प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान

-राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर में 25 विषयों में विभाजित करीब सवा लाख ग्रंथों में दुर्लभ सचित्र हस्तलिखित ग्रंथ संग्रह में हैं । इनमें अकेले 7000 ग्रंथ आयर्वेद चिकित्सा पद्धति से जुड़े हस्तलिखित ग्रंथ हैं । यहां मौजूद ग्रंथों में घोड़ों की चिकित्सा पर नकुल का शालिहोत्र ग्रंथ भी शामिल है, इसमें विभिन्न जातियां के घोड़ों के गुण, शुभ, अशुभ लक्षण का सचित्र दर्शन है । रोगों के उपचार गतिविधियों के साथ खानपान का सचित्र वर्णन है । गज चिकित्सा पर मेवाड़ शैली के सचित्र गं्रथों की संपूर्ण संख्या हाथियां की दिनचर्या, भोजन और मौसमी उपचार पद्धति का सटीक वर्णन है । पाल काप्य ऋषि के 18वीं शतवब्दी में रचित गजायुर्वेद का मेवाड़ी संस्कृत कथा राजस्थानी भाषा में सचित्र वर्णन है । -राज.पत्रिका, जोधपुर, सनसिटी एक्सपोज, 08.08.2017.  

शिलालेख

-राजस्थान इतिहास को जानने के साधनों में ‘शिलालेखा’ें का विशिष्ट स्थान है । इनसे तत्कालीन शासन-वयवस्था, राजनीतिक व सांस्कृतिक स्थिति की जानकारी उपलब्ध होती है । यों देखा जाये तो मेवाड़ व आमेर के राज्यों में खूब शिलालेख मिलते हैं, परंतु जोधपुर व बीकानेर संभाग में शिलालेखों की बड़ी कमी है जिसका कारण पत्थरों का अभाव प्रतीत होता है । निःसंदेह शिलालेखों में तत्कालीन शासकों की प्रशंसा अधिक होती है । अतः अधिक विश्वसनीय साधन तो नहीं हो सकते हैं किन्तु इनमें आये तिथि क्रम पर सहसा विश्वास किया जा सकता है । उदयपुर के मंदिरों में लगे शिलालेख विशेषतः जगदीश मंदिर की प्रशस्ति में प्रताप व अकबर के मध्य युद्ध तथा औरंगजेब के आक्रमण के बारे में वर्णन मिलता है । यद्यपि यह एक पक्षीय वर्णन हो सकता है तथापि फारसी पक्षपात पूर्ण वर्णन के साथ दूसरा पक्षपात पूर्ण पहलू भी हमारे समक्ष इन शिलालेखों द्वारा रखा गया है । -27/221.
-इतिहासकार मांगीलाल मयंक की पुस्तक ‘‘मारवाड़ के शिलालेख’’ में किनसरिया गांव नागौर की देवी के मंदिर में प्राप्त तीन शिलालेखों का उल्लेख किया है । उसमें चौहान दुलभराज एवं दधिचिक चच्च का उल्लेख है । यह अभिलेख बैसाख सुदि अक्षय तृतिया रविवार सम्वत् 1056 सन् 999 ई. का है । शिलालेख में बताया गया है कि चौहान वंश में शासक वाकपतिराज हुआ जिसका पुत्र सिंहराज तथा सिंहराज का पुत्र दुर्लभराज था । इसी स्थल के शिलालेख के अनुसार दधिचिक वंश का भी वर्णन है । चच्च इसी वंश का था । तीसरा शिलालेख सन् 1243 का है जब मुसलमान भारत में बसने लग गये थे । ......कीर्तिसिंह के पुत्र दधिचिक विक्रम की मृत्यु पर उसकी रानी लैलादेवी सती हुई थी । -राज. पत्रिका, जोधपुर 31.5.1991.
-गांव बागोट, नागौर की नाडी में पुराने समय के तीन शिलालेखों के पत्थर मिले हैं । इन पत्थरों पर सम्वत् ग्सारह सौ ग्यारह लिखा हुआ है । कहते हैं कि नाडी के पास ब्राह्यण परिवारों में सती एवं जुंझार हंए थै । -राज. पत्रिका, जोधपुर, 12.6.1991.
