके माफक चंगेजखां ने भी जो कबलखां की चौथी पुश्त में था, तोमनाखां के पड़पोते कराचारनोयां को अपना सिपहसालार बनाया था । चंगेजखां के पीछे वह और उसके बेटे पोते चंगेजखां के दूसरे बेटे चग़ताईखां और उसकी औलाद के सिपहसालार रहे, जिसकी बादशाही तूरान में थी । क़राचारनोयां की चौथी पुश्त मे अमीर तेमूर संवत् 1383 में पैदा हुआ था । उस वक्त तो उसके खानदान की थोड़ी सी ही जागीर थी मगर वह अपने साले अमीर हुसैन का मुल्क छीनकर संवत् 1427 के करीब समरकंद में तख़त पर बैठा । उसने बहुतसे मुल्कों पर चढ़ाइयां कर करके फ़तह किये और चंगेजखां की तरह से बहुत से शहरों में कटाबोली संवत् 1455 में दिल्ली को भी फ़तह करके बहुतसी दौलत हिन्दुस्तान की लूट ले गया । उसके बेटों ने ईरान, तूरान और खुरासान में अपनी सलतनतें जमा कर कई सौ बरस तक राज किया । इन सलतनतों में बहुत बड़ी और जबरदस्त सलतनत हिन्दुस्तान की थी जो तेमूर के पड़पोते के पड़पोते बाबर बादशाह ने संवत् 1582 में फतह की थी । जहां हुमायूं, अकबर, जहांगीर, शाहजहां और औरंगजेब तक तो राज खूब बना रहा फिर कमजोर होकर संवत् 1857 तक सब जाता रहा । सिर्फ दिल्ली के किले में नाम के आखरी बादशाह बहादुरशाह जफ़र तक बादशाही रही थी । संवत् 1914 के ग़दर में वह भी जाती रही । -6/601-3.

सूर्य मंदिर

 -मुलतान का सूर्य मंदिर : -कृष्ण पुत्र साम्ब ने अपने कुष्ठ रोग निवारण के कारण सम्बपुर/साम्बनगर में चन्द्रभागा/सरस्वती नदी के किनारे विशाल सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया । ऐसी मान्यता है कि यहां सम्बपुर जो बाद में मुलतान (पाकिस्तान) के नाम से जाना जाने लगा जहां विशाल सूर्य प्रतिमा प्रतिष्ठापित थी । इस सूर्य मंदिर के पास एक जल कुण्ड था, उसमें नहाने वाले व्यक्यिं को कुष्ठ रोग से मुक्ति मिलती थी, जहां सारे भारतवर्ष से इस मंदिर में दर्शनार्थी आते थे । मूलतान के सूर्य मंदिर व नगर की कहानियां अरब, ईरान के व्यापारियों व अन्य पर्यटकों ने अपने क्षेत्र में सुनाई व लिखी हैं । इवन हेकल, इस्तखरी, मुकद्दसी, कजनवी, बुखारी, अबूजेद, सेराफी तथा अरबी यात्री मसूदी तथा अलबेरूनी ने अपने यात्रा वर्णनों में मुलतान के सूर्य मंदिर का उल्लेख किया है । मसूदी के ग्रंथ ‘ मुशज्जुहब’, बुखारी के सफरनामा आदि में लिखा है कि ‘इस मंदिर के बुत पर जो लकड़ी का बना था, एक सुर्ख रंग का चमड़ा चढ़ा था । मूर्ति नासानी थी । ताज सोने का है, आंखों में कीमती लाल लगे हैं, वस्तुतः ये दोनों पद्मराग मणियां है ।’ पद्मपुराण में उल्लेख है कि उक्त मंदिर जहां बना है उस नगर का प्राचीन नाम कश्यपपुर था । यह नगर कश्यप ऋषि ने बनाया था । पांचजन्य विशेषांक, 1 अप्रेल, 1984 में वचनेश त्रिपाठी लिखते हैं- ‘अरब, ईरान के लेखकों ने मुलतान, सम्बपुर, हम्सपुर तथा वगपुर लिखा है । कल्हण कृत राजतरंगिणी में भी सूर्यकुण्ड की महिमा दर्ज है । श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब द्वारा बसाये नगर और सूर्य मंदिर का निर्माण स्थल भी यही है । हजारों वर्षों के बाद नगरों के नाम बदलते रहते हैं । कश्यपपुर, साम्बपुर तथा बाद में इसका नाम मुलतान पड़ा है । मुलतान में बहने वाली नदी सरस्वती की बहिन चन्द्रभागा नदी थी । चि. वैद्य ‘हिन्दू भारत का उत्कर्ष’ पृ. 279 लिखते हैं कि- मुलतान में एक सूर्य उपासक का वर्णन करते हुए सूलेमान लिखता है कि मुलतान के बाजार में मैंने एक तपस्वी को देखा । वह दिन भर सूर्य की ओर दृष्टि किये हुए खड़ा रहता था । सोलह वर्ष से उसका यह व्रत अखण्ड रूप से चल रहा था । उसे कभी भी सूर्य के ताप से पीड़ा नहीं हुई ।’
-जैसलमेर बाड़मेर क्षेत्र में किराड़ू देवका में 12वीं शताब्दी के सूर्य मंदिर मिले हैं । जैसलमेर नगर में महारावल बेरसिंह की पत्नी सूर्य कंवर ने सूर्य मंदिर का निर्माण 1496 में कराया था । सूर्य और उसकी पत्नी रैणादे के विषय में अनेक लोकगीत प्रचलित है । -21/127.

