पीठमरद

-1. नायक के वार सखाओं में से एक । 2. कुपित नायिका को प्रसन्न करने वाला नायक । 3. वेश्या को नृत्य सिखाने वाला उस्ताद, नृत्य शिक्षक ।  -33/77.

रामप्रकाश रंगमंच

 -जयपुर के महाराजा रामसिंह जिन्हें अपने मात्र 47 वर्ष के जीवन में जयपुर को सुंदरतर और आधुनिक सुविधाओं से परिपूर्ण बनाने के लिये एक-एक कर मूर्त रूप दिया । कलकत्ता में ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा स्थापित ‘स्टार थियेटर’ से उन्हें अपने नगर में ‘‘रामप्रकाश’’ नाटकघर बनाने की प्रेरणा ली, जो उनकी मृत्यु से कोई दो वर्ष पूर्व ही 1878 में बनकर तैयार हुआ । महाराजा की इच्छा थी कि जयपुर की जनता के लिये ऐसा प्रदर्शन गृह या रंगमंच बन जाए, जिससे नाटक की विधा की प्रगति के साथ साथ मनोरंजन एवं शिक्षण भी हो । रामप्रकाश में एक संगमरमर की फलक पर देवनागरी, अंग्रेजी और उर्दू में यही प्रयोजन उत्कीर्ण है-
       ‘‘यह नाटक भवन हसबुल हुकम आलीजनाब सरामद राजहाय हिन्दुस्थान राज राजेन्द्र श्री महाराजाधिराज श्री सवाई रामसिंह जी बहादुर, नाइट ग्रंेड कमांडर आफ दि मोस्ट एक्जाल्टेड आॅर्डर आॅफ दि         स्टार आॅफ इण्डिया । मशीर सलतनत कैसर हिन्द कम्पेनियन आॅफ दि आॅर्डर आॅफ दि इंडियन एम्पायर वास्ते तरक्की इल्म नाटक व खुशी व नसीहत आम रिआया जैपुर के सन् 1878 ई. संवत् 1934         में तामीर व नसीब हुआ ।’’
जयपुर वालों के लिये रामप्रकाश का रंगमंच, जो स्टार थियेटर की ही प्रतिकृति था, तब किसी अजूबे से कम न था । ओखली में पोटाश के धमाके के साथ जब रामप्रकाश का पर्दा उठता, तो सारा नाटकघर संगीत से मुखरित हो जाता और प्राकृतिक दृश्यों तथा महलों-मंदिरों की चित्रकला से अलंकृत परदों की पृष्ठभूमि में जब मंच पर पात्र आकाश से अवतरित होते या पृथ्वी से अकस्मात् प्रकट हो जाते, तो दर्शक देख कर दंग रह जाते । नाटक देखने का तब लोगों पर ऐसा नशा छा गया था कि इक्के-तांगेवालों ने अपने टट्टू बेच दिये, भिश्तियों ने अपनी मशकें और पखालें । घरों में ताले ठोक कर लोग नाटक देखने के लिये तीन-तीन, चार-चार घण्टे रामप्रकाश में जा बैठते तो पीछे से ताले टूट जाते । वैसे जयपुर का गुणीजनखाना तब कलावंतों की खान था, फिर भी महाराजा रामसिंह ने इस रंगमंच को नाट्यकला और साधनों की दृष्टि से परिपूर्ण और नवीनतम बनाने हेतु बम्बई की पारसी थियेट्र्किल कम्पनी के कलाकारों को यहां बुलाकर स्थानीय कलावंतों को उनके प्रशिक्षण में ‘इन्द्रसभा, गुलाबकावली, शीरी-फरहाद, लैला-मजनूं, हीर-रांझा, बद्रेमुनीर, बेनजीर और हवाई मूजनिश जैसे नाटक मंचित करने