पंच वांणी

-कबीर, दादू, हरिदास, रामदास और दयालदास की वाणियां । -33/4.

भंवर गुंजार

-1. डिंगल का एक अष्टपदी छंद ।   -33/262.

भास

 -1. प्रकाश, उजाला । 2. आभा, प्रभा, दीप्ति । 3. किरण, रश्मि । 4. सूर्य, रवि । 5. गीध । 6. शकुन पक्षी । 7. एक छंद विशेष । 8. कड़खा छंद का नामान्तर । 9. पद्य खण्ड । 10. पद्य खण्ड के साथ-साथ होने वाला काव्य का भाग । -33/285.

भासा

 -1. किसी देश, क्षेत्र या समुदाय की बोली जो व्याकरण व साहित्य की दृष्टि से व्यवस्थित हो । भाषा । 2. बोली, वाणी, वचन।  3. हिन्दी भाषा । 4. संगीत में एक ताल । 5. पशु-पक्षियों की बोली । 6. सरस्वती । 7. किसी छंद, पद्य या कविता का गद्य- रूप । -33/285.

माधवानल कामकन्दला प्रबंध

 -इस प्रेमाख्यान प्रबंध के रचियता गणपति जाति के कायस्थ थे । इनके पिता का नाम नरसा था और बड़ोच जिले के आमोद/आम्रपद के रहने वाले थे । इसका रचनाकाल सं. 1574 है । यह 2500 दोहों में लिखा एक विशुद्ध प्रेमाख्यान प्रबन्धकाव्य है, जो कवि के रचनाकौशल, उसकी बहुज्ञता, प्रबंध-पटुता एवं रसज्ञता का परिचायक है । इसकी संपूर्ण कथा आठ अंगों में विभाजित है । जिसमें मुख्य रूप से माधव ब्राह्मण तथा कामकन्दला गणिका की प्रेमकथा वर्णित है । कवि ने ग्रंथ का प्रारंभ तत्कालीन प्रचलित मान्यता को छोड़ कर, मंगलाचरण में सरस्वती एवं गणेश की वन्दना न करके, कामदेव की वन्दना की है ।....... ‘कथावस्तुनुसार माधव रुक्मांगदपुरी के राजा रायचन्द के राजपण्डित कुरंगदत्त का पुत्र था । ज बवह पांच वर्ष का हुआ तब एक यक्षणी उसे उठाकर ले गइ्र्र तथा पुष्पावती क राजा गोविन्दचन्द्र के पुरोहित ने उसका पालन-पोषण किया । ज बवह युवक हुआ तो उसके रूप पर पटरानी रुद्रदेवी मुग्ध हो गई और माधव के सन्मुख काम-प्रस्ताव रखा । इस पर माधव ने रानी की भर्त्सना की जिससे रुष्ट होकर रानी ने माधव पर दुश्चरित्रा का मिथ्यारोप लगाकर राज्य से निकलवा दिया । जब वह रुक्मांगदपुरी पहुंचा तो वहां की युवतियां भी उसके रूप-सम्मोहन से कामातुर हो गई । अतः माधव को वहां से भी निकलना पड़ा । घूमता-घूमता वह कामावती नगरी पहुंचा । वहां उसने अपनी कला-दक्षता से प्रभावित कर राजा कनकसेन की राज सभा में उच्च स्थान प्राप्त कर लिया । माधव राजसभा में नृत्य करती गणिका कामकन्दला पर इतना मुग्ध हो गया कि उसने राज्य द्वारा प्रदत्त पुरस्कार कामकन्दला को दे दिया, इससे राजा ने अपना अपमान समझकर उसे अपना राज्य छोड़ने का आदेश दे दिया । कामकन्दला माधव के प्रेमपाश में बंध चुकी थी किन्तु राजकोप के भय से माधव वहां रूक नहीं सकता था । अतः वह कामकन्दला को विरह में तड़पती छोड़कर वहां से चल दिया और वन के कष्टों को भोगता हुआ राजा विक्रमादित्य की राजधानी उज्जेनी में पहुंचा । वहां महाकाली के मंदिर में, भींत पर अपनी विरह-वेदना