कन्या वध

-डाॅ. एम. एस. जैन के अनुसार कन्या वध की बुराई राजस्थान और राजपूतों के साथ जुड़ी हुई है । कई पोलिटिकल अधिकारियों और एजीजी-मेजर जैक्सन, वेब, टाॅड, सदरलैण्ड, लुडलो आदि ने इसका वर्णन किया है । श्यामलदास, ओझा व रेऊ ने इस कुप्रथा के प्रचलन का जिक्र किया है फिर भी इतना निश्चित् रूप से कहा जा सकता है कि राजस्थान में कन्या वध की प्रथा सीमित थी । सामाजिक ढांचे में उच्च स्थान प्राप्त किन्तु आर्थिक दृष्टि से गरीब वर्ग में ही इस प्रथा का प्रचलन रहा । जैन के मत से ऐसा आभास होता है कि ‘राजपूत स्वभाव में अहमण्यता, अपनी क्षमता से अधिक धन खर्च करने की महत्वाकांक्षा और अपनी पुत्री का अपने से उच्च कुल में विवाह करने की अभिलाषा इस कुरीति के लिये उतरदायी थी । 1818 ई. के पश्चात् जागीरों के विस्तार की संभावनाएं बहुत कम हो गई थी । इसलिये यह कुप्रथा व्यापक हो गई । सर्वप्रथम 1834 ई. में कोटा राज्य ने कन्या वध को गैर कानूनी घोषित किया । 1837 ई. में बीकानेर, 1839-44 ई. में जोधपुर, जयपुर, उदयपुर तथा 1857 ई. में अलवर राज्य में इस प्रथा को गैर-कानूनी घोषित किया गया । -27/171.


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