ऊंछाळ

 -न्यौछावर करना ।
-मेवाड में महारणा के कहीं पधारने पर घर का मुखिया और निकट संबंधी महाराणा के नछरावलें करते थे । समृद्ध मेजबान महाराणा पर रुपयों की ‘ऊंछाळ’़ भी करता था । अपने उल्लास की पराकाष्ठा स्वरूप मेजबान लाल मखमल से परिवेष्टित छोटी-छोटी टोकरियों में चांदी के रूप में रखता है, जिन्हें दोनों हाथों से महाराणा के पांवों की तरफ ऊंछाळ/फेंक कर अपनी प्रसन्नता का इजहार करता है । -1/62.

रोवणियों का नोहरा

 -जोधपुर जूने शहर पनाह की पेचीदा गलियों में होकर एक रास्ता नायों के बड़ से फुलेराव की घाटी और चोदपोल की ओर जाता है । फुलेराव की पोल में प्रवेश करते ही चांदपोल की घाटी शुरू हो जाती है । इसी रास्ते पर है ‘‘रोवणियों का नोहरा’’। यहां किसी जमाने में लोग रोने और शोक मनाने के लिये ही एकत्रित होते थे । सामंती शासन व्यवस्था में जब कोई महाराजा, महारानी अथवा राजपरिवार के किसी सदस्य का निधन होता, तो शहर पनाह व आसपास के लोग जातिधर्म, उम्र व लिंग भेद के बिना यहां पहुंचते तथा धाड़े मारकर व अपनी छाती पीटकर रोते थे । राजशाही के उस दौर में जब राज परिवार में कोई गमी होती, रियावा जब इस नोहरे में रोने और शोक प्रकट करने पहुंचती तो दरबार का कोई प्रतिनिधि भी वहां मौजूद रहता । रोने-धोने के बाद उनके भोजन की व्यवस्था की जाती थी । रोवणियों का नोहरा अब भी मौजूद है, मगर वह सामाजिक न्याय विभाग के अधीन है । -राजस्थान पत्रिका, पत्रिका सनसिटी एक्सपोज जोधपुर, पृ. 13, 17.12.2017.

बहु खीचड़ी

-नव वधू के स्वागत में किया जाने वाला भोज ।  -33/190.

बहुबंदोळौ

-नववधू के स्वागत में संबंधियों द्वारा दिया जाने वाला भोजन ।   -33/191.

बहु रात

-नववधू के आगमन पर प्रथम रात्रि को किया जाने वाला जागरण । -33/191.
-विवाहोत्सव परंपरा में दूल्हे को बंदाने के बाद प्रथम रात्रि में दुल्हन को माया में दरी पर ही सोना पड़ता है । इस दिन रातीजगा के आशीर्वादात्मक गीत गाये जाते हैं । यह रात्रि विशुद्ध रूप से देवी-देवताओं को समर्पित मानी जाती है । इसे बहु-रात कहते हैं । -1/59.


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