-आकोदा ग्राम नागौर में झुंझारों की चार देवलियां हैं । ये चारों ही मकराने के पत्थर के हैं । प्रथम देवली गांव से पूर्व की ओर एक कि. मी. दूर ठाकुर रामचन्द्रसिंह के गांव कुए और खेत से दक्षिण में सोमाणा तालाब में हैं । यह ढाई फुट ऊंची अश्वारूढ़ सवार और सामने करबद्ध सती की है । इस पर संवत् 1510 अंकित है । इस पर तीन पंक्तियां का त्रुटित लेख इस प्रकार है- ‘‘ .......संवत् 1510 ब्रहसपतवार.........13.......सिवनाथसिंघजी............बहू सती............।’’ द्वितीय लेख आकोदा गांव के तालाब में कुं. धनसिंह के जलपानगृह से कुछ दूर पूर्व दिशा की ओर एक टीले पर है । यह लेख सं. 1783 का है । यह देवली कीरतसिंह भाटी के पुत्र सुखसिंह की है । केशरीसिंह भाटी के पुत्र गजसिंह ने संवत् 1791 में चबूतरा बनवाकर देवली स्थापित की थी । इसकी इबारत इस प्रकार है- ‘‘ सावत 1783 मती बसाष बद 8 सष(सुखसिंह).....म काम जुझार हुवा कीतजी क बट(बेटा) सवत 1791 गजा भाटी देवल चौतर केसरीसिंघ भाटी क बेटो...।’’ तीसरी देवली उपर्युक्त देवी से करीब दो सौ गज की दूरी पर धनसिं के होटल के पूर्व की ओर एक टीले पर है । इसका शिलालेख इस प्रकार है- ‘‘समत् 1815 का मीती... सुदै अठ 8 सोमवार क दीन काम आया देवावत भाकर डुगै को बेटो आक को पोतौ उंकार तंबो जीवो चोतरो करायो संवत! 1818 की मीती असाढ़ सुद 8 गुरुवार जीवो मोटजी के को चतरो करायो को बाच जहा न राम राम बचजो जी ।’-विश्वम्भरा, पृ. 30-1, अंक-3, वर्ष-23, जुलाई-सितं, 1991.
-जैसलमेर दुर्ग स्थित सभानिवास के बाहर चौक की दिवार पर चतुष्ठकोण पीले पाषाण पर उत्कीर्ण लेखों में मूलराजजी द्वारा बनाये गये समस्त महलों की तिथियां तथा कलाकारों, कामगारों एवं कारीगरों के नामों का उल्लेख हुआ है । वहां पर वि. सं. 1821, 1833, 1834 व 1837 के लेख उत्त्कीर्ण है । इन लेखों में उस समय के कलाकारों के नामों का उल्लेख है । पंक्ति संख्या 20 से 24 तक के नाम इस प्रकार है- 21. तजवीस उसता आसाराम दयाराम दूजो दयाराम जैपुरियो हिन्दु गजधर कमाल बीकानेरियो श्वन । जैसलमेरीयां री, 22. विगत हिन्दु गजधर अरजन गाम धायसर रो तथा मुकनो ग्राम जाजिया रो अथ गजधर यवनों री विगत गोदड़ जानियो, 23. सुजो, गाजी । अमेद । सेरखान मठो । हमीर बलेल व्यास चूड़ामणी लिखंतम । 25. गजधर लालू ओर उपर लिखासे, 26. सूत्रधार रावचन्द तथा सिलावटो हइयात सूमरो, 28. सबलोराजाणी गजधर जीवराज जेपुर रो ऊस्तो नाथूराम सिलावटो संकर गजधर चतुरभुज उदेपुर रो गजधर मनरूप जैसलमेरियो, 29. दूजा गजधर ऊपर लिखा सम । -21/181.
-निवाई, जयपुर में उपलब्ध शिलालेख- 1. दामोदरजी के मंदिर का शिलालेख- निवाई में दामोदरजी का मंदिर और उसके सामने कुमुदिनी कुण्ड बहुत सुरम्य और रमणिक स्थान है । वहां पर मंदिर के शिलालेख उत्कीर्ण है-                                    श्रीरामजी
             1. बिरन प्रीति मंदिर रचे न्रि पति विस्न क रा 2. ज ।। रा दो दामोदर तथा राधा किशन दिराज 3. सतरह सै गुणचास म पुन्य मास वैसाष 4. अवैत्रितो या सुकल तिथ              पुरे मन अनि 5. साथ ।। सुत गोपाल सारंग धर ता सुत री 6. र धर दास ।। बस्त्री गढ व नाहि के क 7. दम कुल श्री वास ।। सुभै भवतु ।। श्री 8. संवत 1749 । इस शिलालेख से महाराजा बिशनसिंह के शासनकाल में राधादामोदर तथा राधाकृष्ण के मंदिरों के निर्माण का पता चलता है ।
