कन्यादान

: -कन्या का विवाह या दान । दहेज । गऊदान । -32/195.
-सनातनी शास्त्रीय विवाह पद्धति अत्यंत सूक्ष्म एवं पारंपरिक विधि है । इसमें गोत्रोच्चार, कन्यादान एवं प्रतिग्रहण, अग्नि प्रदक्षिणा, सप्तपदी आदि महत्वपूर्ण अंग है । पुरोहित द्वारा इनका संपादन करवाया जाता है । मेवाड़ी भाषा में गोधुलि लग्न के लिये ‘गुदलक्या’ तथा अग्नि प्रदक्षिणा के लिये ‘भांवरे’ तथा ‘फेरे’ शब्द लोकप्रिय हैं । राजकुल परिवार में हस्त विमोचन के समय कुंवरी के पिता महाराणा स्वयं उपस्थित होते हैं । महाराणा कुंवरी के विवाह में संपूर्ण विराजते थे । यदा कदा ऐसा संभव नहीं होता तो भी ‘हथलेवे के दस्तूर’ एक गाय सींंचने के लिये पधारना लाजिमी था । अन्यान्य भौतिक उपादनों यथा आभूषण, नकद, मकान, जमीन तो दी ही जाती है तथापि भारतीय विवाह में कन्यादान के साथ गोदान का विशेष महत्व है । -1/51.
-देखें विवाह विधि विधान ।

कन्यावळ

-कन्या के विवाह के दिन पाणिग्रहण होने तक रखा जाने वाला व्रत । कन्यादान ।  -32/195.

हथमेळौ

-देखें ‘हथलेवौ’ ।

हथलेवौ

 -विवाह में वधू का हाथ वर के हाथ में पकड़ाने की क्रिया, रश्म, पाणिग्रहण संस्कार । 2. इस अवसर पर गाये जाने वाला लोगीत । 3. इस अवसर पर वधू पक्ष की ओर से वधू को दी जाने वाली भेंट । 4. हाथ पकड़ने की क्रिया या भाव । -33/882.
-देखें विवाह विधि विधान ।

सास्वत

-1. नित्य, हमेश । 2. अमिट, स्थाई । 3. अनादि, सनातन । -पु. 1. शिव, महादेव । 2. स्वर्ग, बैकुंठ । 3. वेदव्यास । -33/774. 

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