के लिये तैयार किया गया । देखते ही देखते रामप्रकाश की मंचसज्जा, अन्य उपकरण, आॅर्केस्ट्््र्र्ा और कलाकारों की टोली सब ऐसे हो गये कि तत्कालीन राजपूताना में ही नहीं, समूचे उत्तरी भारत में कोई मुकाबला न था ।...... यह सचमुच रामप्रकाश का ही कीर्तिमान था कि यहां 1880 में तवायफें ही नाटकों में विभिन्न भूमिकाओं का अभिनय कर वाहवाही लूट रही थी । फिल्मी गीतकार हसरत जयपुरी की मां की दादी चन्दाबाई सौरांेवाली थी, जो सब्जपरी की भूमिका करती थी। उसकी पोती फिरदौसी बेगम ने मुझे (डाॅ. श्रीमती चन्द्रमणिसिंह) बताया था कि महाराजा रामसिंह ने ग्रीन रूम में जाकर स्वयं उसके पंख लगाकर मेकअप कराया था और उसे ‘‘मौलाना’’ कहकर संबोधित करते थे । घाट दरवाजे के पास नवाब के चैराहे पर रहने वाली दो बहिनें -नन्हीं और मुन्ना लश्करवाली के शहर में बड़े प्रशंसक थे । रामप्रकाश के मंच के दोनों ओर इन दोनों बहिनों के चित्र दीवार पर अंकित थे ।.........1880 ई. के आरंभ में उदयपुर के महाराणा सज्जनसिंह पूरे एक सप्ताह तक महाराजा रामसिंह के मेहमान थे और हवामहल में ठहरे थे । इतिहासकार कविराजा श्यामलदास साथ थे जिन्होंने जयपुर प्रवास के सात दिनों की पांच रातों को महाराणा के साथ रामप्रकाश में नाटक ही देखे थे । अपने ‘वीर- विनोद’ में कविराजा ने लिखा है- ‘‘पहली जनवरी को दोनों अधीश एक बग्घी में सवार होकर रामनिवास बाग में पाठशाला के विद्यार्थियों का जत्था देखने गए.......रात्रि के समय दोनों अधीशों ने मय सभ्यजनों के नाटकशाला में पधार कर जहांगीर बादशाह का नाटक देखा (शायद अनारकली) । ‘यह नाटकशाला इन्हीं महाराजा साहब ने बड़े खर्च से बनवाकर बम्बई में पारसी वगैरह शिक्षित मनुष्यों को बुलवाया और स्त्रियों की जगह जयपुर की वेश्याओं को तालीम दिलवाकर तैयार करवाया । इस नाटक में वस्त्र, भूषण वगैरह सामग्री समयानुसार और बोलचाल पठन-पाठन सभी बातें अद्भुत और चरित्र की सभ्यता दिखाने वाली थी । परियों का उड़ना, पहाड़ों व मकानों की दिखावट और फरिश्तों का जमीन व आकाश से प्रकट होना देखने वालों के नेत्रों को अत्यंत आनंद देता था । मैंने ऐसा नाटक पहले कभी नहीं देखा ।’’ वीरविनोद के अनुसार महाराणा ने दूसरे दिन ‘‘बद्रेमुनीर’’ और ‘‘बेनजीर’’ नाटक देखे । 4 जनवरी की रात ‘‘अलादीन और अजीब व गरीब चिराग’’ का नाटक हुआ और 5 जनवरी को ‘‘हवाई मजलिस’’ । 6 जनवरी को दोनों अधीशों का मिलन हुआ और रात के समय ‘‘लैला- मजनूं’’ का नाटक देखा, जहां तुकोजीराव होल्कर, इन्दौर के ज्येष्ठ और कनिष्ठ पुत्र भी नाटक देखने में शरीक हुए।‘         -25/272-4.