2. कान्हा नरूका का स्मारक -निवाई में ‘मायला कुण्ड’ के पास एक भव्य और कलात्मक छतरी है, जिसकी भीतरी दीवारों पर पुष्पलताओं का सुन्दर और वैविध्यपूर्ण अलंकरण
है । छतरी के खंभों पर जंजीरयुक्त घंटियों का अलंकरण अत्यधिक सुन्दर है । प्रत्येक खंभे पर पुष्पों की सजावट और अलंकरण एक दूसरे से भिन्न है तथा विविधता लिये हुए
है । इस छतरी के बीचोंबीच एक संगमरमर की शिला स्थापित है जिस पर हाथ में भाला लिये घुड़सवार के सामने तीन स्त्रि-आकृतियां हाथ जोड़े प्रणाम की मुद्रा में खड़ी दिखायी गयी है । इस शिलालेख से कान्ह नरूका की मृत्यु के अनन्तर उनकी तीन रानियों बिसनी, पार्वती और किसनावती के सती होने का पता चलता है । इसके नीचे लेख उत्कीर्ण है जो काल प्रभाव में बीच में कहीं कहीं पर धिस गया है और दुष्पाठ्य है- 1. संवत 1639 बरषे जेठ सुदी 2. 15 दीन कान्ह जी बैकुंठ पधारा 3. घोड़े साती बीसनी पाबहती षी 4. सनावती...... जी पंवार 5. समीप बैकुंठ...............दा सो 6. बठा.........दी षा ।
छतरी की दीवार पर उत्कीर्ण लेख- 1. उदावत हाथ जाती नारनाथ 2. तै की फरमाईसी कान्ह हुवौ 3. लीषत सीलावट नराइन । -विश्वम्भरा पृ. 9-10, अंक 3, वर्ष 22, जुलाई-सितं., 1990.
-भटनेर का ‘फारसी-लेख’ ही पहला महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शिलालेख कहा जा सकता है जो हिजरी सन् 1017 का है । उसके हासिये पर किसी ने देवनागरी में ‘‘सं. 1665 चेत सुद 5’’ लिख दिया है, जिससे यह कुंवर दलपतसिंह की भटनेर से बेदखली का ऐतिहासिक लेख सिद्ध होता है । ........नोहर में ‘नाथमल का लेख, जिसमें अमरनाथजी का नाम लिखा है, नाथों का अब तक मिला एक मात्र पुराना लेख है । यह सं. 1103 का है । ददरेवो लेख सं. 1273 का है और वह मण्डलेश्वर गोपाल पुत्र जयतसिंह राणा का उल्लेख करता है, जो गोगा चौहान के वंश का होने से महत्वपूर्ण है । हुडेरो लेख संवत् 1309 का है, जो राठौड़ नरहरदास के रूप में यहां राठौड़ों की पहुंच की सूचना देता है । पल्लू का लेख दसवीं सदी का है किन्तु उसमें किसी का नाम पढ़ पाना कठिन है । बीकानेर के पठारी भाग में हद्दां और खींदासर में दसवीं सदी के लेख मिले हैं किंतु किसी राजवंश का उल्लेख करने वाला पहला शिलालेख सं. 1475 में सूत्रधार हापा ने उत्कीर्ण किया है । उसने जैसलमेर के एक कठोर पत्थर पर महिषासुर मर्दिनी माता की सुंदर मूर्ति बनाई और उसके पादासन पर उसे श्री घंटालि देवी का नाम दे कर लिखा कि यह मूर्ति महाराज श्री केल्हण के लिये बनाई है । शिलालेख के लिखते समय पूगल पर केलण का पुत्र चाचा कोटपाल था, यह भी लिखा है । जांगल देश में दसवीं सदी से ही यहां अनेक लेख मिलते हैं । भसीनो, मूंधड़ो, उदयरामसर, धणेरो, चरलू, सुजानगढ़, भादलो, अरखीसर, कंवलीसर, मोरखाणो, जांगलू आदि दर्जनों स्थानों पर राठौड़ों के आने से पहले के शिलालेख हैं और वे ऐतिहासिक महत्व के हैं । एक शिलालेख बासी बरसिंहसर में बने एक तालाब के किनारे खड़े कीर्तिस्तंभ पर उत्कीर्ण था, जो भाटी और सांखलों के इतिहास का बहुमूल्य दस्तावेज था । संवत् 1381 का यह शिलालेख 35 पंक्तियों में लिखा था और उसे सर्वप्रथम डॉ. एल. पी. टेसीटोरी के सहायकों द्वारा खोजा गया था