आऊवा धरना

-चारणों में आहुवे का धरना जियादा मशहूर है जो सम्वत् 1643 में मोटा राजा उदयसिंघजी के ऊपर दिया गया था । इसका सिर्फ यह सबब था कि 20 बरस पहिले जब राव चन्दरसेनजी ने जोधपुर का किला मुगलों को सौंपा तो जनाने को सिवाने के पहाड़ों में भेज दिया था । रस्ते में एक रथ के बैल थक गये । पास ही एक चारण कुआ चला रहा था । राज के नौकर उसके बैल ले आये । चारण गांव में जा कर कुछ आदमी लाया । उन्होंने आते ही रथ से बैल खोल लिये और रथ को उलट दिया जिससे मोटा राजा की मां का हाथ टूट गया । उस वक्त तो जानों की पड़ी हुई थी हाथ को कौन पूछता था ! मगर संवत् 1640 में मोटा राजा को जोधपुर मिलने पर जब जनाना पहाड़ों से पीछा आया तो मांजी ने उनको हाथ दिखा कर कहा कि और तो जो मुसीबत गुजरी सो गुजरी मगर जिस चारण ने रथ उलट कर मेरा हाथ तोड़ा है वह हरगिज हरगिज माफी के काबिल नहीं है । मोटा राजा ने उसकी जमीन जब्त करदी । उसके वास्ते जो चारण सिफारशी हुए वे भी अपने अपने शासन खो बैठे । इससे चारणों में बड़ी हलचल पड़ी । संवत् 1642 के अखिर में राजाजी दक्खन से सोजत आये और वहां जो शासन उनके बड़े भाई राम और राम के बेटे कल्ला को दिये हुए थे, वे भी जब्त कर लिये । तब तो 11000 चारणों ने गांव आहुवे में ‘‘चांदी’’ करने के वास्ते इकट्ठे होकर महादेवजी के मंदिर पर धरणा दिया । क्योंकि वहां के ठाकुर चांपावत गोपालदास ने उनसे कहा था कि और तो मुझसे कुछ मदद नहीं हो सकती है मगर मैं तुम्हारी ‘‘चांदी’’ करा दूंगा । राजाजी ने यह खबर सुन कर सोजत से अक्खाजी बारहट को चारणों के समझाने के वास्ते भेजा मगर आहुवे पहुंच कर वह भी अपनी बिरादरी में शामिल हो गया । तब राजाजी ने उसके वास्ते एक बड़ा कटार भेज कर कहलाया कि ‘‘और तो गले घाल कर मरेंगे और तुम गुदा में घाल कर मरना’’ और फिर फौज को हुक्म दिया कि जा कर चारणों को सजा दे । पर चांपावत गोपालदास ने चारणों को तसल्ली दे कर कहा कि मैं फौज से लड़ूंगा, तुम अपना काम करो । चारणों ने पहिले तो शीरा करके खूब खाया और फिर रात भर जोगमाया के गीत गा कर तड़के ही अक्खाजी के ढोली गोयंद को मंदिर के सिखर पर चढ़ाया कि जब सूरज की किरण फूटे तो ढोल बजा देना । गोयंद ने ऐसी बात के लिये कि जिससे 11,000 चारणों की जान जाती, ढोल नहीं बजाया और सूरज के निकलते ही गले में छुरी खा कर अपने को नीचे गिराया । तब सब चारण छुरी और कटारी ले ले कर मंदिर में गये । किसी ने गला काट कर अपना खून महादेवजी पर छिड़का, किसी ने अपना सिर चढ़ाया, कोई पेट मार कर मरा, कोई ज़खम खा कर गिरा और मंदिर सब खून से भर गया । 