ढोल नृत्य

   -विवाह आदि मांगलिक अवसरों पर किया जाने वाला जालोर का ढोल नृत्य राजस्थान का एक प्रमुख लोकनृत्य  है । प्रायः सरगरा, ढोली और भील जातियों द्वारा किया जाने वाला यह नृत्य प्ररूष प्रधान नृत्य है । इस नृत्य में एक कलाकार दो-तीन ढोल अपने शरीर पर रखकर उन्हें बजाता है और कई कलाकार एक साथ मिलकर कई ढोल बजाते हैं । किवदंती है कि जब जालोर बसा था उन्हीं दिनों सिवाणा गांव के खींवसिंह राठौड़ का सरगरा जाति की युवती से प्रेम हो गया और वह सिवाणा छोड़कर जालोर आ गया । यहां आकर खींवसिंह ढोल बजाने लग गया और जालोर का ढोल नृत्य प्रसिद्ध हो गया । जब एक वादक तीन ढोल एक साथ रखता है, तब वह एक अपने सिर पर रखता है, एक सामने की तरफ और एक पीछे रखता है । इन्हें रस्सी से इस तरह बांध दिया जाता है ताकि नर्तक को नाचने और वादन में परेशानी न हो और ढोल खुले नहीं । ढोल लय वादन के साथ नृत्य का यह दृश्य गति और जोशीली भाव-भंगिमाएं प्रस्तुत करती हैं ।                                            -26/26.

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बम नृत्य

-यह नृत्य अलवर भरतपुर क्षेत्र में प्रचलित है । इस नृत्य मेें मुख्य वाद्य एक बड़ा नगाड़ा होता है, जिसे स्थानीय
बोली में ‘बम’ कहते हैं और इसके वादन के साथ किया जाने वाला नृत्य बम नृत्य कहलाता है । यह नगाड़ा आकार में
सामान्य से बहुत बड़ा होता है, जिसे अलवर में ‘टामट’ या ‘टामक’ कहा जाता है जिसकी ऊंचाई लगभग ढाई से तीन फुट
और व्यास लगभग दो-ढाई फुट होता है । इसे दो व्यक्ति अपने दोनों हाथों से मोटे-मोटे डंडों से बजाते हैं । होली के
अवसर पर खेतों में फसल पक जाने की खुशी में यह नृत्य गांव की चैपाल में रात में आयोजित किया जाता है । इस नृत्य
में कई बार दो-तीन बम भी बजाये जाते हैं । यह नृत्य पुरूषों द्वारा किया जाता है । नाचने वाले पुरूष तीन भागों में बंटे
होते हैं । एक समूह नगाड़ा/बम और उसके साथ अन्य वाद्य जैसे थाली, ढोलक, मजीरा आदि बजाने वालों का होता है ।
दूसरे समूह के लोग वाद्य कलाकारों के पास ही रंग-बिरंगे कपड़ों और चमकीली गोटा-किनारी वाले पंखे और छडि़़यां लिये
होते हैं । तीसरा समूह ‘बम’ के सामने आकर नृत्य करने वालों का होता है । ये नृर्तक अपनी धुन में मस्त बम की चोटों के
साथ नृत्य करते हैं । -26/25

 

भवाई नृत्य

 -लोकनृत्य के रूप में प्रसिद्ध ‘भवाई’ के आरंभिक रूप में कलाकार अपने सिर पर एक के ऊपर एक कई मटके
रखकर नाचता था और अपने शरीर का सुतुलन बनाये रखता था । धीरे धीरे प्रदर्शन में अधिक प्रभाव उत्पन्न करने के लिये
शारीरिक संतुलन की अन्य क्रियायें जुड़ती गईं । सिर पर मटकों को साधे हुए तलवार पर खड़े होकर थिरकना, कांच की
गिलासों के साथ पदचापें भरना, थाली पर खड़े होकर नृत्य करना, कांच के टुकड़ों पर नाचना आदि अनेक क्रियायें भवाई
नृत्य में शामिल होती गईं । वर्षों तक महिलाओं के लिये वर्जित इस नृत्य में अब महिलाएं भी कौशल अर्जित कर चुकी हैं ।
भवाई जाति ने अपनी महिलाओं को इस नृत्य से दूर रखा, लेकिन व्यावसायिक सफलता ने अन्य जाति की महिलाओं को इस
ओर आकर्षित किया और अब ‘भवाई’ नृत्य के अधिकांश प्रदर्शनों में महिलाओं की भागीदारी और मांग रहती है । -26/22.