जैसलमेरी रम्मतें

- जैसलमेर की रम्मतों का विकास उस क्षेत्र में प्रचलित प्रेमपरक लोकाख्यानों के प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि पर हुआ है । ‘मूमल महेन्द्र’ की प्रेम कथा इस क्षेत्र में जोकजीवन के रग-रग में बसी हुई है । प्रारंभ में कृष्ण-भक्ति रास के रूप में, स्वांग के रूप में तथा बाद में श्रृंगार प्रधान छोटी रम्मतें मशालों की रोशनी में चैक-चैगानों में खेली जाने लगी । इस पृष्ठभूमि में पौराणिक, धार्मिक और ऐतिहासिक कथानकों वाली रम्मतों का विकास हुआ । कुछ कलाकारों ने इसे पेशे के रूप में भी अपनाया, जबकि अधिकांश लोग शौकिया तौर पर इनमें भाग लेते थे । शुरू-शुरू में जैसलमेर के ब्राह्मणों द्वारा रम्मतें लिखी और प्रदर्शित की गईं, लेकिन धीरे-धीरे अन्य जाति केे लोगों ने रम्मतें लिखना, खेलना और अपने अखाड़े बनाना शुरू कर दिया । सिलावटों द्वारा खेली जाने वाली ‘मस्तान परी की रम्मत’ बहुत प्रसिद्ध थी । जैसलमेर की रम्मतें बसंत ऋतु के आरम्भ से शुरू होकर अक्षय तृतीया तक चलती हैं । खुले चैक में पाट रखकर खुला मंच बना लिया जाता है । इसके ऊपर राजा-रानी और अन्य मुख्य पात्रों के बैठने के लिए एक आसन बना दिया जाता है । अन्य पात्र इनके पास नीचे बैठते है। टेरियों के लिये मंच के पासदरी बिछाकर बैठने की व्यवस्था की जाती है । रम्मत के सभी कलाकार प्रदर्शन से पूर्व अपनी जगह से उठकर मंच पर आते हैं और गायन व नृत्य के साथ अपना परिचय देते हैं । कलाकारों की वेशभूषा पात्रों के अनुसार होती है । महिला की भूमिका पुरूष ही निभाते हैं । जैसलमेर की रम्मतों का मुख्य अखाड़ा ‘राम अखाड़ा’ था, जिसे ‘तेज अखाड़ा’ भी कहते थे । इसके मुख्य उस्ताद कवि तेज थे । खेल के बीच में बहुरूपियों के मंच पर आकर हास्य-व्यंग्य प्रस्तुत करने की परिपाटी भी जैसलमेर की रम्मतों में देखी जाती है । प्रकाशित रम्मतों में मूमल-महेन्द्रा, छैला-तंबोलन, नैना खसम, गांधीजी का खेल, राजा जोग भरतरी और सती-सावित्री प्रमुख हैं । इन रम्मतों में लोक प्रचलित धुनों एवं रागों का प्रयोग होता है । इनमें ढोलक, तबला, झांझ, हारमोनियम और चिमटा आदि वाद्यों का प्रयोग होता है । तेज कवि इन रम्मतों के प्रसिद्ध लेखक और उस्ताद हुए हैं । इनके अलावा सगतमलजी, तेजमाल बिस्सा, प्रेमराज शर्मा, जुगलकिशोर जगानी, परमानंद सेवग, मोतीलाल, लच्छीराम और रूपाराम आदि जैसलमेर की रम्मत के कई लेखक और कलाकार हुए हैं । रम्मतों में पौराणिक, ऐतिहासिक और श्रृंगारिक रचनाओं के साथ-साथ सामाजिक उद्देश्यपरक रचनाएं भी प्रस्तुत की जाती थीं । इसी तरह की रम्मतें फलोदी और पोकरण में भी खेली जाती हैं । इन रम्मतों की मुख्य विशेषता यह है कि इनमें रंगमंचीय साज-सज्जा नहीं होती है । -26/52.

नौटंकी

-उत्तरप्रदेश के कानपुर और हाथरस तथा राजस्थान के धौलपुर, भरतपुर और डीग नौटंकी के प्रमुख प्रदर्शन स्थल रहे हैं । राजस्थान की नौटंकी हाथरसी नौटंकी से प्रभावित रही
है । राजस्थान में नौटंकी के प्रचलन का श्रेय डीग निवासी भुर्रीलाल को दिया जाता है । भुर्रीलाल पहले हाथरस में मुरलीधर हरनारायण की मंडली में काम करते थे । ये दोनों सम्पन्न व्यापारी थे, तथा शौकिया तौर पर नौटंकी करते थे । इन्होंने कई नौटंकी ख्याल लिखे और उनमें अभिनय किया । नौटंकी का रंगमंच खुले स्थान पर बनाया जाता है । यह कुछ पाट या तख्त डालकर तैयार कर दिया जाता है । इसके चारों ओर दर्शक बैठ जाते हैं । नौटंकी के ख्याल को अलग-अलग राग-रागनियों में गाया जाता है । इनमें ललित कालिंगड़ा, भैरवी, मालकौंस तथा ध्रुपद मुख्य हैं । नौटंकी के अभिनेता अच्छे गायक भी होते हैं । गाते समय तालवाद्य बंद रहता है तथा गीत की अंतिम चरण समाप्त होते ही नक्कारा बजता है । नौटंकी में वाद्य वादक विभिन्न प्रकार की लयकारियां बजा कर दर्शकों का मनोरंजन करते हैं । मंगलाचरण से नौटंकी का प्रारंभ होता है । इसके बाद रंगा/सूत्रधार नौटंकी का परिचय देता है । वह बीच-बीच में मंच पर उपस्थित होकर कथा के सूत्र जोड़ता है । नौटंकी में बेहरेतबील, दोहा, बेहरे शिकस्त, लावणी, कड़ा, देाबोला, चैबोला, कव्वाली, गजल, दादरा, ठुमरी आदि गेय छंदों की प्रधानता होती है । कामां के गिरिराज किशोर राजस्थान की नौटंकी के प्रसिद्ध अभिनेता माने गये हैं ।    -26/61.
-दिन में पास के ही गांव के हरिजन हरिभजन से मिलना हुआ । ये पहिले नौटंकी में जनाना भूमिका करते थे । इन्हें नौटंकी की और अन्य कथाएं याद हेैं । इन्होंने हमें ‘माचिस की तीली’ के आघात लय से हीररांझा, निहालदे, बारहमासा व कुछ भजन के नमूने सुनाये । लय व ताल की अच्छी पकड़ । इनकी अपनी मंडली है मौजपुर गांव में जो यहां से 3 मील की दूरी पर है । इनमें ‘जहार’ की गीत-गाथा गाने की परंपरा है जो वाद्य ‘डेरू’ और ‘थाली’ पर गाते हैं । ये झंडा भी फेर कर घुमाते हैं । -28 अप्रैल , 1983 लक्ष्मणगढ़, अलवर । 
 

