रणकपुर मंदिर

- यहां का त्रैलोकीय दीपक, चतुर्भुज युगादीश्वर विहार अपनी विशालता व कलात्मकता के लिये अत्यंत प्रसिद्ध है । इस मंदिर की ई. सन् 1439 में प्रतिष्ठा हुई थी । मंदिर में प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभदेव की पांच फुट ऊंची मूर्ति स्थापित है । इस मंदिर के चारों दिशाओं में चार द्वार हैं, अतः यह ‘चौमुखा’ मंदिर भी कहलाता है । लेकिन अब केवल पश्चिम का द्वार ही खुला रहता है । इस मंदिर की ई. सन् 1439 में प्रतिष्ठा हुई थी । मंदिर में प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभदेव की पांच फुट ऊंची मूर्ति स्थापित है । इस मंदिर के चारों दिशाओं में चार द्वार हैं, अतः यह ‘चौमुखा’ मंदिर भी कहलाता है । लेकिन अब केवल पश्चिम का द्वार ही खुला रहता है । मंदिर एक वर्गाकार 220 ग 220 फुट ऊंचे चबूतरे पर बना हुआ है । मंदिर की दूसरी और तीसरी मंजिल के गर्भ गृह में भी चार-चार जिन प्रतिमाएं प्रतिष्ठित है । मंदिर के चारों ओर चबूतरे पर एक ऊंची दीवार बनी हुई है । इसकी चार दीवारी के भीतर मुख्य देवकुलिका के चारों ओर 76 छोटी देवकुलिकायें/देवरिया हैं जिनमें जैन तीर्थंकरों आदि की मूर्तियां हैं । चार अन्य बड़ी देवकुलिकाएं हैं, इनके सामने विशाल रंग मंडप है। मंदिर में कुल 1444 श्वेत स्तंभ हैं जिनका शिल्प और अलंकरण एक दूसरे से भिन्न है । सभी पर अत्यंत शोभनीय रूपांकन उत्कीर्ण है । सभी स्तंभ पंक्तिबद्ध और समानान्तर हैं । ये स्तंभ इस ढंग से खड़े किये गये हैं कि मंदिर के किसी भी कोने से खड़े होकर मूलनायक की प्रतिमा को देखा जा सकता है । स्तंभों की ऊंचाई 40 फुट है । मुख्य चार मंडप मेगनाथ मंडप कहलाते हैं । यह अत्यंत भव्य एवं कलात्मक हैं । गर्भ गृह के निकट के तोरण का अलंकरण अत्यंत सूक्ष्म और सुन्दर है । रंग मण्डप के गुम्बद के घेरे के चारों ओर नृत्य करती हुई 16 पुतलिकाएं कलापूर्ण ढंग से उत्कीर्ण की गई हैं । यह मंदिर भूमितल से ऊपर तीन मंजिला है । तीनों मंजिलों तक पत्थर की सीढ़ियां से चढ़ा जा सकता है । मंदिर में कुल 44 शिखर, 24 मण्डप व 84 देहरियां हैं । मंदिर के नीचे 184 तलगृह/भूगृह हैं । आपत्तिकाल में यहां मूर्तियां रखी जाती थीं । प्रतिमाएं मकराना के संगमरमर और काले कसौटी के पत्थर की बनी हुई हैं । मंदिर निर्माण में सेवाड़ी व सोनाणा के पत्थर का प्रयोग हुआ है । त्रैलोकीय दीपक, चौमुखा मंदिर की विशालता और ऊंचाई अद्वितीय है । उसकी सजावट बहुत ही प्रभावशाली ढंग से की गई है । एक कहावत भी है - ‘देलवाड़ा की कोरणी नै रणकपुर की मांडणी’ अर्थात् उत्कीर्ण सौंदर्य के लिये आबू के देलवाड़ा मंदिर और रचना शिल्प हेतु रणकपुर का मंदिर अनुपम है । ऋषभदेव के मंदिर के पास ही पार्श्वनाथ का मंदिर है जो चौदहवीं शताब्दी में बना । इस मंदिर की बाहरी भित्तियों पर कामविलास करते युगलों की मूर्तियां उत्कीर्ण हैं । इन मूर्तियां के कारण इसे ‘‘पातरियों रौ देहरौ’’ कहते हैं । यों आदिनाथ के चौमुखे मंदिर में भी कुछ मैथुनरत मूर्तियां भी हैं । आसियां, किराड़ु आदि के मंदिरों में भी ऐसा अंकन हुआ है । ऐसी मूर्तियां शिल्पग्रंथों वृहत्संहिता, विष्णुधर्मात्तर पुराण, अग्नि पुराण आदि के अनुसार ही स्थापत्यीय अलंकरण के लिये बनाई गई हैं । सौन्दर्य, अनुभूति और उसकी अभिव्यंजना को अभिव्यक्त किया गया है । पार्श्वनाथ मंदिर से 150 मीटर दक्षिण में सूर्य मंदिर ऊंचे चबूतरे पर बना हुआ है । इसके गर्भ गृह के द्वार पर गणेश की मूर्ति है । इसके दोनों ओर नवगृहों की मूर्तियां हैं । द्वार के दोनों ओर की ताकों में सूर्य की मूर्तियां हैं । गर्भगृह में दो मूर्तियां- सूर्य व सूर्याणी की हैं । मंदिर का तल अष्टभद्र रचना वाला है । सूर्य की सभी मूर्तियां सात घोड़ों पर आरोहित हैं । उत्तर-पश्चिमी कोने में केतु के श्रमिक एक षड़भुजा देवी की मूर्ति है, जो नरवाहन पर आसीन है तथा उसके हाथों में कमण्डल, गदा, माला, शंख व चक्र है । एक हाथ खाली है । यह मंदिर पन्द्रहवीं शताब्दी का है, लेकिन इसका शिखर पुनः बाद में बना प्रतीत होता है । -35/224-25.
-सादड़ी से 6 मील दूर इतिहास प्रसिद्ध ‘राणपुर’ है जहां का प्रसिद्ध ‘चौमुखा जैन मदिर’ दर्शनीय है । यह मंदिर मेवाड़ के राणा कुंभा के राज्यकाल में धन्ना पोरवाल ने वि. सं. 1496 (ई. 1439) में बनवाया था । यह मंदिर कला व शिल्प का अतुलनीय भंडार है । चौमुखा मंदिर ‘त्रैलोक्यदीप बिहार’ भी कहलाता है । मंदिर में जैन तीर्थंकर आदिनाथ की पांच फुट की ऊंची चौमुखा मूर्तियों है । मंदिर की छतों में भी कई मूर्तियों है । नक्काशी भी बड़ी सुदर है । मंदिर 48000 वर्गफुट में बना हुआ है । इसमें कुल 1444 स्तंभ है लेकिन प्रत्येक स्तंभ पर एक दूसरे से भिन्न प्रकार की कोरणी है । मंदिर में 5 शिखर, 24 मंडप और 84 देहरियों है । मंदिर में 13 शिलालेख है जिसमें सबसे महत्वपूर्ण वि. सं. 1496 का संस्कृत भाषा में लिखा लेख है और जिनमें मेवाड़ के महाराणा की पीढ़ियां बप्पा रावल से महाराणा कुंभा’ तक की दी हुई है । इसके पास ही नेमीनाथ का मंदिर है जो ‘पातरियों रो देहरो’ कहलाता है क्योंकि इसमें कई काम-क्रीड़ा में रत युगलों की मूर्तियों है । इनके पास ही पार्श्वनाथ का मंदिर है । इसी से कुछ दूर सूर्य मंदिर है । इसमें नवग्रहों तथा सूर्य की कई मुर्तियां हैं । सूर्य की सभी मूर्तियां सात घोड़ों पर आरूढ़ है । -2/226
-यह मंदिर ‘चौमुखा’ है तथा इसका निर्माण श्रद्धालु पोरवाल जैन धरणाशाह द्वारा सं. 1433 में प्रारंभ किया गया था । भगवान आदिनाथ का मुख्य मूर्ति स्थल चारों दिशाओं के सम्मुख है । सारा भवन एक ऊंचे चबूतरे पर बना हुआ है । दीवार के भीतर
