जैन मंदिर

-खरतरगच्छीय मुनि वृद्धिरत्नजी कृत ‘वृद्धि रत्नमाला’ में जैसलमेर दुर्ग स्थित जैन मंदिर की प्रतिष्ठा 1212 वि. सं. में होना लिखा है । प्रशस्ति में स्थापना का समय 1473 वि. सं. दिया है । जैसलमेर के ज्ञान भण्डार में उपलब्ध पुस्तक प्रश्नोत्तर रत्नमालिका वृत संहिता, जिसकी रचना 13वीं शदी की है, के अनुसार जैसलमेर नगर में श्री जगद्धर श्रेष्ठी ने पाश्र्वनाथ का मंदिर बनाया था । जैसलमेर पर 14वीं विक्रमी शताब्दी अलाउद्दीन खिलजी एवं मोहम्मद तुगलक के काल में इस मंदिर को
नष्ट कर दिया था । 1473 में जैन पंचायत ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था । श्री आदिनारायणजी के मंदिर की प्रतिष्ठा 1222 में हुई थी । -21/62.
-जैन धर्मावलंबियों में मूर्ति निर्माण की परंपरा का आरंभ हुआ तो बहुत से देवी देवता जो समाज में लोकप्रिय थे; नाम अथवा स्वरूप परिवर्तन के बाद अपना लिये गये । उदाहरणार्थ- वैष्णवी, चक्रेश्वरी बन गई और महिषमर्दिनी को सचियामाता की संज्ञा प्राप्त हुई । जैन धर्म में अहिंसा की प्रमुखता को देखते हुए महिषमर्दिनी को सचियामाता बना दिया गया । अनुमानतः हुआ यह होगा कि महिषमर्दिनी के बहुत से पूजकों ने जब जैन धर्म अंगीकार किया होगा तो सदियों से पूजने वाली देवी को एकाएक छोड़ नहीं पाये होंगे । ऐसी स्थति में उसी स्वरूप को सचियामाता मान कर पूजने लगे । इसी प्रकार भैरव को भी जैन धर्म में अपना लिया गया- नाकोड़ा का भैरव इसके बहुत अच्छे उदाहरण हैं । -25/10.
जैन साधु: -जैन साधु जती, ढूंढि़या, समेगी और तेरापंथी आदि ‘सेवड़ा’ भी कहलाते हैं । समेगी का भेष जती जैसा होता है, परंतु पहचान के लिये पीली धोती और पीली चादर भी रखते हैं । जैन साधु ‘जती’ जब गृहस्थियों से काम करने लगे, तब लोंका गच्छ के आचार्य धर्मदास ने वि.सं. 1716 में अहमदाबाद में अपना अलग पंथ चलाया । वि.सं. 1716 में इसी पंथ का नाम ‘ढूंढि़या’ हो गया, जो स्थानकवासी जैन मुनि भी कहलाते हैं । वि.सं.स 1817 में इसी 22 टोला पंथ से अलग होकर कंटालिया (सोजत परगने) के भीखणजी वैश्य ने अपना ‘तेरा पंथ’ नामक फिरका चलाया । इस पंथ के साधु भी ढूंढि़यों की तरह मुंह पर ‘मूमती’ बांधते हैं । ये भी मूर्ति-पूजक नहीं है । 2/336.
-हीरविजस सूरि तपगछमें श्रीपूज, जिनचंद्रसूरि खरतरगछमें श्रीपूज, अेक समैमें हुवा । अकबरनूं परचा दिया ।....विद्या खरतरांरै विसेस, धन तपांरै विसेस ।....तपागछमें तेरै बैसणा है, खरतगछमें इग्यारै बैसणा है ।....विजयदेवसूरिरा वंसरो श्रीपूज जिणरा जती तपांमें घणा है । उण पछै विजयाणंद सूरिरा वंसरा श्रीपूजरै जती घणा है । 15/174.
-हीरविजै जिनमतरो टीपणो वरतियो हो, पछै संवत् 1841 रै वरस नागोरी लूंकांरा गछ श्रीपूज हरखचंद जिनमतरा टिपणारो वरतारो कियो ।...कछ देसमें कच्छी ओसवाळ कख्ख्सूरी किया । उवै हमें आधाईक आंचळियामें वसै है, आधाईक तपांमें वसै है । 15/174.
-बीकानेरमें सातसौ घर खरतरगछरा स्रावकांरा है ।...जिनदतसूरि परचा घणा दिया देवनुग्रहात् । जिनदतसूरिरो पोतोचेलो जिनकुसळसूरि, दादागुरु पोतोचेलो दोनूं दादाजी कहावै । 15/174.
-रूपो-रंगो गुरु भाई । रूपारा वडा खरतरा, रंगारा रंगविजया । 15/174.
-तपगछरौ जती जांनविजै (ग्यानविजै) महाराज अजीतसिंघजीरै विद्यागुर । पळसणी पटै हुती । उणरा सारा चेला कपूत हुवा ।...ग्यानविजैरो चेलो वीरमवीजै, घरमें त्रिया घाली ही, उणरी बेटी फळोधीरा मथेण श्रीचंदनूं परणायी । 15/174.
-खरतरो जीवण जती अेक महाराज अभैसिंघजी आगै मनीजतौ । चुगली घणी करतो, चेला इणरै कपूत हुवा । 15/174.
-बोया, पाली में जैन मंदिर में शांतिनाथजी की मूर्ति है । कहते हैं कि इस मूर्ति की नाभि में से तीन-चार वर्ष पूर्व तक चंदन जैसी कोई चीज निकलती थी । कार्तिक पूर्णिमा को इस जैन मंदिर पर मेला भरता है । -राज. पत्रिका, जोधपुर 24.3.1990.


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