       

रासलीला

 -श्रीकृष्ण की रास क्रीड़ा का अभिनय । 2. श्रीकृष्ण व गोपियों का रास नृत्य । -33/481.
-सगुण भक्ति की दोनों धाराओं- रामभक्ति और कृष्णभक्ति में क्रमशः राम और कृष्ण की लीलाओं अर्थात् उनके लोकहितकारी और लोकरंजक कार्यों के वर्णन और अनुकरण को भक्ति का महत्वपूर्ण भाग माना गया है । यहां भगवान की लीलाओं के नाटकीय प्रस्तुतीकरण को भारतीय जनमानस में भक्ति की उच्च भावभूमि से जोड़कर देखा जाता है । कहा जाता है कि चैतन्य महाप्रभु स्वयं नाट्य-प्रदर्शन किया करते थे और उन्होंने रूक्मिणी हरण नामक नाटक में रुक्मिणी की भूमिका निभायी थी । उनकी प्रेरणा से राय रामानन्द राय ने जगन्नाथ-वल्लभ नामक नाटक की रचना की थी । ‘रासलीला’ अपने प्रचलित अर्थ में कृष्ण के जीवन और कार्यों से संबंधित नृत्य और अभिनय का द्योतक शब्द है । रासलीला के उद्भव से पूर्व जैन रासकों की परंपरा 16वीं शताब्दी तक चलती रही थी । सत्रहवीं शताब्दी में कृष्णभक्ति से संबंधित एक नाट्य शैली विकसित होने लगी थी, जिसे नन्ददास और श्रीवियोगी हरि आदि कवियों ने रासलीला के रूप में परिष्कृत स्वरूप प्रदान किया । राजस्थान के नाथद्वारा, कांकरोली आदि स्थानों पर अयोध्या, मथुरा, वृन्दावन आदि से प्रेरित कृष्ण भक्ति की परंपरा शुरू हुई । इसके अंतर्गत भगवान को जगाना, स्नान कराना, झूलाना, भोग लगाना, सुलाना आदि नित्य क्रियाओं के रूप में कृष्ण भक्ति की शुरूआत हुई । इसी से आगे बढ़कर कृष्ण के भजन-कीर्तन और अनेक भावाभिव्यक्तियां विकसित हुईं । भक्त सूरदास, माधोदास, नंददास, मीरां आदि के पदों को गाते समय प्रातः भावपूर्ण मुद्राओं में नृत्य भी करने लगते थे । फिर भक्तों द्वारा विभिन्न रूप धरकर कृष्ण की पूजा की जाने लगी । ये नृत्यगीत और रूप-वेश धारण ही रासलीला की आधारशिला बने । वल्लभाचार्य ने गीतिनाट्य के रूप में रासलीला को प्रचारित-प्रसारित किया । उगारियावास गांव के निवासी शिवलाल कुमावत ने लोकजीवन में रासलीला को लोकप्रिय बनाया । इन्होंने संगीत और ताल के साथ राग-रागिनियों को निबद्ध करते हुए नृत्य के साथ उनका संयोजन किया । रासलीला में मुख्य रूप से कृष्ण की विभिन्न लीलाएं प्रदर्शित की जाती हैं । पहले मूस रास प्रस्तुत किया जाता है, जिसमें कृष्ण-राधा की झांकियां होती हैं । धमार पर कृष्ण-राधा और गोपियां नृत्य करते हैं । तत्पश्चात् कृष्ण-चरित की विविध झांकियां प्रस्तुत की जाती हैं। इसमें भाग लेन ेवाले अभिनेता ‘स्वरूप’ कहलाते हैं । राजस्थान में फुलेरा, जयपुर, बोरास, हरदोणा,गुढ़ा आदि रासलीला के प्रमुख केन्द्र रहे  हैं । -26/48-9.
 

   


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