की ओर 76 कोठरियां हैं जो कि उत्कृष्ट शिल्प कला के नमूने है । हर एक कोठरी के ऊपर एक हल्की और सुंदर घुमटी है । घुमटियों की बड़ी कतार के पीछे, बीच और चारों ओर के मंदिर पर पांच बड़े-बड़े शिखर हैं । रणकपुर के इस जैन मंदिर का क्षेत्रफल लगभग 48400 वर्ग फीट है । इसमें 84 बड़े कमरे हैं । इनमें 1444 स्तम्भ हैं तथा इन स्तम्भों में कोई भी दो स्तम्भ एक प्रकार के नहीं है । मंदिर का मुख्य द्वार पश्चिम में है तथा चारों दिशाओं में चार दरवाजे हैं । संगमरमर से निर्मित इस मंदिर के नीचे तहखाने हैं । इसकी नींव 35 फीट गहरी है जो सप्त धातु से भरी गई है जिससे इस पर कोई कुप्रभाव न डाल सके । मंदिर का भवन 36 सीढ़ियों की ऊंचाई पर तीन मंजिल में स्थित है अपनी बनावट में यह मंदिर 198 फीट लम्बा व 205 फीट चौड़ा है । संवत् 1443 में प्रारंभ हुआ निर्माण कार्य 65 वर्षों तक चलता रहा । सिद्धहस्त कारीगरों द्वारा बेहतरीन नक्कासी व मूर्तियां तराशने का काम किया गया है । संवत् 1498 में इस मंदिर में प्राण फूंके गये - प्रथम तीर्थंकर की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करके । कहा जाता है कि इसके निर्माण कार्य के लिये 1500 कारीगर व 2700 श्रमिकों ने प्रति दिन कार्य किया । इसके निर्माण में कुल 99 लाख स्वर्ण मुद्राएं काम आई । जैनियों के आदि तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव को समर्पित इस जैन मंदिर में मोमबत्तियों से ही उजाला किया जाता है । बल्ब जलाना पूर्णतः निषिद्ध किया हुआ है । पीढ़ियां से मंदिर की पूजा एक ही परिवार में है । आरती के समय दो विशालकाय घण्टे, जिनमें से एक पुलिंग व दूसरा स्त्रीलिंग के नाम से जाना जाता है, बजाये जाते हैं, जिनका निनाद लगभग पांच किलोमीटर तक सुनाई देता है । प्रत्येक घण्टे का वजन 160 किलोग्राम है । मंदिर के गुम्बदों पर पीतल की जंजीरों की सहायता से लटकी सैकड़ों घंटियां व नूपुर की ध्वनि चित्ताकर्षक है । यह मंदिर जैन व हिन्दू शिल्पकला का अनूठा संगम है । इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर भगवान राम के अद्भुत कुत्यों व बाल कृष्ण की लुभावनी लीलाओं को अंकित किया गया है । इसके अतिरिक्त अनेक प्रतिमाओं की कामोत्तेजक भंगिमाएं खजुराहो की प्रस्तर कला व वैभव के शिव मंदिर का स्मरण कराती है । हर प्रतिमा के अपने अलग हाव-भाव हैं । छत पर तराशा हुआ संगमरमर कल्पवृक्ष के पत्ते के रूप में छत पर अधर लटका हुआ है । इस पत्ते पर ‘‘ओ३म’’ तराशा हुआ है । पास ही खम्भे पर एक अत्यंत साधारण मूर्ति बनी हुई है जिसके नीचे लिखा है ‘‘दीपा कारित’’ । यह वही भक्त है जिसके मस्तिष्क ने इस मंदिर का प्रारूप तैयार किया था । किंवदंती है कि शिल्पी दिपाकारित ने अपने आराध्यदेव शिव से स्वप्न में मिली प्रेरणा से इस पावन स्थल का चयन कला की दृष्टि से एक अद्वितीय मंदिर बनाने के लिये किया । दिपाकारित के इस स्वप्न को साकार करने के लिये महाराणा कुम्भा के जैन मंत्री धरणाशाह ने उसे अपार धन उपलब्ध कराकर तथा अपूर्व सहयोग देकर, एक सुन्दर मंदिर बना कर पूरा किया । यही कारण है कि मुख्य रूप से जैन मंदिर होते हुए इसमें हिन्दू देवताओं के साथ-साथ जैन तीर्थंकरों का रहवास है । -35/269-70.