 

चंग नृत्य

 -शेखावाटी क्षेत्र में होली के अवसर पर किया जाने वाला ‘गींदड़’ नृत्य की तरह ही ‘चंग’ नृत्य भी शेखावाटी की
विशेष पहचान है । मृख्यत‘ पुरूषों द्वारा किया जाने वाला ‘चंग नृत्य’ कभी-कभी रोचकता बढ़ाने के लिये कुछ पुरूषों द्वारा
महिलाओं का रूप धारण करके भी किया जाता है । इस नृत्य में प्रत्येक कलाकार अपने चंग के साथ होली गीत गाते हुए
वृत्ताकार नृत्य करता रहता है । बीच-बीच में सभी कलाकार घेरे के बीचों-बीच एकत्र होकर होली गीत गाने लगते हैं और
पुनः नृत्य करने लग जाते हैं । कलाकार धोती या चुड़ीदार पायजामा और कुर्ता या कमीज और सिर पर साफा पहनते हैं ।
कमर में कमरबंध के रूप में बड़ा रूमाल या अंगौछा और पैरों में घुंघरू बांधते हैं । नृत्य में चंग की थाप के साथ ढोलक,
मंजीरा और बांसुरी आदि वाद्य-वादन संगति में बजाये जाते हैं । -26/24.

वालर नृत्य

-यह गरासिया जन जाति का एक लोकप्रिय नृत्य है । इस नृत्य के दो प्रकार हैं- एक में केवल महिलाएं ही भाग लेती हैं जबकि दूसरे में पुरूष व महिलाएं दोनों ही भाग लेते हैं ।  यह नृत्य आदिवासी भीलांे के ‘घूमरा’ नृत्य से मिलता-जुलता है ।  महिलाएं जब यह नृत्य करती हैं तो इसके साथ किसी प्रकार का वाद्य नहीं बजाया जात है जो धीमी गति में लयात्मक अपने गीतों के साथ किया जाता है । पुरूष और महिलाओं द्वारा सम्मिलित किये जाने वाले नृत्य में ढोल वाद्य वादन किया जाता है । नृत्य के समय कभी-कभी महिलाएं अपने सिर पर फूल-पत्तियां बांध लेती हैं और पुरूष तीर-कमान या तलवार अपने हाथों में थामे रखते हैं । बीच-बीच में वे किलकारियां और अन्य आवाजें भी निकालते रहते हैं । यह नृत्य अर्द्ध-वृत्ताकार होता है, लेकिन कई बार नृत्य करते समय नर्तक एक गोल घेरा बना लेते हैं । एक दूसरे के पीछे दो अर्द्धवृत्त होते हैं जिसमें बाहर के अर्द्धवृत्त में पुरूष तथा भीतर की तरफ महिलाएं होती हैं । नृत्य के आरंभ में एक पुरूष गाने की शुरूआत करता है और उसके साथ सम्मिलित स्वर मिलातेे हुए अन्य पुरूष नृत्य आरंभ कर देते हैं । स्त्रियां पुरूषों द्वारा गीत की पंक्ति पूरी होने से एक मात्रा पहले गायन शुरू कर देती हैं और यही क्रम गाने में स्त्रियां और पुरूषों का रहता है । गीत और नृत्य के साथ तालियां, पद-संचालन, नृतकों का आपसी कंधे पर हाथ रखकर अथवा गले में बांह डालकर अपने आनंद और उत्साह की अभिवृद्धि की जाती है ।      -26/16-7.

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