और 8 फरवरी, सन् 1919 को स्वयं टेसीटोरी ने बासी बरसिंहसर जा कर उसकी कई छापें लीं । यह शिलालेख जैसलमेर के राजा कर्णदेव का जांगलू राजा कुमरसिंह की पुत्री दूलह देवी के विवाह के उपलक्ष्य में बारात ठहरने के स्थान पर बने दूलहदेवी सर का कीर्ति लेख है, जो जैसलमेर पर बताए गये दूसरे आक्रमण की मान्य तिथि को झुठलाता है । राठौड़ों के शिलालेखों में कोड़मदेसर का संवत् 1516 का शिलालेख बताता है कि राव जोधा की माता कोड़मदे थी, जो यहां दिवंगत हुई । वह नाळ के राजपूतों की लड़की थी, जो जोधा का ननिहाल होने से चित्तौड़ में रणमल्ल के मारे जाने पर जोधा आदि के लिये सुरक्षित गुप्त स्थान बना था और राव जोधा द्वारा बीका को, सबसे बड़ा कुंवर होने पर भी, युवराज पद न दिये जाने पर वह अपने चाचा कांधल आदि के साथ सूर्यनगरी को छोड़कर यहीं आ बैठा था । इसी प्रकार राजलदेसर में सं. 1581 का दूसरा लेख है, जो राव बीका के बड़े पुत्र राजसी का मृत्युलेख है । वह भी अपने पिता से नाराज होकर आजीवन बीदावतों के पास रहा था । बीदावत का प्राचीनतम लेख सं. 1565 का है, जो गोपालपुरा में है । पड़िहारों में संसारचन्द बीदावत का मृत्युलेख सं. 1586 का है । सरदारशहर के पास ऊदासर में सं. 1651 का बड़ा लेख है । वहीं पर रामसिंह, महाराजा रायसिंह के छोटे भाई का मृत्युलेख सं. 1634 का है । ये दोनों लेख बीकानेर इतिहास की एक लुप्त कड़ी को प्रकट करते हैं । एक बड़ा लेख बीकानेर के जूनागढ़ किले में सूरजपोल में लगा है । 92 पंक्तियों का यह लेख छह फुट नौ इंच लंबे और दो फुट तीन इंच चौड़े आकार में लगा है, जो अलग अलग पांच हिस्सों में लिखाया गया है और फिर एक साथ जोड़ दिया गया है । इस लेख में पहली बार राठौड़ों ने अपने को कन्नौज के राजा जयचंद का वंशज बताया है और वंश की उत्पत्ति आदि नारायण से कही है, जिसमें सम्राट जयचन्द 133वां राजा है । कहने को यह शिलालेख दुर्ग-प्रतोली के निर्माण का लेख है किन्तु इससे संबंधित उसमें केवल अंतिम ग्यारह पंक्तियां हैं । शिलालेख में शुरू में जैन ‘सिम्बल’ बना है किंतु लेखक का नाम नहीं है । फिर भी जूनागढ़ में लिखे इसी तिथि के दो छोटे लेखों में बृहत्गच्छीय श्रीक्षमारत्न शिष्य मुनि जयंत का नाम है । प्रशस्ति में महाराजा रायसिंह की वीरता का भी विवरण है । -विश्वम्भरा, पृ. 10-13, अंक 1, वर्ष 24, जन.-मार्च 1992.
-भीलवाड़ा के जहाजपुर तहसील के ‘धौड़’ नामक स्थान पर सन् 726 ई. के शिलालेख में राजा धवलदेव और धनोप के सन् 1006 के शिलालेख में दंतिवर्मन के पुत्र बुद्धिराजा व गोविंदराजा का विवरण है । बिजौलिया के सन् 996 के शिलालेख में मांडलगढ़ के इस क्षेत्र का सांभर के सपादलक्ष साम्राज्य के अधीन रहने का उल्लेख है । शाकम्भरी/सांभर के राजा वाक्पति चौहान के काल में धौड़, मेनाल, बिजौलियां और बाड़ोली के प्रसिद्ध शिव मंदिरों का निर्माण हुआ था । इनसे संबंधित उल्लेख धौड़ में मिले सन् 1225, 1226 व 1228 के शिलालेखों व लुहारी ग्राम के वीसलदेव के सन् 1154 के शिलालेख तथा मेनाल के 1224 के शिलालेख में उपलब्ध है । इसी क्रम में आंवलदा का वि.सं. 1224 का व लुहारी का वि.सं. 136 का शिलालेख भी ऐतिहासिक महत्व का है ।