नाडोल

 -नाडोल में नेमीनाथ के अलावा शांतिनाथ व जिन पद्मप्रभु के मंदिर हैं । जिन पद्मप्रभु का मंदिर तीनों में सबसे बड़ा है । यह मंदिर 11वीं शताब्दी का है तथा इसके मूल प्रासाद व गूढ़ मण्डप पूर्णतया अलंकृत है । मूल प्रासाद के पीठ में अश्वधर के अलावा गजधर व नरधर हैं । इसका शिखर 17वीं शताब्दी में पुनः निर्मित हुआ था । यहां भण्डारी ओसवाल जाति की कुलदेवी ‘आशापुरी का मंदिर है । यहां प्रतिवर्ष मेला भरता है । नाडोल के नीलकण्ठ, सोमेश्वर व चारभुजा के मंदिर दसवीं शताब्दी में बने थे । सोमेश्वर मंदिर की जांघ पर सुंदर मूर्तियां बनी हुई हैं । नीलकण्ठ सोमेश्वर के मंदिरों में अधिकांश अलंकरण लहर वल्लरी, पद्य, गवांश आदि के रूपांकन द्वारा हुआ है । नाडोल के पास ही नारलाई के 11वीं शताब्दी के जैन मंदिर के गर्भ गृह के सामने अन्तराल, चतुस्तंभ, मण्डप और मुख  चतुष्टी है । मूल प्रासाद पर शिखर बना हुआ है । मण्डोवर सादा है लेकिन मंडप के खम्भों पर सुंदर अलंकरण हैं । इनमें घटपल्लव और लहरवल्लरी का रूपांतरण बड़ा कलात्मक है । -35/223.

महल

-1. मकान, घर । 2. कोई बड़ा भवन या राज प्रासाद । 3. देवालय, मंदिर । 4. रनिवास, जनानखाना । 5. स्थान, जगह । 6. अवसर, मौका । -33/347
-जोधपुर नगर के उत्तर पश्चिम में ‘सूर सागर के महल’ तथा ‘तलहटी के महल’ हैं । ये सत्रहवीं व अठारहवीं शताब्दी में बने थे । -35/221.

तोरण स्तंभ

 -जोधपुर के निकट मण्डोर के भग्न दुर्ग से दो तोरण मिले हैं जो किसी वैष्णव मंदिर के, जो गुप्तकाल में बना ज्ञात होते हैं । प्रत्येक स्तंभ 12 फुट लंबा है । प्रत्येक स्तंभ में 5 भाग हैं । एक स्तंभ में कृष्ण गोर्धन पर्वत उठाये एक अभिलेख, एक में यसोदा दही मंथन करती, एक में संकट भंग लीला व बाल कृष्ण यसोदा के साथ सोते दिखाये गये हैं । दूसरे स्तंभ में धेनुका वध, कालिया मर्दन व प्रलंबन वध, कृष्ण एक राक्षस को मारते व केशी वध करते दिखाया गया है । दोनों स्तंभ राजकीय संग्रहालय में हैं । -35/223.

उम्मेद भवन

-बीसवीं शताब्दी के आरंभ (1929-1942) में तत्कालीन महाराजा उम्मेदसिंहजी ने जोधपुर नगर के दक्षिण पूर्व में छीतर पहाड़ी पर एक विशाल राजमहल ‘उम्मेद भवन’ जो 195 मीटर लंबा और 103 मीटर चौड़ा भवन बनवाया । इस महल में कुल 203 कमरे हैं । इस भवन का निर्माण पत्थर पर कलात्मक खुदाई करवा कर किया गया है । इसका गुम्बद बहुत ही बड़ा तथा कलात्मक है । महल में महाराजा उम्मेदसिंह व इनके उत्तराधिकारी रहते आये हैं । इससे पूर्व (1942) राजपरिवार राईकाबाग राजमहल व इसके पूर्व रातानाडा के महलों में रहते थे ।     -35/221.

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