जैन संत साहित्य

 -वि. सं. 835 में उद्योतन सूरि ने जालोर में बैठकर ग्रंथ ‘‘कुवलयमाला’’ की रचना की । यह ग्रंथ पाकृत में लिखा गया है परन्तु इसमें मरुभाषा के नाम से राजस्थानी का उल्लेख मिलता है । 10वीं शताब्दी में सिद्धिर्षि नामक एक दूसरे संत कवि ने भीनमाल में ‘‘उपमिति भव प्रपन्च कहा’’ रूपक ग्रंथ बनाया । इसमें भी राजस्थानी भाषा का आदि स्वरूप देखने को मिलता है । अपभ्रंश की रचनाएं भी इसी क्षेत्र में लिखी हुई मिलती है, उनमें धनपाल कवि की सांचोर में लिखी ‘सत्यपुरीय महावीर उच्छाह’ रचना प्रमुख है । इस रचना के अन्तर्गत सांचोर के महावीर जिनालय की मूर्ति महमूद गजनवी ने वि. सं. 1081 में तोड़ने की कोशिश की परन्तु उसे सफलता हाथ नहीं लगी, उस बात का वर्णन है । उसी भांति ब्राह्मणवाड़ में बारहवीं शदी में सिंह कवि ने ‘‘पुज्जुनकहा’’ नामक काव्य ग्रंथ लिखा । ये दोनों ही रचनाएं अपभ्रंश की हैं परंतु इनमें प्राकृत के बाद के राजस्थानी साहित्य स्वरूप देखने को मिलता है । जिनदत्त सूरि की अपभ्रंश काव्यत्रयी के अंतर्गत छपी हुई है । तरहवीं शदी राजस्थानी का आदिकाल माना जाता है । इस काव्य से राजस्थानी जैन संतों की स्वतंत्र रचनाएं मिलनी प्रारंभ होती है । सर्वप्रथम रचना नागौर के वादिदेवसूरि के शिष्य वज्रसेनसूरि की ‘‘भरतेश्वरबाहुबली घोर’’ मिलती है । यह पैंतालीस छंदों की रचना है और इसमें जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के पुत्र भरत और बाहुबली के युद्ध का वर्णन है । वि. सं. 1258 में वर्तमान जोधपुर जिले के खेड़ नगर में शांतिनाथ जिनालय की प्रतिष्ठा जिनपति सूरि ने करवायी । जिनपतिसूरि के पश्चात् उनकी गद्दी पर जिनेश्वर सूरि बैठे । जिनेश्वरसुरि की लिखी ‘‘महावीर जन्माभिषेक’’ श्री बासूपूज बोलिका चर्चरी शंतिनाथ बोली नामक राजस्थानी रचनाएं मिलती हैं । जिनपति सूरि के एक अन्य शिष्य सुमतिगणि ने ‘‘नेमिरास’’ की रचना की । इसके अंतर्गत बाईसवें तीर्थंकर नेमिनाथ के चरित्र का वर्णन है । इस तरह तेरहवीं शदी के अंदर जो राजस्थानी जैन संत रचनाएं मिलती हैं वे सब राजस्थानी की रचनाएं तो हैं किन्तु इन पर अपभ्रंश और गुजराती का प्रभाव भी दृष्टिगोचर होता है । चौदहवीं शदी में खतरगच्छ के आचार्य जिनेश्वर सूरि का शिष्य उपाध्याय लक्ष्मीतिलक एक प्रसिद्ध विद्वान और संत कवि था । साठ छंदों का ‘‘शांतिनाथ देवदास’’ लक्ष्मीतिलक रचित राजस्थानी का काव्य है । इसमें खेड़ नगर के शांतिनाथ जिनालय की प्रतिष्ठा और वि. सं. 1313 में जालोर के शांतिजिनालय की प्रतिष्ठा का ऐतिहासिक वर्णन है । कालान्तर में इस रास को जालोर में मंचित भी किया गया । जोधपुर राज्य के कोरटा गांव में वि. सं. 1363 में प्रज्ञातिलक के समय में ‘‘कच्छूली रास’’ नामक राजस्थानी रचना भी मिलती है । 15वीं शदी के उत्तरार्द्ध में पीपलगच्छ का हीरानन्द सुरि एक अच्छा संत कवि हुआ, इसकी वस्तुपाल तेजपाल रास, विद्याविलास पवाड़ा, कलिकाल रास नामक रचनाएं मिलती हैं । इसकी ‘‘जम्बूसामी विवाहउल’’ रचना सांचोर में लिखी हुई है । सोलहवीं शदी के प्रारंभ में वि. सं. 1505 में ‘संघकलस’ नामक संत ने सम्यवत्व रास मारवाड़ के तलवाड़ापुर/तिलवाड़ा में बनाया । मारवाड़ के समियाणा ग्राम में जन्मे नाहटा गौत्रीय गुणरत्न सूरि के देहावसान के पश्चात् उनके शिष्य पद्मन्दिरगणि ने ‘गुणरत्न सूरि विवाहलउ’ नाम की49 छन्दों की एक रचना लिखी । ‘‘पद्म्न्दिर सूरि’ के राजस्थानी में लिखे हुए दो स्तवन भी मिलते हैं । ये दोनों ही स्तवन वि. सं. 1543 में लिखे गये । पहलस स्तवन वरकाणा पार्श्वनाथ का स्तवन है जिसमें 20 गाथा हैं और दूसरा जालोर नवफणा पारस दस भव स्तवन है जिसमें 35 गाथा हैं ।........काव्य के रूपभेद की दृष्टि से मारवाड़ के जैन संत कवियों का साहित्य अलग-अलग रूपों में मिलता है । प्रबंध काव्य रास, चौपई, वेलि, फागु, चर्चरी, चरित, संणि, मंगल आदि रूपों में उपलब्ध होते हैं । -35/119-21.


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