कुर्सीनामा

 -कुर्सीनामा व वंशावली का ऐतिहासिक महत्व है । राजस्थान अभिलेखागार, बीकोनर में अनेक वंशावलियां व कुर्सीनामें उपलब्ध हैं । इसमें से कुछ प्रमुख वंशावलियां एवं कुर्सीनामे इस प्रकार हैं- कुर्सीनामा अचलदास खींची का, अथ राठौड़ वंशावली; वंशावली अणियारा राव राजा फतेहसिंघजी की; खांप मेड़तियां बिठलदासोत, केसोदासोत तथा मेड़तिया रघुनाथसिंघोत तथा आनन्दयिंघोत का कुर्सीनामा; परगने नागौर के गांव माण रो पोटलियो के जागीरदारां रायमलोत, नाहरसिंह के पट्टे के गांव कुर्सीनामा; नकल कुर्सीनामा महाराजा साहब माढ़ा; अचलदासजी, आसकरणजी, रावतसिंघोत, शंकरदास, भानीदासोत आदि के कुर्सीनामे व खींचियों के कुर्सीनामे महत्वपूर्ण हैं । -30/141-2.

बही

 -1.लेनदेन का हिसाब रखने की किताब, पंजिका । 2. व्यापार का लेखा-जोखा लिखने की पुस्तक, पंजिका । -32/190.
-जोधपुर की पुरालेखीय सामग्री में हस्तलिखित ‘रसीलेराज शोक बही’ में महाराजा तखतसिंह के शासनकाल में हुए राजघराने में देवलोक पर आधारित बही में विक्रम संवत् 1900 से 1915 तक में जो राजमाता अथवा रानियां तथा पड़दायतें, गायणियें, पासवाण आदि संसार से विदा हुईं -उनके दाह संस्कार का विवरण दर्ज है । बही में उल्लिखित जिन‘जिन माजिसा, रानीसा, कुंवर व बाईजीलाल, पड़दायितियां, गायणियां आदि के स्वर्गवास होने के उन आभूषणों को संवत् 1914 में टकसाल में गलाया गया । यह कार्य रतनचन्द आदि के हस्ते हुआ था और जो राशि उनकी निर्धारित हुई, उसे ‘कायलाणा’ झील के निर्माण में काम में लिया गया । बही में कायलाना के साथ तखतसागर सरोवर का भी नाम मिलता है । बही में करीब 10 रनिवास की महिला सदस्यों के गहनों का विवरण मिलता है, जिन्हें गलाने याने निष्पादन का संपूर्ण आलेख दर्ज है । उन सभी आभूषणों का उपयोग सार्वजनिक हित में किया गया था । -राज. पत्रिका, जोधपुर, एक्सपोज पृ. 13, 15.01.2017.

राजकीय पुरा अभिलेखागार, बीकानेर

 -भूतपूर्व राजस्थानी राज्यों के अपने-अपने पुरालेख विभाग थे । राजस्थान निर्माण के कुछ वर्षों पश्चात इन सब को एकत्र कर बीकानेर में केन्द्रीत कर दिया गया, परंतु अब भी इन विभिन्न राज्यों की पुरालेख सामग्री यहां उनके अलग-अलग अनुुभागों के रूप में वयवस्थित है । राजस्थान के विभिन्न निजी संग्रहों से आई हुई सामग्री नाॅन आर्काइव्ल रिकाॅर्ड्स के अंतर्गत आती है । यहां पर सुरक्षित सामग्री में फर्मान, निशान, सनद, अखबारात, वकील रिपोर्ट, खतूत, मुत्तफरीक, खरीता, ड्र्ाफ्ट खरीता, परवाना, अर्जदाश्त, फर्द, बकाया, दस्तूर कौमवार, सियाह हजूर, हस्बल हुकम, आमेर रिकार्ड, बहियां, फाइलें आदि मुख्य हैं । वास्तव में ये रिकार्डस् राजस्थान के इतिहास जानने के अत्यंत विश्वसनीय साधन हैं । बीकानेर में अवस्थित राजकीय पुरा संग्रहालय ‘‘राजस्थान राज्य पुरा अभिलेखागार, बीकानेर’’ के नाम से जाना जाता है । इसके विभाग जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, भरतपुर, कोटा, अलवर, अजमेर, टोंक आदि कई स्थानों पर  हैं, जहां पर अधिकतर स्थानीय संबंध के कागजात आदि सुरक्षित हैं । -27/225.

 


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