कबीर पंथी

-कबीरजी के 12 चेले थे । पाटवी तो काशी में उनकी गद्दी पर बैठै जिनकी अब तक 14 पीढ़ियां गुजरी हैं । अब पद्रहवें महंत गादी पर हैं । बाकी चेलों की गादियों दूसरी जगह हैं । मारवाड़ में सिर्फ साहिबदासजी की गादी के चेले हैं । आसोज सुदी 15 संवत् 1835 कोे महाराज श्री विजयसिंघजी के राज में काशी से कबीरपंथी रामदास और लच्छीराम जोधपुर में आये। जबसे इनका ‘पंथ’ यहां फैला है । महेसरी महाजन इन साधों को जियादा मानते हैं । इनके गुरुद्वारे जोधपुर के सिवाय सांडिया, देवगढ़, दयालपुरा और चाटेलाव वगैरा गांवों में भी हैं । इनकी जमाअत ‘‘मंडली’’ कहलाती है । इनके नाम भी राम और दास के ऊपर होते हैं । ये लोग निहंग रहते हैं । ये चेली औरत को भी कर लेते हैं लेकिन उसको पास नहीं रखते । और जो औरत रखता है उसको अपले भेख से निकाल देते हैं । ये चैमासा करने के वास्ते परदेस में भी जाते हैं और चार महीने एक जगह बैठे रहते हैं । चैमासा कराने वाले सब खरच अपने पास से उठाते हैं और सीख देते हैं । जब कुछ भेंट भी करते हैं । धर्म इनका वैष्णव है । कबीरजी तो निरगुण उपासी थे और अपने चेलों को भी उन्होंने यही उपासना बताई थी । मगर अब बाजे कबीरपंथी साधु राम और कृष्ण की मूरतें भी पूजते हैं और मंदिर भी बनाते हैं । इनके मठ और गुरुद्वारों में या तो कबीरजी की गादी होती है या चरण, या उनकी वाणी, जिसके ऊपर फूल और चंदन चढ़ाते हैं । ये व्याह और शादी नहीं करते । चेले मूंडते हैं । इनके किसी काम में ब्राह्मणों का दखल नहीं है । ये चेला करते हैं जिसको सिर मूंड कर भगवां कपड़े और तुलसी की माला पहिनाते हैं । उससे पहिले तो राम राम जपाते हैं । फिर बरस छह महीने पीछे अपना असली मंत्र सुनाते हैं । तब वह पूरा ‘कबीरपंथी’ होता है और उनकी पंगत में बैठने लगता है । चेलों में से जो लायक हो, गुरु उसीको 4 मोतबर आदमियों के सामने चादर उढ़ाकर अपनी गद्दी का मालिक बना देता है । जिस चेले का चलन अच्छा नहीं हो और जो दाढ़ी बीच में से छंटावे और मना करने से न माने, उसको भेख से बाहर कर देते हैं । ये मुरदे को जलाते, गाडते और जंगल में भी छोड़ देते हैं । यह उसके कहने पर है, जैसा कह मरे, वैसा करते हैं । पर जियादा रिवाज जलाने का है । ये गाड़ते हैं तो बैठा हुआ उत्तर की तरफ मुंह करके गाड़ते हैं । ये बैकुंठी में बैठा हुआ निकालते हैं और ‘झालर’ बजाते ले जाते हैं । ये क्रियाकर्म कुछ नहीं करते । 17वें दिन सत्तरवीं करके अपने भेख के साधुओं को जिमा देते हैं । ये भगवां और सिले हुए कपड़े पहिनते हैं । ऊंची टोपी लगाते हैं । आपस में ‘सत्तसाहिब’ और बंदगी करते हैं । दुशाले भी ओढ़ते हैं । महंत पालकी पर भी चढ़ते हैं । चंवर, छत्र और छड़ी भी रखते हैं । इनमें गरीब साधु रोटियां मांग कर खातेहैं । पैसे वाले बोहरगतें भी करते हैं । ये कबीरजी की वाणी और उसकी कथा भी अपने सती सेवकों को सुनाते हैं । इनमें जब कभी आपस में सौगंध खाने या खिलाने की जरूरत होती है तो कबीर साहिब की वाणी को हाथ में लेकर खाते और खिलाते हैं ।-6/278-9.
-जैसलमेर में ईसरदासजी नामक कबीर पंथी यशस्वी संत हुए हैं । एक बार हैदराबाद सिंध में मस्जिद के पास पेशाब करने से मुसलमानों ने इनका धर्म परिवर्तन करना चाहा । इस समय संत ने लंगोटी खोल कर 100 इन्द्रियां दिखाई और कहा कि इसमें जो मूसली हो वह काट लो । हाथसिंह की प्रार्थना पर संत खूहड़ी आये । यहां बहुत-से लोगों को कण्ठी पहनाकर कबीर पंथी बनाया । मगनीराम के दूसरे शिष्य हरिदास के जैरामदास ने गांव धोंवा और पोकरण में अलग-अलग ठिकाने बनाकर ज्ञान लाभ दिया । खूहड़ी में आज भी कबीर पंथियों के ठिकाने के खण्डहर विद्यमान हैं । -21/114.


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