लोकनृत्य

-मनोरंजनार्थ स्त्री व पुरुष सामुहिक रूप से व एकल गीत गाते हैं । गीतों के साथ नृत्य भी होते हैं । प्रायः सभी त्यौहारों, उत्सवों आदि पर लोग मिलजुल कर नृत्य करते व गाते हैं । नृत्यों में स्त्री व पुरुष दोनों ही भाग लेते हैं । ऐसे नृत्यों में घूमर, गेर, गौरी, चंग, बालट, डांडिया ईडली, षंकरिया, भवाई, तेरहताली, कच्छीघोड़ी, गींदड़ आदि नृत्य प्रसिद्ध हैं । विभिन्नजातियां- सांसियों, कंजरों, बनजारों, मीणों, भीलों, गरासियों, कालबेलियों आदि के भी विशेष नृत्य होते हैं । भीलों का गौरी नृत्य, गरासियों का बालट नृत्य, कालबेलियों का इडांणी नृत्य प्रसिद्ध है । ये लोकनृत्य राजस्थान की अमूल्य निधि है-23/191-2.
-बादशाह शाहजहां के काल से ही मांडल, भीलवाड़ा में ‘रंग तेरस’ के दिन विचित्र सफेद सींगों वाले नाहरों के नृत्य की परंपराएं आज तक प्रचलित है । यहां के गांवों में भोपों द्वारा ‘देवनारायण और पाबूजी की पड़’ का वाचन परंपरागत शैली मेंकिया जाता है । भीलवाड़ा जिले के महेन्द्रगढ़ कस्बे के पं. देवीलाल एवं पद्मश्री दुर्गालाल के कत्थक नृत्य ने क्षेत्र का नाम रोशन किया है । शाहपुरा मांडल व जहाजपुर में ‘कच्छीघोड़ी’ नृत्य करने वाले लगभग पच्चास श्रेष्ठ कलाकार हैं । भील्याखेड़ा के भीलों का कलात्मक ‘राई’ नृत्य लोकप्रिय है । -25/151


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