7 आदमी तो उसी वक्त मर गये उनमें अक्खाजी भी था । जब तक कि यह ‘‘चांदी’’ हुई चांपावत गोपालदास अपने भाई बेटों समेत फौज का रस्ता रोके खड़ा रहा मगर फौज नहीं आई । क्योंकि राजाजी ने चारणों को खुद मरते देख कर फौज नहीं भेजी । पर गोपालदास से कहलाया कि तुमने चारणों को ‘चांदी’ में मदद दी, इसलिये मेरी अमलदारी से चले जाओ । गोपालदास दो लाख का पट्टा छोड़ कर चारणों समेत बीकानेर के राजा रायसिंघ के पास चला गया और उनके भाई पृथ्वीराज ने अकबर बादशाह से सिफारिश करके चारणों के शासन फिर बहाल करा दिये । -6/343-4.
-जोधपुर के महाराजा मोटा राजा उदयसिंह द्वारा चारणों की जागीरें जब्त करने के विरोध में वि.सं. 1643 (सन् 1586) में आऊवा का बड़ा भारी धरणा हुआ । धरने की तिथि पर दूर-दूर से चारण एकत्र हुए । पहले दो दिन अन्न जल का उपवास रखा गया और तीसरे दिन सूर्योदय के साथ ही चारणों का आत्मोसर्ग हो गया । कई अपने कपड़े तेल में भिगोकर तेलिया तागा (आत्मदाह) कर रहे थे, कई चारण छौगाल (अपने हाथों शिरच्छेदन) कर रहे थे, कई गले में कटारी खा रहे थे तो कई युवा देहविदीर्ण कर हाराकीरी कर रहे थे और चारणियां जीवत दाग (चितारोहण ) कर रही थीं । लगभग 1800 लोगों ने आत्मबलि दी । अंत समय में राजा उदयसिंह ने प्रायश्चित स्वरूप सारी जागीरें वापिस कर दी परन्तु लेने वाला कोई चारण नहंीं था, चारण इस राजा का नाम नहीं लेते । -30/203.
- छप्पय-प्रथम रोहड़ पैंतीस, दूण दस सांदू जाणूं,
          आठ मेख अणभंग, वडम आढ़ा बखाणूं ।
          सोळै लाल़स साथ, पहर जमडाढ़ां पड़िया,
          च्यार अवर चाल़ीस, खेत पड़िया रण खिड़िया ।
          मुरमेख दूण सहितां मुदै, जंग कर अरियां जूझवा,
          उदैराव सिर तखत आऊवै, महातेज (चारण) इतरा मुवा ।।1।।
          दूण उभै देवल, पांच आसिया पुणीजै,
          रतनू सतरै राव, सात सिंढ़ायच सुणीजै ।
          कुळथंभ किनियो अेक, जको मुवो दिन दूजै,
         मुओ सारां मोर, दाद गोविंद नै दीजै ।
         सिरताज मात्र धरणो सजै, वडी लाज कुल री वुवा,
         उदैराव सिर तखत आऊवै, महातेज इतरा मुवा ।।2।।  -कवि खेमाजी आसिया लाकड़थूंब रौ कह्यौ छप्पय सूं ।
-देखें चारण धरणा ।

 

 

 


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