गवरीदेवी

-‘.....बाल्यावस्था में ही उनका विवाह हो गया था । जोधपुर में ही ससुराल था किन्तु उस समय वे अपनी माताजी के साथ बीकानेर रहती थीं । यों माताजी का मूल निवास जोधपुर ही था किन्तु उनको बीकानेर के महाराजा ने अपने राज्य में बुला लिया था । वहीं गवरीदेवी का बाल्यकाल गुजरा । बाल्यकाल में उन्हें संगीत में कतई प्रवेश नहीं करने दिया गया । जोधपुर के जिस परिवार में विवाह हुआ था वो एक जागीरदार थे और उस घर में भी अपनी सामाजिक परिस्थिति के कारण गायन का काम नहीं था । दुर्भाग्य से गवरीदेवी का यह विवाहित जीवन बहुत वर्षों तक नहीं चला । वैधव्य के पश्चात ही उन्होंने अपनी माताजी से गायन सीखना प्रारंभ किया । अपनी भुवा के साथ भी गाने का क्रम चला ।.......सन् 52-53 की बात है जब मैंने (कोमल कोठारी) व बिज्जी ने एक कवि सम्मेलन, एक प्रदर्शनी और एक लोकसंगीत का त्रि-दिवसीय कार्यक्रम आयोजित किया था । लोकसंगीत का कार्यक्रम जोधपुर के आनंद थियेटर में सम्पन्न हुआ था । माननीय न्यायाधीश श्री वांचू ने उसका उद्घाटन किया था । वो पहला मौका था जब गवरीदेवी ने घूंघट में रंगमंच पर बैठकर संगीत की पूजा की थी । -16/183-5.


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