का श्लोक लिखकर मूर्छित हो गया । परदुःख भंजनकारी राजा विक्रमादित्य को जब गणिका से उसकी विरह-वेदना का कारण ज्ञात हुआ तो वह माधव को कामकन्दला दिलवाने के लिये उद्यत हो गया । किन्तु उन दोनों प्रेमी-प्रेमिका को मिलाने से पूर्व राजा ने दोनों के सच्चे प्रेम की परीक्षा लेने के लिये उनको एक-दूसरे की मृत्यु के मिथ्या समाचार कहे । जिसे सुनकर दोनों की मृत्यु हो गई । इस पर राजा दुःखी होकर जब आत्महत्या करने लगा तो देवी ने प्रकट होकर दोनों, प्रेमी-प्रेमिका को पुनर्जीवित कर दिया । राजा विक्रमादित्य ने कामसेन से युद्ध करके गणिका कामकन्दला माधव को दिलवादी । कथा की समाप्ति दोनों प्रेमियों के मिलन तथा भोग विलासमय जीवन के वर्णन एवं प्रेम की अनन्य निष्ठा के साथ होती है-
                        ‘माधव महिला थी ठहई, महिला माधव दीठ ।
                        अन्यो अन्यइ श्यां थमां, चटकु चोल मजीठ ।’
मध्ययुगीन प्रेमाख्यानक काव्यों में ‘माधवानल कामकन्दला’ प्रबंध का अन्यतम स्थान है । भाव-पक्ष और कला-पक्ष, दोनों ही उत्तम बन पड़े हैं । प्रेम का जैसा निश्चल रूप इस काव्य मेंं मिलता है, वैसा अन्यत्र मिलना दुर्लभ है । इसमें गणिका कामकन्दला के चरित्र का विकास, उसकी सच्ची प्रेमनिष्ठा के कारण सती दमयन्ती और सीता के चरित्र तक पहुंच गया है । यहां प्रेम एक पक्षीय न होकर उभय पक्षी है । अब तक अधिकांश रचनाओं में नायक के विरह में, नायिका के विरहदग्ध हृदय का चित्रण ‘बारहमासा’ के वर्णन द्वारा किया जाता रहा है, किन्तु इसमें नायक के विरह संतप्त हृदय का चित्रण ‘‘बारहमासा’’ के द्वारा किया गया है जो कवि की मौलिक सूझबूझ का द्योतक है । नायिका के नखशिख आदि का वर्णन तो बहुत हुआ है, पर पुरुष सौन्दर्य का चित्रण गणपति की विशिष्टता है । समस्त काव्य में, संयोग, वियोग के मार्मिक चित्रण के अतिरिक्त नायक-नायिका की मानसिक दशाओं का सूक्ष्म चित्रण किया गया है, वह कवि की पर्यवेक्षणशक्ति का परिचायक है । मार्मिक स्थलों की पहिचान, सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति, चित्रोपमता, इस काव्य के विशेष गुण है । महावन में विषधरों आदि की विभिन्न जातियां एवं वनस्पतियों आदि के वर्णन बाहुल्य से कवि की बहुज्ञता का पता चलता है । नाना प्रकार के व्यंजनों, अश्वों, औषधियां आदि के सैकड़ों भेदों का मानों ‘कटलोग’ ही बन गया है । समस्याविनोद अथवा प्रहलिका की रचनाओं से कवि के बुद्धिकौशल का पता चलता है । ‘माधवानल कामकन्दला प्रबंध’ का महत्व न केवल मध्यकालीन प्रेमाख्यानक काव्य होने की दृष्टि से है, बल्कि तत्कालीन सामाजिक स्थिति को समझने के लिये समाजशास्त्रीय एवं लोककथा तत्त्वों के अध्ययन की दृष्टि से भी इसका बड़ा महत्व है । -36/23-25.

 

 


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