अंध-विश्वास

-कहते हैं कि वि.सं. 1696 में राजा जसवंतसिंहजी को यकायक चितभ्रम का रोग हो गया । लोगों ने प्रसिद्ध कर दिया कि ‘इनको भूत लग गया है और वह राजाजी को तब तक न छोड़ेगा जब तक कोई बड़ा सरदार अपना सिर उसको न चढ़ा दे’ यद्यपि यह बात स्पष्ट है कि यह उपाय ढकोसले व अंध-विश्वास के आधार पर ही था तब भी राजा की भलाई के लिये उस समय के भूतों में विश्वास रखने वाले सरदारों में से प्रधानमंत्री राजसिंहजी, आसोप के ठाकुर ने प्रसन्नतापूर्वक अपना सिर अपने हाथ से काट डाला । 2/119.
-कोई समंद मांहे साह गयो थो । तिकै ऐक मृतक देह दीठी थी । तिणरी वात राणा कूंभानूं कही । तद राणो कूंभो चित-भरमियो हुवो । क्यूंही रोवै, क्यूंही बोलै । तद कूंभळमेर रहता, सु गढ़ ऊपर एक ठोड़ मांमा कुंड छै । मांमा वड़ छै । तठै राणो बैठो थो । कूंभारो बेटो मुदायत ऊदो थो, तिण कूंभानूं कटारियां मार नै आप पाट बैठो थो । 10/45.


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