भाव

-1. अस्तित्व, सत्ता । 2. अवस्था, दशा, हालत । 3. श्रद्धा, भक्ति । 4. विश्वास, दृढ़मत । 5. कल्पना, भावना । 6. मन का विचार, खयाल । 7. स्वभाव, प्रकृति । 8. मानसिक स्थिति । 9. चित्त, मन । 10. पद, ओहदा । 11. आचरण । 12. तरह, प्रकार । 13. प्रेम, अनुराग । 14. हाव-भाव, चेस्टाएें । 15. सम्मान, इज्जत । 16. चोंचला, नखरा । 17. प्रतीति, आभास । 18. प्रवत्ति । 19. लक्ष्य, उद्देश्य। 20. कार्य, क्रिया । 21. ढंग, तरीका । 22. आत्मा । 23. जन्म, पैदाइश । 24. योनि, भग । 25. रति क्रिया । 26. प्रभाव प्रकोप, । 27. आशय, अर्थ । 28. सारांश । 29. सांख्य के अनुसार छः भावों से युक्त पदार्थ । 30. वैशेषिक के अनुसार छः पदार्थ । 31. सांख्य के अनुसार बुद्धि तत्त्व का कार्य । 32. वस्तु का मूल्य, दर । 33. व्यापारिक वस्तुओं की दर । 34. साहित्य में मानसिक अवस्थाओं का व्यंजक तत्त्व । 35. नायिका के यौवनावस्था में उद्भूत 28 अलंकारों में से एक । 36. संगीत में पांचवा अंग । 37. जन्म कुण्डली में ग्रहों की 12 स्थितियों में से एक । 38. ज्योतिष में जन्म समय का लग्न । 39. उद्देश्य हेतु । 40. कामना, वासना । 41. कर्मों के उदय, क्षय, क्षयोपशम या उपशम से होने वाले आत्मा के परिणामों के नाम । 42. वस्तु का गुण या स्वभाव । 43. किसी देवता का प्रसाद । 44. विद्वान । 45. शरीर में किसी देवता की उपस्थिति की दशा । 46. एक गीत विशेष । -33/284.
-भरत ने स्थायी भाव आठ माने हैं- रति, ह्रास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा, तथा विस्मय । इन भावों के अनुरूप आठ रसों की निष्पति क्रमशः इस प्रकार होती है- श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स और अद्भुत ।...भरत ने इस प्रकरण में भावों की संख्या उन्चास बताई है । इनमें आठ स्थायी भाव, आठ अनुभाव तथा तैंतीस संचारी अथवा व्यभिचारी भाव हैं । -17/90.
-देवता दोष -देवता का दोष प्रकट करवाने को ‘आखा’ देखना या ‘ज्योत करवाना’ कहते हैं । ये क्रियाएं माताजी, मावडि़यांजी, हनुमानजी, भैरूंजी और पितर-पितरानियों के समक्ष अपने विघ्न प्रश्न पूछने के संबंध में करवाई जाती है । भक्त किसी बड़ी औरत या भोपे के आगे अपने आखे/अक्षत-दाने और ज्योत का घृत ले कर धरता है । तब देवी या देवता अपनी पुजारी के सिर आकर उसके मुंह बोलता है । भक्त उससे अपने प्रश्नों का उत्तर पूछता है और पुजारी के बताये अनुसार विश्वास करता है । भक्त को संतोष हो जाने पर देवता पुजारी के सिर से उतर जाता है । लोक विश्वास पर रक्षक देवता की कृपा करने के लिये जन सामान्य चूरमा, लापसी, खीर और हलवा के भोग चढ़ाते हैं । -20/248.
-भीलवाड़ा के भील्याखेड़ा के देवरों में ‘भाव’ आने के पहले विशिष्ट गायन शैली में ‘लूर’ गाई जाती है । -25/151.
-29.09.1981 हमें बताया कि बारापाल और ऊंदरी गांव, उदयपुर के पास एक ही थांन पर तीन चैकियां लगती हैं जहां पर तीनों ही भोपों को ‘भाव’ आता है । वे अलग अलग संकट का निराकरण करते हैं, दूसरे स्थान पर एक साथ 10-15 लोगों को कुछ क्षणों के लिए भाव आता है जो क्रमवार चलता है । उस समय ये लोग केसर व अमल की फाकी लगाते हैं ।भाव अथवा हाजरी के दौरान औरतें बाल खुला रखती हैं ।

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