कबीर

-कबीरजी कासी के मुसलमान जुलाहे थे । इनके दिल में भगवत भगती बचपन से थी । जवानी में बहुत से हिन्दू मुसलमान पीर फकीरों के पास फिरे मगर उसका रस्ता किसी से नहीं मिला तब एक ने रामानंदस्वामी के पास जाने का उपाय बताया । कबीरजी जानते थे कि वे तो मुसलमान और नास्तिक का मुंह भी नहीं देखते हैं, मुझ जुलाहे से क्यों बोलने लगेंगे तो भी उनके रस्ते में गढ़ा खोद कर बैठे रहे । पिछली रात को रामानंदजी गंगा स्नान करके अपने आश्रम को जाते थे कि कबीरजी ने गढ़े से निकल कर उनके पांव पकड़े । रामानंदजी ने कहा- राम, बस । कबीरजी ने राम नाम सुन कर पांव छोड़ दिये और राम राम जपने लगे । इससे उनको ज्ञान हो गया । फिर तो बड़ी बड़ी बातें ज्ञान और वैराग की करने लगे । जिनकी शहर में धूम मच गई और लोगों ने रामानंदजी को कहा कि यहां एक जुलाहा है वह अपने को आपका चेला बताता है ! आपने तो उसका मुंह भी नहीं देखा है ! रामानंदजी ने कहा कि कौन है, देखें लाओ तो सही । जब लाये तो कबीरजी ने रामानंदजी को देखते ही कहा- राम, राम । रामानंदजी भी राम राम कहते हुए उठे और कबीरजी से बगलगीर होकर मिले । लोगों को बड़ा अचंभा हुआ और कहने लगे कि इस जुलाहे के तो भले भाग खुले । रामानंदजी ने फरमाया कि यह जुलाहा नहीं, इस समय का ब्राह्मण है । क्योंकि ब्रह्म को इसने अच्छी तरह से पहिचान लिया है । उस दिन से कबीरजी की और भी महिमा बढ़ गई और बहुत से आदमी उनके चेले हो गये, जिससे इनका ‘‘कबीर पंथ’’ चला । कबीरजी ने बहुत से भजन, हरजस, साखी और देाहे बनाये हैं जो कबीर की वाणी के नाम से किताबों में लिखे गये हैं जिसको कबीरपंथी साधु पढ़ते पढ़ाते और उपदेश के वास्ते दूसरे लोगों को भी सुनाते हैं । कबीरजी की वाणी में ज्ञान, वैराग और शांतिरस खूब झलकता है । कबीरजी का इन्तकाल मगध देश में मगसर सुद 11 संवत् 1575 को हुआ-
          ‘‘पंदरा सौ रु पछत्रै, सतगुर किया गवन,
           म्ंगसर सुद एकादसी, मिली पवन में पवन ।’’
फारसी किताब ‘दबिस्तानुलमजाहिब’ में लिखा है कि जब कबीरजी ने चोला छोड़ा तो मुसलमान गाड़ने के और हिन्दू जलाने के वास्ते तैयार हुए । दोनों उनको अपने अपने मजहब में जानते थे । आखिर एक फकीर ने आ कर कहा कि कबीर तो एक ज्ञानी पुरुष, तुम दोनों के मत से अलग थे और जैसे अब तक उन्होंने तुमको राजी रखा है, और मरे पीछे भी रखेंगे । इस पर कोटड़ी खोली गई तो कबीरजी की लाश नहीं मिली । यह देख कर हिन्दू मुसलमान दोनों अचंभे रह गये । लौकिक में यों कहते हैं कि कबीरजी चादर ओढ़ कर सो गये थे । जब चादर उठाई तो उसके नीचे एक ढेर फूलों का मिला जिसको दोनों दल खुशी से हाथों हाथ लूट ले गये । इसमें आगे लिखा है कि जगन्नाथजी में जहां मुरदे जलाये जाते हैं, एक कबर और एक निशानी बनी हुई है, जिसको कबीरजी की बताते हैं । कबीरपंथी कबीर साहिब की उमर 300 बरस की मानते हैं । उनका जनम जेठ सुद 15 ांवत् 1275 को होना बयान करते हैं । कबीरजी शाह सिकंदर लोदी के समय में हुए हैं।-6/275-7.
-कबीर संवत् पनरासैमें हुवो । दादू पहलां सौ वरसां । पातसाह सिंकंदरनूं परचो दियो । 15/173.
             -कबीर कोठी काठ की, चैमुख लगी आग,
             साचै साधु सब बह गयै, कूड़ै गयै भाग ।1।
            -कबीरा अेसी दुनिया अंधी, जैसी अंधी गाय,
             बछड़ै उसके मर गये, ऊभी चाटै चांम ।2।
            -रात भजै चोरटा, दिन भजै सी ठोर,
             अेक पिया भजै अंधारा, अेक भजन की गत ओर ।3।
            -रात तूं वड भागनी, कैड़ी तपस्या कीन ,
             तीन पौ’र को नाथ है, तमारौ भयौ अधीन ।4।
           -उजड़ियौ वंस कबीर को, जलम्या पूत कमाल,
            आधा भगत कबीर था, पूरा भगत कमाल ।
           -कबीरा पगड़ौ दूर है, बीच पड़ी है रात,
            ना जांणूं क्या होयसी, ऊगंतै परभात ?
           कबीरा तूं कूड़ी कथी, जैसी दिवलै लोय,
           लगै झपट्टा पूंन का, भोर कठा सूं होय !
-देखें कबीरपंथी ।


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